नवमीत नव
नयी दिल्ली। हाल ही कबड्डी के एक राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी ने पानी में डूबते हुए एक पिल्ले को बचाया था। इस दौरान पिल्ले का दाँत उस खिलाड़ी की ऊँगली में लग गया। छोटी सी खरोंच थी तो उसने इग्नोर कर दिया। कुछ दिन बाद उसे चोट की जगह सनसनाहट महसूस होने लगी। फिर सुन्नपना और फिर गले में रुकावट। पानी या कोई तरल पदार्थ पीने पर गला पूरी तरह से चोक होने लगा और फिर लकवा आने लगा। अंततः उसकी मृत्यु हो गयी। यह क्लासिकल रेबीज का केस था। रेबीज उष्ण रक्त जानवरों के काटने से होने वाली एक बीमारी है जिसके होने पर मृत्यु की सम्भावना लगभग 100 फीसद है। भारत में हर साल एक करोड़ 70 लाख लोगों को जानवरों (कुत्ते, बिल्ली, गीदड़, लोमड़ी, भेड़िया, चमगादड़ आदि) के द्वारा काटा जाता है और लगभग 18 से 20 हजार लोगों को रेबीज की बीमारी से उनकी मृत्यु हो जाती है। इसमें सबसे ज्यादा अफ़सोसजनक बात ये है कि इन सभी मौतों को रोका जा सकता है लेकिन ये रुक नहीं पा रही हैं। इससे कैसे बचा जा सकता है? इसके लिये सबसे पहले हम रेबीज के बारे में थोड़ी सी बेसिक जानकारी हासिल करेंगे।
रेबीज है क्या?
यह एक वायरल इन्फेक्शन जनित रोग है जो Lyssavirus नामक एक वायरस से होता है। यह वायरस संक्रमित जानवरों की लार में पाया जाता है। इन जानवरों, विशेषकर कुत्ते के द्वारा काटने या खरोंच मारने पर यह वायरस उसकी लार के द्वारा व्यक्ति के शरीर में प्रविष्ट कर जाता है। अब इसके बाद अगर समय रहते इसका मुकम्मल इलाज न किया जाये तो यह शर्तिया मृत्यु का कारण बनता है। भारत में 95 फीसद केस संक्रमित कुत्ते के काटने से होते हैं। इस संक्रमण की विशेषता होती है कि यह काटे जाने के बाद जब हमारे शरीर में प्रवेश करता है तो यह हमारे रक्त में नहीं जाता बल्कि तंत्रिकाओं के माध्यम से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र यानी मस्तिष्क तक पहुँचता है। काटे गये अंग से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक इसके पहुँचने की गति बहुत ही कम होती है और टांग या हाथ पर काटने के बाद मस्तिष्क तक पहुंचने में इसे लगभग 20 से अधिक दिन लग जाते हैं। अगर पीड़ित व्यक्ति बच्चा है या फिर चेहरे, सर या गर्दन पर काटा है तो 4 से 7 दिन में भी पहुँच सकता है। सामान्यतः काटने के बाद मस्तिष्क तक पहुंच कर बीमारी होने में एक से तीन महीने लगते हैं। कुछ दुर्लभ केसों में एक वर्ष भी लग जाता है। यह निर्भर करता है कि कहाँ पर काटा है (चेहरा या हाथ-पैर), कितना बड़ा घाव है, कितना वायरस अंदर गया है और व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर। लेकिन एक बार यह मस्तिष्क तक पहुंच गया तो इसके लक्षण शुरू हो जाते हैं। फिर इसका कोई इलाज नहीं है।
रेबीज के प्रारंभिक लक्षण
- बुखार
- थकान
- काटे गये स्थान पर जलन
- सनसनाहट
- खुजली
- फिर इसका उग्र रूप आयेगा जिसमें पानी, हवा और रोशनी से डर लगना, घबराहट, भ्रम, चिल्लाना, अत्यधिक लार बनना आदि होने लगेंगे।
- फिर मांसपेशियों में कमजोरी और उसके बाद पक्षाघात यानी लकवा आना शुरू हो जायेगा। अंत में मृत्यु।
आखिर इलाज क्या है?
