नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। कैंसर की जांच के लिए बायोप्सी की जाती है जो एक दर्दनाक प्रक्रिया है। लेकिन आईआईटी इंदौर की खोज से इससे छुटकारा मिल सकता है। वहां के अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें बिना किसी चीर-फाड़ और दर्द के केवल मरीज की लार और ‘स्वैब’ से मुख कैंसर के शुरुआती संकेतों की पहचान की जा सकती है। खास बात यह है कि यह तकनीक बीमारी के स्पष्ट लक्षण या घाव दिखाई देने से पहले ही मरीज के शरीर में होने वाले आणविक बदलावों की पहचान करने में मदद कर सकती है।
दो जांच पर फोकस
रिपोर्ट के अनुसार आईआईटी इंदौर के प्रोफेसर हेमचंद्र झा के नेतृत्व में विकसित इस तकनीक में मुख्य रूप से दो स्थितियों की जांच पर ध्यान दिया गया है जिनमें ‘ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस’ (गुटखा, सुपारी या तंबाकू के सेवन से मुंह का सिकुड़ना) और ‘ओरल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा’ (मुख कैंसर का सबसे सामान्य प्रकार) शामिल हैं। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि कैंसर की शुरुआत में ही मरीज के शरीर के ऊर्जा प्रबंधन, वसा और रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े सूक्ष्म आणविक परिवर्तन होने लगते हैं और लार व ‘स्वैब’ के नमूनों की जांच के जरिये इन बदलावों की शुरुआती स्तर पर पहचान की जा सकती है। फिलहाल मुख कैंसर की पुष्टि के लिए ‘बायोप्सी’ की जाती है जिसमें मुंह के प्रभावित हिस्से से ऊतक का नमूना लिया जाता है। अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक यह प्रक्रिया मरीज के लिए दर्दनाक हो सकती है और इसे बार-बार दोहराना व्यावहारिक नहीं होता।
लागत और समय की बचत
इसके विपरीत नयी विधि में चीर-फाड़ की जरूरत नहीं पड़ती और यह कम लागत वाली तथा त्वरित जांच के लिए उपयोगी हो सकती है। इससे दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों में मुख कैंसर की शुरुआती जांच को आसान बनाने में मदद मिल सकती है। अनुसंधान के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैंसर’ में प्रकाशित हुए हैं और संस्थान ने इसके लिए पेटेंट आवेदन भी दायर किया है। अब अनुसंधानकर्ता मरीजों के बड़े और अधिक विविध समूह में इन निष्कर्षों का सत्यापन करने की तैयारी कर रहे हैं।
