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भारतीय वैज्ञानिक ने Liver cancer का इलाज आयुर्वेद में खोजा

भारतीय वैज्ञानिक ने liver cancer का इलाज आयुर्वेद में खोजा

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। लिवर कैंसर को लेकर खुशखबरी है। अस्पतालों में इस रोग से पीड़ितों की वाट लग जाती है और जीवन की प्रत्याशा भी क्षीण हो जाती है। लेकिन आयुर्वेद में इसका उपचार अब आसानी से हो सकेगा। ऐसा एक भारतीय वैज्ञानिक के प्रयोग से संभव हुआ है।

यूपी के रहनहार हैं डॉ. मयंक

अमेरिका स्थित ‘नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनो टेक्नोलॉजी सेंटर’ में प्रधान वैज्ञानिक व निदेशक के पद पर कार्य करते हुए वैज्ञानिक डॉ. मयंक सिंह ने अपने टीम के साथ यह उपलब्धि हासिल की है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भी मिल चुकी है। मीडिया रिर्पोट के मुताबिक डॉ. मयंक मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के हैं। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर ऐसी नैनो-औषधीय प्रणाली विकसित की है, जो लिवर कैंसर के इलाज को नई दिशा दे सकती है। यह शोध कार्य प्राकृतिक पदार्थ पेक्टिन के उपयोग से जुड़ा है। पेक्टिन एक घुलनशील फाइबर है, जो आमतौर पर फलों की त्वचा (विशेषकर सेब, नींबू, साइट्रस फल) में पाया जाता है। यह लंबे समय से आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विज्ञान में पाचन सुधारक, डिटॉक्सीफायर और सूजनरोधी एजेंट के रूप में जाना जाता रहा है।

प्राकृतिक तरीके से गोल्ड नैनो तैयार

डॉ. मयंक और उनकी टीम ने पेक्टिन का उपयोग करके प्राकृतिक तरीके से गोल्ड नैनो पार्टिकल्स तैयार किए। पेक्टिन केवल एक फाइबर नहीं, बल्कि एक स्मार्ट बायोपॉलिमर है, जिसका लक्षित वितरण तंत्र दवा को विशेष रूप से लिवर तक पहुंचाने में सक्षम बनाता है। यानी दवा सिर्फ वहीं काम करेगी जहां जरूरत है। शरीर के बाकी हिस्सों को इससे कोई नुकसान नहीं होगा। इसमें डॉक्सोरुबिसिन जैसी शक्तिशाली कैंसर-रोधी दवा का उपयोग कर पेक्टिन बेस्ड गोल्ड नैनो पार्टिकल्स पर लोड किया गया। डॉ. मयंक बताते हैं कि यह दवा प्रणाली पूरी तरह से रसायन-मुक्त, बायोडिग्रेडेबल और ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी के सिद्धांतों पर आधारित है इसलिए यह कैंसर के रोगियों पर कीमोथेरेपी के दौरान पड़ने वाले दुष्प्रभावों से बचाएगा। उदाहरण के तौर पर ठीक उसी तरह काम करती है, जैसे किसी मरीज के लिए बुलाई गई एंबुलेंस, सीधे उस स्थान पर पहुंचती है, जहां जरूरत है। इसी तरह यह पेक्टिन-आधारित गोल्ड नैनो पार्टिकल्स दवा को सीधे लिवर कोशिकाओं तक पहुंचाता है, बिना शरीर के बाकी हिस्सों को प्रभावित किए। उन्होंने बताया कि इस प्रणाली ने ‘प्री-क्लिनिकल’ परीक्षणों में यह सिद्ध किया कि यह सीधे लिवर में पहुंचकर दवा का लक्ष्य निर्धारण करती है, जिससे सामान्य कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं और साइड इफेक्ट्स कम होते हैं। यह तकनीक आगे चलकर हेपेटाइटिस, फैटी लिवर, लिवर फाइब्रोसिस और अन्य यकृत रोगों के इलाज में भी उपयोगी साबित होगीं हमारी शोध टीम अब इन-विवो बायोडिस्ट्रिब्यूशन की दिशा में आगे बढ़ रही है

मिली अंतराष्ट्रीय मान्यता

डॉ. मयंक और उनकी टीम द्वारा किए गए इस शोध को अंतराष्ट्रीय मान्यता भी मिल चुकी है। एल्सेवियर नीदरलैंड प्रकाशन समूह द्वारा अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘ड्रग डिलीवरी साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ में प्रकाशन के लिए औषधि वितरण फार्मास्युटिकल तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी पत्रिका में 28 मई 2025 को स्वीकार कर लिया गया है, जो इसकी वैज्ञानिक गुणवत्ता और वैश्विक मान्यता का प्रमाण है। शोधकार्य में चार युवा शोधार्थियों मेंसोफिया शुल्ते, रोहित कुमार, शिल्पा कुमार और स्वाती सिंह ने सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाई है। यह शोध कार्य संयुक्त रूप से दो प्रमुख अनुसंधान संस्थानों में संपन्न किया गया है। एक ओर डॉ. मयंक सिंह के नेतृत्व में मिशिगन स्थित ‘नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर’ और दूसरी ओर डॉ. अभय चौहान के पर्यवेक्षण में ‘मिलवॉकी स्थित-मेडिकल कॉलेज ऑफ विस्कॉन्सिन’ में हुआ। यह शोध अमेरिका द्वारा एक खास कार्यक्रम के तहत किया गया, जिसे ‘क्लीनिकल एंड ट्रांसलेशनल साइंस इंस्टीट्यूट’ (CTSI) नामक संस्थान द्वारा चलाया जाता है। इसमें हर साल अमेरिका के चुने गए होनहार विद्यार्थियों को वैज्ञानिक रिसर्च में काम करने का मौका दिया जाता है।

आयुर्वेेद से प्रेरित कार्य

डॉ. मयंक सिंह ने एक भारतीय चैनल को बताया कि यह शोध भारत की आयुर्वेद परंपरा से प्रेरित है। प्राचीन भारत में सोना, तांबा और लोहा जैसी धातुओं को भस्म रूप में औषधि की तरह प्रयोग किया जाता था जिसे आज विज्ञान सिद्ध कर रहा है, कि ये भस्में नैनो पार्टिकल्स ही हैं यानी भारत हजारों साल पहले से प्राकृतिक नैनो मेडिसिन का उपयोग करता रहा है। उनका मानना है, कि आयुर्वेदिक भस्म और नैनो पार्टिकल्स दोनों ही भारत की पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक विज्ञान का संगम हैं। डॉ. मयंक सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन के ग्रेजुएट फैकल्टी विश्व स्वास्थ्य संगठन के सलाहकार हैं। वे लंदन की रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के चार्टर्ड साइंटिस्ट भी हैं। हाल ही उन्हें ‘हूज हू इन अमेरिका’ डायरेक्टरी में शामिल किया गया है।

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