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The Thermometer.2—वेटनरी के क्षेत्र में भारत अग्रणी: डॉ. राजेश

The Thermometer.2—वेटनरी के क्षेत्र में भारत अग्रणी: डॉ. राजेश

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। The Thermometer.2 टॉक शो के 13वें एपिसोड में पशु चिकित्सक डॉ. राजेश कुमार सिंह आए हैं। उन्होंने प्लास्टिक का अंडा से लेकर देश में उपलब्ध दूध की शुद्धता, पालतू पशुओं को किस सावधानी से पालें आदि को लेकर बेबाक जानकारी दी। उन्होंने बड़ी बात यह भी कही कि वेटनरी के क्षेत्र में भारत की लगातार प्रगति हो रही है। उनसे बात की है स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने।

आशुतोष: पशु चिकित्सक से मानव के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बातचीत को आप कैसे जस्टिफाई करेंगे?
डॉ. राजेश: स्वस्थ भारत की मुहिम में प्राकृतिक या मानवीय कारणों से बाधा आती है तो पशु—पक्षी भी प्रभावित होंगे। ऐसा हुआ तो मानव स्वास्थ्य भी खराब होगा। यदि पशुओं में इनफेक्शन होगा तो पशुजन्य उत्पाद जैसे अंडा, दूध, मांस या अन्य पशुधन उत्पाद, जो मनुष्य उपभोग करते हैं, तो वायरस मनुष्य में प्रवेश करेगा और बीमारी देगा। उस पर रोक लगाने के लिए पशुधन के स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा।

आशुतोष: कभी अंडा के दूषित होने या मुर्गियों में फ्लू की शिकायत होती है और इन उत्पादों के सेवन से बचने की सलाह दी जाती है। इस तरह की समस्या को आम आदमी कैसे पहचाने? इसी तरह अंडा या मुर्गी बेचने वाले क्या करें?
डॉ. राजेश: पशुधन उत्पाद के प्रति ऐसी बातों को वैज्ञानिक तत्वों के द्वारा निराकरण करके और जन जागृति अभियान से आम जनता को जागृत कर सकते हैं। हाल ही अंडा में एंटीबायोटिक का ट्रेस पाया गया। कभी ये भी सुनने में आया कि अंडा प्लास्टिक का आ रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि ये पूरा भ्रम है। ऐसा कुछ भी नहीं है कि प्लास्टिक का अंडा होता है। अपना देश अंडा उत्पादन दूसरे स्थान पर है। अंडा उत्पादन की तकनीक में तो भारत नंबर वन है। सस्ता और गुणवत्तापूर्ण अंडा उत्पादन होता है भारत में और हम निर्यात भी कर रहे हैं। लगभग 100-150 बिलियन अंडा भारत ने पिछले साल प्रोड्यूस किए और आने वाले समय में और ज्यादा होगा क्योंकि उत्पादन में वृद्धि दर 8 से 10 फीसद है।

आशुतोष: प्रोड्यूस की बात का मतलब तो यह हुआ कि अंडा फैक्ट्री में बनता है?
डॉ. राजेश: मैं बताना चाहता हूं कि अंडा प्राकृतिक तरीके से उत्पन्न होता है। उसका कोई फैक्ट्री में प्रोडक्शन नहीं होता है। अंडा मुर्गियों से ही निकलता है। प्राकृतिक तरीके से।

आशुतोष: कहा जाता है कि अंडा की फार्मिंग होती है। तो फार्मिंग का क्या मतलब है? यानी 100 से 5000 मुर्गियां एक जगह पर रखी जाती होंगी और रोज अंडे को जमाकर बेचने के लिए दिया जाता है?
डॉ. राजेश: तीन तरह की मुर्गियां पूरे वर्ल्ड में पाई जाती है। एक मांस उत्पादन के लिए, दूसरा अंडा उत्पादन के लिए और तीसरा दोनों अंडा और मांस दोनों के लिए। जहां अंडा उत्पादन की मुर्गियां है वह मुर्गियां या देसी मुर्गी बैकट पोल्ट्री में रखी जाती है। कॉमर्शियल मुर्गी को फार्म में पिंजड़े में रखा जाता है। बकायदा वैज्ञानिक तरीके से उनका विकास मॉनिटर किया जाता है। उनकी देखभाल होती है। उनको पौष्टिक आहार दिया जाता है और लगभग 18 से 20 सप्ताह का होने पर वो अंडा देना शुरू करती हैं। उसके ही अंडा को पशुपालक एकत्रित कर बाजार भेजते हैं।

