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एलोपैथी प्रिस्क्रिप्सन के अधिकार को लेकर आमने – सामने हुवे आयुष और फार्मासिस्ट

एलोपैथी दवाएं लिखने के अधिकार के लड़ाई को लेकर मध्य प्रदेश के आयुष चिकित्सक और फार्मासिस्ट आमने सामने हो गए है। जहाँ एक तरफ आयुष चिकत्सक महाराष्ट्र की तर्ज़ पर एलोपैथी दवा लिखने की इज़ाज़त मांग रहे है। वही फार्मासिस्ट संगठनों ने अपना दावा पेश किया है। मध्य प्रदेश के सीएम के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ प्रदेश में डॉक्टरों की कमी है दूसरी तरफ कानून की समस्या आड़े आ रही है। स्वस्थ भारत डॉट इन ने जब क्रॉसपैथी पर केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि कुछ एलोपैथी दवाओं को लिखने के लिए स्वस्थ मंत्रालय को प्रस्ताव भेजे हैं, जिसपर अबतक सहमती नहीं मिली है। महाराष्ट्र में शासन ने जहाँ आयुर्वेदिक, होमिओपैथी चिकित्सकों को एलोपैथी दवा लिखने की छूट दी है। पर अब भी बाकी के राज्यों में आयुष चिकित्सकों द्वारा एलोपैथी लिखना प्रतिबंधित ही है। हाल में ही उत्तरप्रदेश की अखिलेश सरकार द्वारा आयुष चिकित्सकों के एलोपैथी दवा लिखने के केबिनेट के फैसले पर इलाहाबाद की हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। पड़ताल में एक और बात सामने आई है की एनआरएचएम कार्यक्रम में कार्यरत आयुष चिकित्सकों को  एलोपैथी उपलब्ध कराइ गई है जहाँ वे धड्ड्ले से एलोपैथी  दवाई लिख रहे है। जबकि कानून इसकी इज़ाज़त नहीं देता। ऐसे में मध्य प्रदेश के प्रांतीय फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने सरकार पर धावा बोला है और आरबीएसके और एनआरएचएम की योजनाओं से आयुष चिकित्सकों को हटाने की मांग कर दी है। आइए एक नज़र डालते है पुरे प्रकरण पर ।

जबलपुर / भोपाल / ग्वालियर :
देश भर में एमबीबीएस डॉक्टरों की कमी को देखते हुवे सरकार ने विकल्प तलाशने के क्रम में आयुष चिकित्सकों (आयुर्वेदिक, होमिओपैथी, यूनानी) को थोड़ी छूट देने पर विचार कर रही है। क़ानूनी अड़चनों की वज़ह से ऐसा अबतक नहीं हो पाया है। आयुष चिकित्सकों का तर्क है की चूँकि उन्होंने अपने पढाई के क्रम में एनाटॉमी, फार्माकोलॉजी समेत एलोपैथी की कुछ दवाओं का अध्ययन भी किया है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम और एनआरएचएम कार्यक्रमों में वे सरकार द्वारा उपलब्ध कराई एलोपैथी दवा ही लिख रहे है। ऐसे में उन्हें एलोपैथी का क़ानूनी अधिकार दे देना चाहिए ताकि वे स्वतंत्र रूप से प्रेक्टिस कर सकें।
 
नाराज फार्मासिस्ट कर रहे प्रिस्क्रिप्सन लिखने की मांग 
वही दूसरी तरफ प्रांतीय फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने आयुष चिकत्सकों की मांग को गैर क़ानूनी और गैर जरुरी बताते हुवे आयुष चिकित्सकों को आड़े हाथों लिया है। पीपीए के अध्यक्ष अम्बर चौहान ने आयुष चिकित्सकों को अपनी चिकित्सा पैथी में काम करने की हिदायत दी है। उन्होंने बताया कि यहाँ मामला अंग्रेजी दवाओं का है और फार्मासिस्ट चार बर्षों तक दवा का गहन अध्यन समेत मानव शरीर में दवा के प्रभाव, दुष्प्रभाव समेत कई विषयों का अध्ययन करते है, जो मेडिकल के पाठ्यक्रम में एमबीबीएस करते हैं। आयुष पाठ्यक्रम और एलोपैथी पाठ्यक्रम में जमीन आसमान का अंतर है। अम्बर ने बताया कि आज भी मध्य प्रदेश के लगभग पांच सौ से अधिक अस्पताल में चिकित्सक की तैनाती नहीं है वहां डॉक्टर की गैरमौजूदगी में फार्मासिस्ट को ही इलाज़ करते हैं। आज तक एक भी मरीज़ को ना तो दवा से परेसानी हुई है ना इलाज़ से। उन्होंने सरकार से मांग की है की फार्मासिस्ट को छह माह या एक वर्ष का अतिरिक्त प्रशिक्षण देकर अपग्रेड करने के साथ साथ राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम, प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में पदस्थापना करे। अगर सरकार हमारी मांगो  को अनसुना करती है तो हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे  ।

