• एक गहरी सामाजिक चुनौती बनता बुज़ुर्गों का अकेलापन
• खासतौर से शहरी क्षेत्रों में यह एक बड़ी सामाजिक समस्या के रूप में सामने आ रहा है
• वटवृक्ष पैरेंट केयर इस दिशा में एक उम्मीद की किरण जगा रहा है
आशुतोष कुमार सिंह (वरिष्ठ स्वास्थ्य पत्रकार)
नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। शहरी भारत में बुज़ुर्गों के बीच अकेलेपन की समस्या तेजी से गंभीर रूप ले रही है। परिवारों के आकार में कमी, व्यस्त जीवनशैली और बच्चों का विदेश या अन्य शहरों में बस जाना, आज की तारीख में बुज़ुर्गों को सामाजिक और भावनात्मक रूप से अलग-थलग कर रहा है। राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड (2023) और कई गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए गए हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 33 फीसद बुज़ुर्ग अकेलेपन और सामाजिक अलगाव से पीड़ित हैं। यह अकेलापन केवल मानसिक स्वास्थ्य को नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है, जिससे हृदय रोग, अवसाद, स्मृति ह्रास और यहां तक कि समयपूर्व मृत्यु का भी खतरा बढ़ जाता है (NSSB Report, 2023)।
बदलते पारिवारिक ढांचे का असर: भारत में पारंपरिक संयुक्त परिवारों की जगह अब एकल परिवारों ने ले ली है। युवा पीढ़ी के करियर और शिक्षा की प्राथमिकताएं, विदेश प्रवास और व्यस्त दिनचर्या बुज़ुर्गों को समय और साथ से वंचित कर रही हैं (HelpAge India, Annual Report 2022-23)।
डिजिटल दूरी भी एक बाधा ; जहां एक ओर युवा वर्ग डिजिटल तकनीकों से जुड़ा हुआ है, वहीं बड़ी संख्या में बुज़ुर्ग इन तकनीकों से दूर हैं। HelpAge India द्वारा किए गए एक अध्ययन (2023) के अनुसार, केवल 27 फीसद बुज़ुर्ग नियमित रूप से इंटरनेट का प्रयोग करते हैं, जिससे वे बच्चों या दोस्तों से संपर्क बनाए रखने में असमर्थ हो जाते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव : मनोवैज्ञानिक डॉ. सुबोध कुमार के अनुसार: “अकेलापन एक धीमा ज़हर है। यह अवसाद (Depression), नींद की समस्या, और संज्ञानात्मक गिरावट का मुख्य कारण बनता है। लंबे समय तक अकेलापन बना रहे, तो यह डिमेंशिया जैसी गंभीर मानसिक स्थिति को भी जन्म दे सकता है।”
समाधान की दिशा में पहल

‘वटवृक्ष पैरेंट केयर’ (VataVriksh Parent Care) जैसे समर्पित संस्थान शहरी बुज़ुर्गों के लिए संपूर्ण देखभाल और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की दिशा में ठोस प्रयास कर रहे हैं। यह संस्थान विशेष रूप से उन परिवारों के लिए सहारा बनकर उभरा है, जहां बच्चे व्यस्त जीवनशैली के चलते अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की दिनचर्या में पर्याप्त समय नहीं दे पाते। यह संस्थान डे केयर सुविधा के अंतर्गत बुज़ुर्गों को दिनभर एक सुरक्षित, आरामदायक और देखरेख वाले वातावरण में समय बिताने का अवसर देता है, जहां वे सामाजिक संवाद, समूह चर्चा, भजन, योग, खेल, त्योहारों का आयोजन जैसी गतिविधियों में भाग लेकर एकाकीपन से राहत पाते हैं। मानसिक स्वास्थ्य सहायता के अंतर्गत डिप्रेशन, तनाव और स्मृति ह्रास जैसी स्थितियों के लिए काउंसलिंग और परामर्श सेवाएं उपलब्ध हैं। इसके साथ ही नियमित स्वास्थ्य जांच, दवा प्रबंधन, फिजियोथेरेपी और मेडिकल इमरजेंसी के लिए भी विशेष व्यवस्था की जाती है। वटवृक्ष प्रशिक्षित साथियों के माध्यम से ‘कंपैनियन केयर’ सेवा भी प्रदान करता है, जिसमें बुज़ुर्गों को भावनात्मक सहारा, बातचीत और दैनिक कार्यों में सहयोग मिलता है। डिजिटल साक्षरता बढ़ाने के लिए उन्हें स्मार्टफोन, वीडियो कॉल और व्हाट्सएप जैसी तकनीकों का उपयोग सिखाया जाता है ताकि वे अपनों से जुड़े रह सकें। संस्था परिवारजनों को भी मार्गदर्शन और काउंसलिंग प्रदान करती है, जिससे वे अपने माता-पिता की बेहतर देखभाल कर सकें।