आशुतोष: एक मुर्गी अपने जीवनकाल में कितना अंडा दे सकती है?
डॉ. राजेश: भारत में अच्छे ब्रीड की अंडा देने वाली मुर्गियां हैं जो लगभग 400 अंडा तक दे रही हैं अपने जीवन काल में और इनका जीवनकाल अमूमन दो से तीन साल या लगभग 72 से 80 सप्ताह का होता है। उसके बाद फिर मांस के रूप में उपयोग के लिए बाजार में बेच दिया जाता है।

The Thermometer.2

आशुतोष: जब हम कहते हैं कि मुर्गी को हम मीट के रूप में खाते हैं तो फ्लू की चर्चा होती है। बीच—बीच में फ्लू की आशंका से हजारों मुर्गियों को मार दिया जाता है। तो ये फ्लू कैसे आता है और पब्लिक किस सकेत से सतर्क हो सकेगी ताकि उसे कोई नुकसान नहीं हो?
डॉ. राजेश: बर्ड फ्लू या एवीएन इन्फ्लुएंजा होता है। कई बार इसके फैल जाने की बात भी सामने आती है। यह एक बीमारी लेकिन देश में पक्षियों या मुर्गियों से मनुष्य में संक्रमण और मौत की रिपोर्टिंग नहीं है और यथार्थ भी नहीं है। भारत में कमर्शियल मुर्गी फार्मिंग चाहे बैकेट पोल्ट्री फार्मिंग उच्चतम हाई स्टैंडर्ड मापदंड पर उचित देखरेख में पाली जाती है। बायोसेक्योरिटी वैक्सीनेशन समय पर दिया जाता है और ये रोग लगभग नहीं के बराबर होता है। कहीं अगर आउटब्रेक होता है तो सरकार का मैकेनिज्म संभाल लेती है। इाकी रिपोर्टिंग होते ही उस क्षेत्र की मुर्गियां मार दी जाती है। उस क्षेत्र में लगभग तीन महीने फार्मिंग नहीं की जाती है इसलिए आम जन को घबराने की जरूरत नहीं है। खाना बनाने का जो भारतीय तरीका है उसमें 100 डिग्री सेल्सियस तापमान पर चिकन या अंडा उबालते हैं। इससे कोई भी बैक्टीरिया या वायरस सर्वाइव नहीं करता है।

आशुतोष: दूध को लेकर भी बहुत सी भ्रांतियां है कि देश में इतनी गाय—भैंस नहीं है तो इतना दूध आता कहां से है? तो सच क्या है और अगर ऐसा है तो हम कहां सतर्क रहें?
डॉ. राजेश: दूध उत्पादन के क्षेत्र में हम लोग पूरे वर्ल्ड में लगभग 25 से 30 सालों से नंबर वन बने हुए हैं। आप सभी को जानकर खुशी होगी कि पूरे विश्व के दूध उत्पादन का 27 से 30 फीसद भारत में होता है। हमारा दूसरा पोजीशन है दूध उत्पादन में। जहां तक उपलब्धता और सप्लाई—डिमांड की बात है, हमारे यहां दुधारू गाय की संख्या तो ज्यादा है लेकिन उनकी क्षमता सामान्य है। अगर देसी है तो लगभग दो से 3 लीटर है और उन्नत देसी नस्ल है तो लगभग पांच लीटर है। जो क्रॉस ब्रीड है तो उनका आठ से 10 लीटर है। जहां तक सप्लाई डिमांड का सवाल है, दूध की मांग गर्मी में ज्यादा और ठंडी—बरसात में कम होती है। भारत में दूध का व्यापार और फार्मिंग सिस्टम विश्व में सबसे बड़ा है और आर्गनाइज सेक्टर है।

आशुतोष: घर—घर पहुंचने वाला या पैकेट का दूध कितना सुरक्षित है? इस पर कोई शोध है या नहीं?
डॉ. राजेश: एक उदाहरण देना चाहता हूं। जमशेदपुर या उसके आसपास के क्षेत्र में प्रतिदिन दूध का खपत पांच से 6 लाख लीटर है लेकिन उत्पादन लगभग 3 से 4 लाख लीटर है। अब गैप है एक लीटर का। इस गैप की पूर्ति दूध के पाउडर से होती है और दूध के पाउडर से दूध बनाना गलत और गैर कानूनी नहीं है। हाइजीनिक और पौष्टिकता भी कहीं खराब नहीं है।