बीमारी होने के बाद कोई मुकम्मल इलाज नहीं है। निदान सामान्यतः लक्षणों के आधार पर किया जाता है। तो इससे बचाव कैसे करें? यह सबसे जरूरी बात है जो हम सबको पता होनी चाहिये।
अगर आपको कुत्ते या किसी जानवर ने काट लिया है तो सबसे पहले आप अपने घाव को नल चला कर पानी और साबुन के साथ लगातार 15 से 20 मिनट तक धोयें। 15 मिनट से कम नहीं। इससे ज्यादातर वायरस धुल कर निकल जायेगा। यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसको बिलकुल भी इग्नोर न करें। धो कर इस पर कोई एंटीसेप्टिक जैसे Povidone iodine लगाएं।
घाव पर पट्टी बिलकुल भी न करें। इसको खुला रखें। अगर बहुत बड़ा घाव है तो स्वास्थ्य कर्मी ढीले टांके लगा सकता है।
घाव को जलाएं नहीं।
घाव पर कोई घरेलू टोटके जैसे मिर्च आदि नही बाँधने चाहिये। यह नुकसान ही करेगा।
टेटनस का टीका लगवाएं।
डॉक्टर की सलाह से एंटीबायोटिक्स का कोर्स शुरू करें।
जानें वैक्सीन के बारे में
अब बारी आती है PEP यानी post exopsure prophylaxix यानी वायरस के संपर्क में आने के बाद दिये जाने वाले बचाव की। किसी भी वैक्सीन से बचाव योग्य बीमारी के लिये वैक्सीन हम उस बीमारी के सम्पर्क से पहले दी जाती है ताकि हमारा शरीर पहले ही उसके विरुद्ध एंटीबॉडीज बना ले। लेकिन रेबीज में हम यह सम्पर्क के बाद देते हैं। क्यों? क्योंकि इस केस में संपर्क में आने के बाद बीमारी शुरू होने बीच का समय काफ़ी लम्बा होता है। इस दौरान वैक्सीन का कोर्स करवा कर हम इस बीमारी के खतरे को लगभग 99.9 फीसद तक खत्म कर सकते हैं।
किसी भी जानवर के काटे के घाव के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तीन Exposure Categories बनायी गयी हैं:
Category I : इसमें आता है छूना या चाटना। त्वचा बिलकुल दुरुस्त है। कोई खरोंच तक नहीं है। इसमें कुछ भी इलाज या बचाव करने की आवश्यकता नहीं है।
Category II : इसमें खरोंच है लेकिन खून नहीं निकला है। इस केस में वैक्सीन का पूरा कोर्स जरूरी है।
Category III : इसमें जानवर द्वारा काटा गया है, खून निकला है, घाव बना है। इसमें वैक्सीन के पूरे कोर्स के साथ RIG (Rabies Immunoglobulin) घाव के अंदर लगवाना जरूरी है।
वैक्सीन कैसे देते हैं?
