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संपादकीय : गुणवत्तापूर्ण मेडिकल शिक्षा पर संकट

संपादकीय : गुणवत्तापूर्ण मेडिकल शिक्षा पर संकट

अजय वर्मा

मेडिकल शिक्षा का दायरा बढ़ाने से लेकर हेल्थ इकोसिस्टम को मजबूत करने के जितने प्रयास हो रहे हैं, वह सब दिखाई भी पड़ने लगा है। लेकिन पर्दे के पीछे का स्वार्थ भरा खेल इसकी जड़ें भी खोदने लगा है। कुछ दिन पहले ही एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसे CBI ने देश के सबसे बड़े मेडिकल शिक्षा घोटालों में से एक बताया है। उसने इस मामले में 34 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, जिसमें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आठ अधिकारी, एनएमसी के पांच डॉक्टर और कई निजी मेडिकल कॉलेजों के प्रतिनिधि शामिल हैं। इस घोटाले का जाल कई राज्यों में फैला हुआ है, जिसमें मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी, निरीक्षण और मान्यता देने में भ्रष्टाचार और धांधली के गंभीर आरोप लगे हैं।
जांच के अनुसार इस घोटाले का केंद्र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय है, जहां से गोपनीय जानकारी लीक की जा रही थी। यह जानकारी निजी मेडिकल कॉलेजों तक पहुंचाई जाती थी, ताकि वे एनएमसी के निरीक्षणों में धांधली कर सकें। इस रैकेट में शामिल लोग मोटी रकम के बदले निरीक्षण की तारीख और निरीक्षकों के नाम जैसी संवेदनशील जानकारी लीक करते थे। इससे कॉलेज फर्जी व्यवस्थाएं करके निरीक्षण में पास हो जाते थे। एफआईआर के मुताबिक रावतपुरा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च के चेयरमैन रवि शंकर महाराज, जो रावतपुरा सरकार के नाम से भी जाने जाते हैं, ने निरीक्षण की जानकारी पहले से हासिल करने की कोशिश की और मोटी रकम देकर इसे हासिल भी किया। निरीक्षण के बाद मन के मुताबिक रिपोर्ट के भी लिए उच्चस्तर पर कुत्सित प्रयास किए गए। सीबीआई ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के तीन डॉक्टर शामिल हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने रावतपुरा इंस्टीट्यूट के लिए 55 लाख रुपये की रिश्वत लेकर अनुकूल निरीक्षण रिपोर्ट दी।
जांच में पता चला कि स्वास्थ्य मंत्रालय के आठ अधिकारी गोपनीय फाइलों की तस्वीरें खींचकर और वरिष्ठ अधिकारियों के नोट्स को बाहरी लोगों तक पहुंचाकर इस रैकेट को चला रहे थे।
रावतपुरा कांड से पहले 2010 में ऐसी ही धोखाधड़ी पकड़ी गई थी। उस वक्त का IMC अब NMC हो चुका है। तब मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाले की गूंज थी। इंडेक्स, अरविंदो, अमलतास, चिरायु और पीपुल्स मेडिकल कॉलेजों में NRI सीटों को करोड़ों में बेचने का खेल चल रहा था। जो एनआरआई नहीं होते थे उन्हें भी मुंहमांगी रकम देने के बाद एनआरआई होने से संबंधित दस्तावेज तैयार जाते थे। इन सबकी पहुंच आईएमसी तक थी और मोटी रकम पहुंचाई जा रही थी। एक बार तो आईएमसी के चेयरमैन भी गिरफतार किए जा चुके हैं। उन पर पंजाब के एक मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने का आरोप था।
सोचनीय है कि ऐसा ही होता रहा तो मेडिकल शिक्षा कैसे गुणवत्तापूर्ण होगी? क्या डिग्री लेकर बने डॉक्टर स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं करेंगे? इसे रोकने के लिए मंत्रालय को कठोर कदम उठाने होंगे।

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