आशुतोष: दिक्कत तब होती है जब यूरिया से दूध बनाने या कुछ ऐसा—वैसा कुछ डालने की बात निकलती है।
डॉ. राजेश: ऐसी खबरें 99.9 फीसद भ्रामक होती हैं। आज कंज्यूूमर भी जागरूक है और उसे इसका पता चल जाता है। इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है।

आशुतोष: जो पशुपालक हैं, वे उसे कब वैक्सीनेशन के लिए ले जाएं?
डॉ. राजेश: प्रधानमंत्री के द्वारा नेशनल लाइव स्टॉक मिशन और नेशनल एनिमल डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम शुरू हुआ है। इसके तहत एक मोबाइल वेटनरी यूनिट प्रत्येक ब्लॉक में है। उसका टोल फ्री नंबर 1962 है। इस पर घर बैठे कोई किसान अपने पशु का इलाज या टीकाकरण या कृत्रिम गर्भाधान के लिए कॉल करता है तो मोबाइल वेटनरी यूनिट पहुंच जाती है। यह फ्री सुविधा है। इसमें डायग्नोस्टिक किट भी है। वहां रजिस्टर्ड वेटनरी डॉक्टर जाकर इलाज करेंगे और मुफ्त जानकारी भी देंगे। इसके अलावा लगभग प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर सरकारी पशु अस्पताल है। यहां डिजिटल एनिमल हेल्थ कार्ड मिलता है। इसके अलावा एआई इनेबल्ड डायग्नेस्टिक टूल्स आ गए हैं।

The Thermometer.2

आशुतोष: लेकिन गांव में बैठे पशुपालक कैसे जानेंगे कि गाय या बछड़ा को सर्दी के मौसम में कैसे बचाएं? उसे किस तरह की बीमारी हो सकती है? कौन से वो लक्षण है कि ऐसा कुछ होने पर डॉक्टर को संपर्क करना चाहिए?
डॉ. राजेश: सभी पशुपालक भाइयों को यह ध्यान रखना है कि आपका कोई भी पशुधन चाहे गाय, बैल, भैंस, बकरी, मुर्गी आदि में कुछ असमान्य व्यवहार है तो मानकर चलिए कि वह किसी स्ट्रेस में है या किसी इन्फेक्शन का शिकार है। इसके अलावा और भी लक्षण हैं जो पशुपालक भाई जान जाते हैं कि उनके पशु को बुखार हो गया या खाना जब छोड़ देता है या मल—मूत्र में कुछ असामान्य है तो वे पशु चिकित्सक से संपर्क करते हैं। सरकार इसकी व्यवस्था की है। टेली मेंटल कंसल्टेशन की व्यवस्था है। टोल फ्री नंबर 1962 पर जानकारी देकर सुझाव मांग सकते हैं या डॉक्टर को बुला सकते हैं।

आशुतोष: आपने पेट्स की चर्चा की। आप बताएं कि कुत्ता पालने पर उसकी देखरेख कैसे हो? दूसरी बात कि जब आपके घर में पेट्स रहते हैं तो बीमारी के लिहाज से कितना दूर या पास रहना चाहिए? डॉग बाइट के मामले भी गूंज रहे हैं।
डॉ. राजेश: अगर कुछ सावधानियों के साथ रखा जाए तो किसी तरीके की दिक्कत नहीं होगी। डॉग बाइटिंग पर उच्च न्यायालय का निर्देश भी आ चुका है कि आवारा पशु की आबादी वृद्धि पर रोक लगाई जाए। इससे पशु के साथ मनुष्य भी सुरक्षित रहेगा और पर्यावरण भी बचा रहेगा।

