नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। रूस के साइबेरिया की घटना बता रही है कि कोरोना का भाई दुनिया में जल्द आ जाएगा। यह न्यूमोनिक प्लेग के नाम से होगा। इसके फैलने की बात सोचकर मेडिकल एक्सपर्ट भी चिंतित हो रहे हैं। जानिए पूरा घटनाक्रम।
क्वारंटीन में सैकड़ों लोग
रिपोर्ट के अनुसार साइबेरिया में एक प्लेग लैब में 28 साल की डेरया शिपिलोवा नाम की रिसर्चर की गंभीर निमोनिया से मौत हो गई। इसके संक्रमण की संभावना को देखते हुए रूसी अधिकारियों ने सैकड़ों लोगों को निगरानी में रखा है और क्वारंटीन के नियम लागू किए हैं। लैब में प्लेग बैक्टीरिया होने की बात कही जा रही है। ऐसे में रूस में प्लेग फैलने का खतरा है। रूसी अधिकारियों ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है कि शिपिलोवा की मौत की वजह प्लेग का था लेकिन कई ऐसी रिपोर्ट हैं, जो दावा करती हैं कि मृतक महिला इरकुत्स्क के एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट में खतरनाक बैक्टीरिया के संपर्क में आई थी। ऐसे में अस्पतालों ने सावधानी के उपाय कड़े कर दिए हैं और अधिकारियों ने इस संबंध में एहतियाती कदमों के तहत अपनी कार्रवाई तेज कर दी है।
टेस्ट ट्यूब टूटने की बात
इस मामले ने इस पर अटकलों को हवा दी है कि लैब के अंदर क्या हुआ था और क्या रूसी अधिकारी इस बारे में पूरी तरह पारदर्शी हैं। 28 साल की रिसर्चर डेरया शिपिलोवा को 29 सितंबर को गंभीर निमोनिया होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया लेकिन दो दिन बाद उनकी मौत हो गई। डेली मेल के अनुसार शिपिलोवा इर्कुत्स्क स्थित एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट में काम कर रही थीं। उन्होंने मेडिकल स्टाफ को बताया था कि उनसे जीवित बैक्टीरिया वाली एक टेस्ट ट्यूब टूट गई थी। इसके बाद पड़ोसी बुरियातिया में एक फील्ड एक्सपेडिशन के दौरान वह बीमार पड़ गई थीं। बाद में उन्हें शेलेखोव अस्पताल में एडमिट किया गया।
क्या कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक?
इस हादसे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या संक्रमण कोरोना वायरस जितना या उससे भी अधिक खतरनाक हो सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार Yersinia Pestis इसका वैज्ञानिक नाम है, जिसे हिंदी में प्लेग कहा जाता है। इसका नाम Yersinia नाम के एक स्विस-फ्रांसीसी वैज्ञानिक अलेक्सांद्र यर्सिन के नाम पर है, जिसने 1894 में हांगकांग में इस बैक्टीरिया की पहचान की थी। Pestis एक लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ प्लेग या महामारी होता है। रूस की लैब से लीक हुए मामले में न्यूमोनिक प्लेग की आशंका जताई जा रही है, जो प्लेग का सबसे घातक और जानलेवा रूप माना जाता है। सामान्य प्लेग जहां पिस्सुओं या चुहों के काटने से फैलता है, वहीं न्यूमोनिक प्लेग फेफड़ों को सीधे प्रभावित करता है। यह कोरोना वायरस की तरह खांसने, छींकने और हवा में मौजूद ड्रॉपलेट्स के जरिए बेहद आसानी से एक इंसान से दूसरे इंसान में फैल सकता है। अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए, तो यह फेफड़ों को पूरी तरह डैमेज कर देता है और संक्रमित व्यक्ति की 24 से 48 घंटे के भीतर मौत हो सकती है।
पहले भी फैल चुका है प्लेग
प्लेग मानव इतिहास में करीब 9 करोड़ लोगों की मौत की वजह बन चुका है। कुछ रिपोर्ट्स में इन मौतों की संख्या को 20 करोड़ के आसपास माना गया है। भारत में इसने 128 साल पहले कोरोना से भी भयानक तबाही मचाई थी। इससे पहले भी यह कई मौतों की वजह बन चुका है। 541 ई. के आसपास जस्टिनियन प्लेग पूर्वी रोमन साम्राज्य में शुरू हुआ और भूमध्य सागर क्षेत्र में फैला। प्राचीन डीएनए अध्ययनों ने इसकी पुष्टि Yersinia pestis से की है। कई लहरों में लाखों लोगों की मौत हुई और साम्राज्य कमजोर हुआ। इसके बाद 1346–1353 और उसके बाद यह महामारी यूरोप, मध्य एशिया और मध्य पूर्व में फैली। यूरोप की आबादी का अनुमानित 30–60 प्रतिशत हिस्सा मरा, कुल मौतें कई करोड़ तक बताई जाती हैं। यह मुख्य रूप से प्लेग का बुबोनिक रूप था, लेकिन न्यूमोनिक रूप भी मौजूद था। इसके बाद भी सदियों तक यूरोप और अन्य जगहों पर छोटे-बड़े प्रकोप होते रहे। तीसरी बार 1855 में चीन के युन्नान क्षेत्र से शुरू होकर हांगकांग, भारत, अमेरिका और अन्य जगहों तक पहुंचा। भारत और चीन में लाखों मौतें हुईं।