सरकारी योजनाओं की भूमिका
सरकार द्वारा लागू ‘राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक नीति (2011)’ और ‘वृद्धाश्रम योजना’ जैसे प्रयासों के बावजूद, इन योजनाओं की शहरी बुज़ुर्गों तक पहुंच सीमित रही है। नीति आयोग की समीक्षा रिपोर्ट (2023) में इस पर विशेष ध्यान आकर्षित किया गया है।
वटवृक्ष पैरेंट केयर के चेयरमैन डॉ. रमेश गोयल का कहना है: “बुज़ुर्ग हमारे समाज की जड़ें हैं। यदि वे अकेलेपन में जिएंगे, तो पूरा सामाजिक ताना-बाना कमजोर होगा। हमें यह समझना होगा कि तकनीकी तरक्की और आर्थिक विकास तभी सार्थक हैं, जब हमारे माता-पिता जैसे बुज़ुर्गों को सम्मान, संवाद और साथ मिले। समाज, सरकार और निजी संस्थाओं को मिलकर बुज़ुर्गों की सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।”
बुजुर्गों के लिए वटवृक्ष
गुरुग्राम स्थित वटवृक्ष पैरेंट केयर सेंटर में जब मैं गया तो देखा कि वहां पर पूर्णकालिक आवासीय सुविधा भी उपलब्ध है, जो उन बुज़ुर्गों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिन्हें मेमोरी केयर (जैसे डिमेंशिया, अल्ज़ाइमर, पार्किंसंस) अथवा अन्य कारणों से असिस्टेड लिविंग की आवश्यकता होती है। इस सुविधा के अंतर्गत बुज़ुर्गों को नहाने, कपड़े पहनने, दवाएं लेने जैसे दैनिक कार्यों में सहायता प्रदान की जाती है, जिससे वे अधिकतम स्वतंत्रता के साथ सम्मानजनक जीवन जी सकें। साथ ही, यहां पुनर्वास सेवाएं (Rehabilitation) भी उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से अनुभवी विशेषज्ञों द्वारा बीमारी, चोट, स्ट्रोक, कूल्हे या घुटने के प्रत्यारोपण अथवा अन्य सर्जरी के बाद बुज़ुर्गों को समर्पित देखभाल दी जाती है, जिससे वे सहजता से स्वस्थ जीवन की ओर लौट सकें।
समाज की ज़िम्मेदारी भी ज़रूरी : छोटे-छोटे प्रयास जैसे समय देना, बातचीत करना, बुज़ुर्गों को सुनना और उन्हें यह एहसास दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं — बहुत बड़ा फर्क ला सकते हैं।
निष्कर्ष
शहरी भारत में बुज़ुर्गों का अकेलापन एक मौन महामारी की तरह बढ़ रहा है। यह समय है जब हम इस ओर गंभीरता से ध्यान दें और व्यक्तिगत, सामाजिक और संस्थागत स्तर पर ठोस कदम उठाएं। क्योंकि एक बेहतर समाज वही होता है जो अपने बुज़ुर्गों का सम्मान और देखभाल करना जानता है।
संदर्भ सूची
1. National Social Security Board (NSSB). (2023). Urban Elderly Wellbeing Report.भारत सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय।
2. HelpAge India. (2022-23). Annual Report on the Status of Elderly in India.नई दिल्ली: हेल्पएज इंडिया।
3. HelpAge India. (2023). Digital Inclusion and Elderly in Urban India: Survey Findings.नई दिल्ली।
4. VataVriksh Parent Care. (2024). Website. https://vatavriksh.com/
5. Government of India. (2011). National Policy on Older Persons.सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय।
6. NITI Aayog. (2023). Review Report on Senior Citizen Welfare Schemes in Urban Areas.नीति आयोग, भारत सरकार।