आशुतोष: बिल्ली या कुत्ते जैसे पालतू पशु कई बार बिस्तर पर आकर हमारे साथ सो जाते हैं और हमें बहुत अच्छा लगता है कि चलो हमारा पेट तो हमारे बिना रह नहीं सकता। लेकिन क्या सेहत का इससे कोई संबंध है?
डॉ. राजेश: सेहत का तो है ही। जिनेटिक रोग पशुओं से मनुष्य में हो सकता है। आज मनुष्यों के 70 प्रतिशत रोग की उत्पत्ति जानवरों से हुई है। अगर आप घर में उसे रखते हैं तो अपने परिवार के सदस्यों को खासकर छोटे बच्चों को जरूर उनके व्यवहार के विषय में जानकारी दें। एक जवाबदेह पेट ओनर बनना होगा। उनको सही समय पर टीका दिलाएं। उनका स्वास्थ्य जांच कराएं। उनका डी वार्मिंग कराएं तथा समय पर नसबंदी कराएं। अगर गलियों में घुमाने के लिए ले जाते हैं और कहीं गंदा कर देता है तो अपना दायित्व बनता है कि उसकी जल्द सफाई करा दें। भीड़भाड़ वाली जगह पर ना लेकर जाएं कि दूसरा भी उससे प्रभावित हो।

आशुतोष: डी वार्मिंग का क्या कांसेप्ट है और क्या कराना होता है?
डॉ. राजेश: मतलब उसके पेट में उत्पन्न कीड़ा को दवा से दूर करें। पेट्स बच्चा है तो तीन महीने तक प्रत्येक 15 दिन में यह कराना चाहिए। तीन महीना से लेकर 6 महीना तक एक महीना पर देना है। 6 महीना के बाद इनको भी अल्बेंडा ही दिया जाता है। अल्बेंडजोल या फ्लवमेंडजोल में से कोई एक दे सकते हैं। जब 6 महीना से ऊपर का हो जाए हैं और प्रेग्नेंट हो तो डॉक्टर की सलाह पर फेंडाजोल ही दिया जाता है। और भी बहुत तरह के ब्रॉड स्पेक्ट्रम साल्ट जो हैं जो प्रेगनेंसी में दिए जाते हैं। अगर आप पेट्स रख रहे हैं तो उसके स्वास्थ्य के बारे में मूलभूत जानकारी लीजिए और डॉक्टर से सलाह लेते रहिए। एंटी रेबीज का टीका दिला दीजिए। यह सबसे घातक बीमारी है। एक बार किसी को भी हो गया तो उसका इलाज नहीं है। उसकी मृत्यु तय है।

आशुतोष: एंटी रेबीज में और भी जानवर आते होगे। वो कौन-कौन हैं और किन-किन से बचना होगा?
डॉ. राजेश: जो वार्म ब्लडेड यानी गर्म खून वाले पेट्स हैं जैसे डॉग या कैट तो एंटी रेबीज का टीका देना ही होगा। इसके अलावा अगर बंदर ने काट लिया तो भी एंटी रेबीज का टीका लेना है क्योंकि हो सकता है कि उसे भी किसी जानवर ने कभी काटा हो। मतलब जो भी पेट्स हैं, उनके स्वास्थ्य, साफ सफाई को लेकर हमें सतर्क रहना है।

The Thermometer.2

आशुतोष: वेटनरी के क्षेत्र में सरकारी स्तर पर क्या—क्या हो रहा है? आपने ही कहा कि वेटनरी क्षेत्र में हम वैश्विक स्तर पर आगे जा रहे हैं तो उन पहलुओं पर प्रकाश डालें।
डॉ. राजेश: जहां तक वेटनरी साइंस में डेवलपमेंट का सवाल है तो बोल सकते हैं कि उतना तो नहीं पहुंचे लेकिन यूरोपियन स्टैंडर्ड के करीब पहुंचने वाले हैं। देहाती क्षेत्र में जहां सुविधाएं उपलब्ध नहीं है वहां चुनौती है और सरकार ने उसी को ध्यान में रखते हुए मोबाइल वेटनरी यूनिट शुरू की। इसके अलावा पारा भेट, पशु सखी दीदियों को ट्रेनिंग देकर देहात क्षेत्र में उनको प्रशिक्षित किया है ताकि पशुपालकों को मदद मिल सके। उन तक लेटेस्ट जानकारी पहुंच सके। अब तो सुपर स्पेशलाइजेशन का दौर है। पेट्स में आई स्पेशलिस्ट, ऑर्थोपेडिक, कार्डियो स्पेशलिस्ट का दौर भारत में भी शुरू हो गया है। धीरे—धीरे यह इकोसिस्टम डेवलप हो रहा है और पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर के सरकार सजग है। हमें भी जागरूक होने की जरूरत है क्योंकि जो पशुओं का स्वास्थ्य है उसका सीधा संबंध हमारे स्वास्थ्य से है।

प्रस्तुति—अजय वर्मा

 

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