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…ताकि नई पीढ़ी मानसिक गुलाम न बने

...ताकि नई पीढ़ी मानसिक गुलाम न बने

आशुतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली। सबसे खूबसूरत शब्दों में से एक है आज़ादी। जब से होश संभाला है, इस शब्द ने बहुत प्रभावित किया है। स्कूल के दिनों में अक्सर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भाषण देने का मौका मिलता था, शायद उस समय इस शब्द की खूबसूरती को इतनी गहराई से नहीं समझ पाए थे। तब तो अच्छे-अच्छे शब्दों को वीर-रस का चाशनी में घोलकर बोलने में बड़ा मजा आता था।
एक वाकया याद आ रहा है। शायद मैं 6-7 साल का था। हमारे गांव के बगल में एक गांव है मधवापुर। वहीं पर एक मॉटेसरी स्कूल खुला था जिसका नाम था सरस्वती शिशु सदन। मेरे बड़े भैया उसमें पढ़ाते थे और मेरा नाम भी उसी स्कूल में लिखवा दिया गया था। वैसे बचपन में मुझे पढ़ने में बहुत ज्यादा मन लगता नहीं था लेकिन बातूनी तो था ही। मेरा एडमिशन जून-जुलाई में हुआ था और अगले महीने ही 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस। मॉटेसरी स्कूल भी नया-नया ही खुला था, सो वहां के शिक्षक अपने यहां पढने वाले बच्चों को अंग्रेजी में भाषण की तैयारी कराने लगे। अंग्रेजी में भाषण बोलने वालों की सूची में मुझे भी रखा गया। ऑनरेबल प्रेसिडेंट, टीचर एंड माई डियर ब्रदर्स एंड सिस्टर्स…टूडे इज इंडीपेंडेंस डे…इस तरह की 10-15 पंक्तियों का भाषण मुझे याद करना था।
15 दिनों की तैयारी के बाद मैंने अपना भाषण पूरी तरह तैयार कर लिया। अंग्रेजी में भाषण देने वालों की सूची में से मैं ही भाषण याद कर पाया था बाकी किसी का भाषण ठीक से तैयार नहीं हुआ था। 15 अगस्त को सरस्वती शिशु सदन के प्रागण में झंडातोलन हुआ और शुरू हुआ भाषण एवं गीत-संगीत का दौर। मेरा भी नंबर आया। मैं निडरता पूर्वक अपना रटा-रटाया भाषण, वह भी माइक के माध्यम से जाकर सुना आया। भाषण खत्म होने के बाद सभी बच्चों के साथ आसपास के दो-तीन गांवों में बच्चों से प्रभातफेरी कराई गई। अंग्रेजी में भाषण देने के कारण उस दिन मैं आकर्षण का केन्द्र बिन्दु बन चुका था। जहां भी जाता था, कोई न कोई मुझसे मेरा भाषण सुनाने को कहता। और मैं भी बहुत ही आनंद के साथ तोते की तरह अपना रटा-रटाया भाषण सुना देता।
समय बीतता गया। प्रत्येक साल 15 अगस्त, 26 जनवरी को मैं अपना विशेष भाषण तैयार करता और जबतक स्कूल में रहा, हमेशा भाषण में प्रथम स्थान प्राप्त किया। बचपन में दिए गए भाषण में कही कई अपनी बातों को जब वर्तमान में तर्क की कसौटी पर कसता हूं तो लगता है कि आज़ादी अभी भी कोसो दूर है। हम भौगोलिक रूप से आज़ाद हुए हैं। मानसिक रूप से अभी भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए है।
इतना ही नहीं, आज हम कुसंस्कारों के गुलाम होते जा रहे हैं। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में हमने अपनी जिंदगी को मशीन बना लिया है। शारीरिक श्रम से हमारा नाता टूट-सा गया है जिसका परिणाम है कि हम लगातार बीमारियों के मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं। अपने संस्कार छोड़ने के कारण हम व्यष्टिवादी यानी मतलबी हो गए हैं। संयुक्त परिवार की कौन कहे, अब तो एकल परिवार भी एकल नहीं रह गया है। पति-पत्नी साथ रहकर भी साथ नहीं हैं, बच्चों की परवरिश आया के जिम्मे है। ऐसे में हम जिस तरह के नागरिकों का निर्माण कर रहे हैं, उनमें सामूहिकता के भाव का अभाव स्वाभाविक रूप से है। आज कम उम्र के बच्चे भी मानसिक अवसाद के शिकार हो रहे हैं। परिवार का ताना-बाना टूटने से उन्हें पारिवारिक सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। उनकी सामाजिकता में रिश्ते-नातों की जगह, इंनडोर गेम्स एवं इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स ने ले रखे हैं। उनके मनोरंजन के साधन बदल गए हैं, उनकी भाषा बदल गई है। बदले हुए साधन एवं भाषा के कारण उनमें विदेशी मानसिकता घर कर गई। अपनी चीजों की अहमियत न के बराबर है। भारतीयता पर नव उपनिवेशवादिता हावी है।
नई पीढ़ी को मानसिक गुलामी के जंजीरों से जकड़ के हम जिस हिन्दुस्तान की नींव रख रहे हैं, वह हिन्दुस्तान के लिए किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। आदि शंकराचार्य, गौतम बुद्ध, महावीर, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, संत विनोबा भावे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राजेन्द्र प्रसाद और एपीजे अब्दुल कलाम जैसे भारत के मनीषियों ने भारत को लेकर जो सपना देखा था, वह ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं था। उनका सपना राम राज का सपना था। स्वराज का सपना था। सबके साथ का सपना था। विश्व गुरू भारत का सपना था। इन सपनों को साकार करने के लिए जरूरी है कि आज हम खुद और अपने आने वाली पीढ़ी में भारतीयता का बीजारोपण करें और उन्हें मानसिक रूप से गुलाम होने से बचाएं ताकि वे आजादी के मर्म को अपने जीवन में ठीक से समझ सकें और आजाद भारत के आजाद नागरिक बन सकें।

(लेखक स्वस्थ भारत (न्यास) के चेयरमैन व वरिष्ठ स्वास्थ्य पत्रकार हैं।)

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