मुख्यमंत्री के नाम जबलपुर कलेक्टर को ज्ञापन देते प्रांतीय फार्मासिस्ट एसोसिएशन के सदस्य
मुख्यमंत्री के नाम जबलपुर कलेक्टर को ज्ञापन देते प्रांतीय फार्मासिस्ट एसोसिएशन के सदस्य

 
 
विवेक मौर्य, प्रवक्ता, पीपीए
विवेक मौर्य, प्रवक्ता, पीपीए

“मध्य प्रदेश की जेलों में चिकित्सक नहीं के बराबर है। प्रदेश भर की जेल में कार्यरत फार्मासिस्ट को ही कैदी मरीज़ो का इलाज़ करना होता है। यह हाल जेलों तक ही सीमित नहीं प्रदेश के जायदातर प्राथमिक स्वस्थ केंद्र और समुदायक स्वस्थ केन्द्रों में चिकित्सक की अनुपस्थिती में परामर्श से लेकर दवा वितरण कार्य फार्मासिस्ट ही करते रहे है। अब जबकि हम चिकित्सा का अधिकार मांग रहे है तो बजाय हमें अधिकार देने के आयुष चिकित्सकों को पदस्थापित करने पर विचार कर रही है। जबकि आयुष चिकित्सक ने आयुष संबधी दवा का अध्यन किया है ना की एलोपैथी दवा का । आयुष चिकित्सकों को एलोपैथी लिखने का क़ानूनी अधिकार नहीं है। उत्तराखंड में शाशन ने आदेश जारी किया है जहाँ चिकित्सक उपलब्ध नहीं होते वहां फार्मासिस्ट प्रिस्क्रिप्सन लिख सकते है। मध्य प्रदेश की स्थिती उत्तराखंड से अलग नहीं।  हम चाहते है कि मध्य प्रदेश सरकार भी इस पर अमल करे। चिकित्सक का वेहतर विकल्प फार्मासिस्ट ही है आयुष चिकिसक नहीं । – विवेक मौर्य, प्रवक्ता , प्रांतीय फार्मासिस्ट एसोसिएशन 
 
जीतेन्द्र भदौरिया, सचिव, पीपीए
जीतेन्द्र भदौरिया, सचिव, पीपीए

“एनआरएचएम की योजनाओं समेत सरकारी अस्पतालों में एंटीबॉयटिक का इस्तेमाल आयुष चिकित्सक चाहे वो आयुर्वेदाचार्य हो होमिओपैथी या यूनानी धड़ल्ले से करते है ऐसे में ड्रग रेसिस्टैन्सी का खतरा लगातार बढ़ रहा है। एलोपैथी दवा आयुर्वेदिक यूनानी या होमिओपैथी से अलग है। जहाँ आयुर्वेदिक दवाइयों के साइड इफेक्ट नहीं होते है, वही एलोपैथिक दवाइयों के गलत इस्तेमाल मरीज़ की जान तक चली जाती है। कई ऐसे मामले आये है जहाँ मरीज़ों ने जान गवाईं है। ऐसे में आयुष चिकित्सकों जिन्होंने एलोपैथी दवा का अध्यन ही नहीं किया है, उनका जबरन हस्तक्षेप करना समझ से परे ही है। आयुष चिकित्सकों को अपनी पैथी का विकास करना चाहिए।  अबतक चिकित्सक के अनुपस्थिती में चिकित्सा कार्य देख रहे फार्मासिस्टों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलना चाहिए। “- जीतेन्द्र भदौरिया, प्रांतीय फार्मासिस्ट एसोसिएशन
 
फार्मासिस्टों द्वारा प्रिस्क्रिप्सन की मांग करना कोई नया मुद्दा नहीं है। काफी सालों से देश के बिभिन्न राज्यों में फार्मासिस्ट संगठन अपनी मांग उठाते रहे है। विगत कुछ सालों में देश भर के फार्मासिस्ट एक जुट होने लगे है। जहाँ एक तरफ मद्य प्रदेश में आंदोलन जोर पकड़ रहा है। वही उत्तर भारत समेत राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, यूपी, बिहार समेत नार्थ ईस्ट राज्यों ने भी प्रिस्क्रिप्सन लिखने की मांगो को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया है। एक तरफ जहाँ पहले ही डॉक्टर की कमी से राज्यों की सरकारें परेसानी झेल रही थी । आयुष चिकित्सकों पर एमटीपी और बंध्याकरण के फैसले पर भी सोच विचार कर रही थी ऐसे में फार्मासिस्टों की धमक कही सरकार को मुश्किल में डाल सकता है।
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