वैक्सीन या तो हम IM यानी कंधे की deltoid मांसपेशी में दे सकते हैं या फिर ID यानी त्वचा की परतों के बीच में दे सकते हैं। ध्यान रहे कि जिस तरीके से पहली डोज़ दी गयी है उसी तरीके से बाकी डोज़ भी दी जायें। जिस ब्रांड की और प्रकार की वैक्सीन पहली डोज़ में दी गयी है उसी से पूरा कोर्स किया जाये।
आपने पहली डोज़ मांसपेशी में लगवायी है तो आपका शेड्यूल बनेगा :
Day 0 : पहली डोज
Day 3 : दूसरी डोज
Day 7 : तीसरी डोज
Day 14 : चौथी डोज
Day 28 : पाँचवीं डोज
अगर आप त्वचा की परतों के बीच लगवा रहे हैं तो चार डोज ही लेनी होगी:
Day 0 : पहली डोज
Day 3 : दूसरी डोज
Day 7 : तीसरी डोज
Day 28 : चौथी डोज
यह शेड्यूल Category II और Category III घावों के लिये है। साथ ही Category III घावों के लिये RIG Rabies Immunoglobulin भी घाव के अंदर और उसके आसपास इंजेक्शन द्वारा दिया जाता है। अगर आप जानवर द्वारा काटे जाने के बाद उपरोक्त सभी स्टेप्स को फॉलो करते हुए डॉक्टर या स्वास्थ्य केंद्र से वैक्सीन व RIG की सही व समय पर पूरी खुराक लेते हैं तो आपको रेबीज होने की सम्भावना लगभग नगण्य हो जाती है। ध्यान रहे कि काटे जाने के बाद तुरंत घाव को चलते पानी में साबुन व पानी से धोकर जितना जल्दी हो सके वैक्सीन का कोर्स शुरू कर लें।
इस बारे में कुछ गलत धारणाएं
एक धारणा है कि अगर खून नहीं निकला तो कोई खतरा नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि खरोंच से भी वायरस फैल सकता है अगर लार का संपर्क हुआ हो तो। पंजा मारने से रेबीज नहीं होगा लेकिन अगर दाँत लगा है तो चाहे खून आया है या नहीं, वैक्सीन जरूर लगवाएं। अगर सन्देह है कि पंजा लगा है या दाँत तो उसे दाँत मान कर वैक्सीन लगवाएं। अगर पंजे के साथ लार का सम्पर्क है तो भी वैक्सीन लगवाएं।
दूसरी धारणा है कि पालतू कुत्ते के काटने से कुछ नहीं होता। सच्चाई यह है कि पालतू जानवर के काटने के बाद भी रेबीज के केस मिले हैं। इसलिये हर काटने को गंभीर मानें।
कुछ लोग सोचते हैं कि झाड़-फूंक और देसी इलाज से रेबीज ठीक हो जाएगा। जबकि सच्चाई यह है कि एक बार लक्षण आने पर कोई इलाज संभव नहीं है।
एक गलत धारणा है रेबीज वैक्सीन से कमजोरी होती है या गंभीर साइड इफेक्ट्स होते हैं। सच्चाई यह है एंटी रेबीज वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है। मौत और जिंदगी के बीच में यह एकमात्र दीवार है।
एक चीज का और ध्यान रखें। WHO और भारत की राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण गाइडलाइन्स के अनुसार काटने या खरोंचने वाला जानवर अगर पालतू हो, वैक्सीनेटेड हो, 10 दिनों से अधिक समय तक जीवित हो और स्वस्थ दिखाई दे रहा हो तो उस स्थिति में Post-Exposure Prophylaxis (PEP) यानी वैक्सीन की जरूरत नहीं होती। लेकिन इसके लिये 10 दिन इंतज़ार नहीं करना है। पहले दिन ही वैक्सीन व जरूरत हो तो RIG का कोर्स शुरू कर दें। तीन डोज़ 0,3 और 7 दिन वाली तो जरूर लें। अगर 14वें या 28वें दिन तक जानवर जीवित और स्वस्थ है तो फिर आप बंद कर सकते हैं।
RIG यानी immunoglobulin पहली डोज़ के साथ day 0 पर एक ही बार दी जाती है। उस समय उपलब्ध न हो तो पहली डोज़ के बाद 7 दिन होने से पहले ही लगवा लें। 7 दिन के बाद लगवाने की जरूरत नहीं है।
याद रखें। रेबीज एक 100 फीसद जानलेवा रोग है लेकिन इसे 100 फीसद रोका भी जा सकता है। किसी भी प्रकार की लापरवाही घातक हो सकती है। भारत सरकार ने 2030 तक देश को रेबीज मुक्त करने का लक्ष्य घोषित किया है।
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