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प्रयासों के बावजूद मेडिकल खर्च में 14 फीसद की वृद्धि

नयी दिल्ली ( स्वस्थ भारत मीडिया)। भारत में स्वास्थ्य के मद में सरकारी खर्च बढ़ने और सस्ती दवाओं के बावजूद इलाज का खर्च लगभग 14 फीसद बढ़ गया है। कई राज्यों में तो यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक है। वेतनभोगी वर्ग पर तो इसका गंभर असर होता है।

9 करोड़ लोग मेडिकल महंगाई से प्रभावित

बीमा तकनीक कंपनी प्लम की एक हालिया रिपोर्ट में यह बात समने आयी है। उसका आकलन है कि भारत में मेडिकल मुद्रास्फीति की दर 14 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुकी है। बीमा नहीं होने के कारण 71 प्रतिशत लोगों को इलाज का खर्च खुद उठाना पड़ता है। केवल 15 प्रतिशत को ही उनके नियोक्ता द्वारा बीमा उपलब्ध कराया जाता है। संख्या के लिहाज से करीब नौ करोड़ लोग मेडिकल महंगाई से बेहद प्रभावित हैं, क्योंकि उनके कुल खर्च में स्वास्थ्य पर खर्च का हिस्सा 10 प्रतिशत से भी अधिक है।

कामगारों का स्वस्थ रहना जरूरी

रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2022 में कामगारों की कुल संख्या लगभग 52.2 करोड़ थी, जो 2030 तक लगभग 57 करोड़ हो जायेगी। जबकि पांच फीसद से भी कम कंपनी कामगारों को बीमा की सुविधा देती है। बेहतर अर्थव्यवस्था के लिए श्रमशक्ति का स्वस्थ होना और मेडिकल खर्च की चिंता से दूर रखना बहुत जरूरी है। गंभीर बीमारियों से जूझते 85 प्रतिशत कामगारों ने बताया कि उन्हें कंपनी से मदद नहीं मिल रही है।

मेडिकल सामग्री की कीमतें भी बढ़ीं

आंकड़े बताते हैं कि संक्रामक रोग के इलाज के लिए 2018 में औसतन बीमा क्लेम 24569 रुपये होता था जो अब 64135 रुपये हो गया है। महानगरों में तो यह रकम तो और अधिक है जहां सक्रामक रोगों के लिए औसत क्लेम 30 हजार से बढ़कर 80 हजार हो गया है। अस्पताल में भर्ती होने का खर्च तो पांच गुणा बढ़ गया है। मेडिकल सामग्री की कीमत बढ़ने से बीमा कंपनियां प्रीमियम भी बढ़ा देती हैं। हालत यह है कि लोग वेतन का 10 फीसद से अधिक मेडिकल जरूरतों पर खर्च करने को मजबूर हैं।

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