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Report: OPD का खर्च भी दे हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां

Report: OPD का खर्च भी दे हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। एक संसदीय समिति ने निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए अपनी रिपार्ट में कुछ जरूरी सुझाव दिए हैं। इस रिपोर्ट को अगर केंद्र सरकार मान लेती है तो उपचार पर बेतहाशा खर्च पर रोक गल सकेगी जिसका फायदा मरीजों को पहुंचेगा। समिति ने हेल्थ इंश्योरेंस वालों को OPD के खर्च का भुगतान करने की भी बात कही है।

ये हैं प्रमुख सिफारिशें

संसदीय समिति ने स्वास्थ्य बीमा का दायरा अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित रखने के बजाय ओपीडी इलाज तक बढ़ाने की सिफारिश की है। समिति ने आईआरडीएआई को मानक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में व्यापक ओपीडी कवरेज अनिवार्य करने को कहा है। इसमें पुरानी बीमारियों के मरीजों के लिए नियमित जांच, दवाओं और विशेषज्ञ चिकित्सकों के परामर्श का खर्च भी शामिल करने की सिफारिश है। रिपोर्ट के मुताबिक, ओपीडी में एक बार इलाज कराने पर मरीज को अपनी जेब से औसतन 861 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। मधुमेह, ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारी जैसी बीमारियों में मरीजों को बार-बार डॉक्टर को दिखाना और जांच-दवा करानी पड़ती है। इसलिए स्वास्थ्य बीमा में सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने का खर्च नहीं बल्कि ओपीडी का खर्च भी शामिल होना चाहिए।

फीस की सूची सार्वजनिक हो

समिति ने अस्पतालों को अपनी पूरी शुल्क सूची सार्वजनिक करने की सिफारिश की है। मरीज को भर्ती या इलाज शुरू होने से पहले यह जानकारी मिलनी चाहिए कि किस सेवा के लिए कितना शुल्क लिया जाएगा। समिति के मुताबिक पारदर्शी शुल्क व्यवस्था से छिपे शुल्क और अनावश्यक जांच जैसी समस्याओं पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। समिति ने मेडिकल प्रक्रियाओं और डायग्नोस्टिक टेस्ट के लिए शुल्क की अधिकतम सीमा तय करने वाली एक वैधानिक संस्था बनाने की सिफारिश की है। ‘सरकारी और निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की वहनीयता और पहुंच’ पर अपनी रिपोर्ट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने कहा कि कीमत तय करने के लिए एक समान व्यवस्था नहीं होने से लोगों का अपनी जेब से होने वाला खर्च बढ़ रहा है। इसका असर खासकर कम और मध्यम आय वाले परिवारों पर पड़ रहा है।

नियामक संस्था तय करे फीस

समिति ने सिफारिश की कि स्वास्थ्य मंत्रालय जरूरी प्रक्रियाओं और डायग्नोस्टिक टेस्ट की फीस की अधिकतम सीमा तय करने और उसे लागू कराने के लिए एक राष्ट्रीय वैधानिक संस्था बनाए। इसके लिए मुंबई के टाटा मेमोरियल सेंटर में अपनाई जाने वाली व्यवस्था को मॉडल बनाया जा सकता है। रिपोर्ट तैयार करने से पहले समिति ने स्वास्थ्य नियामकों, अस्पतालों की मान्यता देने वाली संस्थाओं, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी और देश के दवा नियामक से भी जानकारी एकत्रित ली। समिति ने अस्पताल के कमरों के ज्यादा किराए पर भी चिंता जताई, खासकर बड़े महानगरों में। उसने कहा कि कुछ निजी अस्पताल हॉस्पिटल में रहने के लिए बड़ी रकम लेते हैं। समिति ने सिफारिश की कि बड़े शहरों के निजी अस्पतालों में सामान्य कमरे का किराया उस अस्पताल के आसपास मौजूद तीन सितारा होटलों के औसत कमरे के किराए से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

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