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दुनिया में मिला नया ब्लड ग्रुप, सिर्फ एक महिला में ये खून

दुनिया में मिला नया ब्लड ग्रुप, सिर्फ एक महिला में ये खून

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। दुनिया में 47 तरह के ब्लड ग्रुप हैं जिसमें कुछ तो कॉमन है। कुछ दुर्लभ श्रेणी के भी ब्लड ग्रुप हैं। अब एक नए ग्रुप का पता चला है और रोचक यह कि इस ब्लड ग्रुप का अभी तक दुनिया में सिर्फ एक ही शख्स में मिला है। ऐसे ब्लड ग्रुप के मरीज के लिए दूसरे अन्य ग्रुप का रक्त मैच भी नहीं करता।

ब्लड ग्रुप : फ्रांस के वैज्ञानिकों ने खोजा

रिपोर्ट के मुताबिक इसका पता फ्रांस के शोधकर्ताओं ने लगाया है। फ्रांस की रक्त आपूर्ति एजेंसी ने घोषणा की है कि कैरेबियाई द्वीप गुआ-डेलूप की एक फ्रांसीसी महिला को एक नए रक्त समूह की एकमात्र ज्ञात वाहक के रूप में पहचाना गया है, जिसे “ग्वादा नेगेटिव” कहा जाता है। फ्रांसीसी संगठन EFS के मेडिकल बॉयोलॉजिस्ट ने कहा कि 2011 में जांच करने पर बेहद असामान्य एंटीबॉडी उस मरीज के रक्त में पाया गया था। 54 साल के उस महिला की सर्जरी के पहले मेडिकल टेस्ट के दौरान इसकी पहचान हुई लेकिन ब्लड ग्रुप न मिलने के उसका ऑपरेशन रोकना पड़ा। चिकित्सकों का दावा है कि महिला को ब्लड ग्रुप उसके माता-पिता के म्यूटेटेड जीन से मिला होगा। फ्रांसीसी रक्त प्रतिष्ठान ने कहा कि यह घोषणा 15 साल बाद हुई है। इस खोज को आधिकारिक तौर पर इसी महीने इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ ब्लड ट्रांसफ्यूजन द्वारा मान्यता दी गई थी, जिसने अब तक 47 रक्त समूह प्रणालियों को मान्यता दी थी।

ब्लड ग्रुप: दुर्लभ में दुर्लभ

खोज में शामिल EFS के एक चिकित्सा जीवविज्ञानी थिएरी पेयर्ड ने कहा कि 2011 में पहली बार रोगी में एक बहुत ही असामान्य एंटीबॉडी पाई गई थी और वह दुनिया की एकमात्र व्यक्ति है। इसका नाम जी निगेटिव (Gwada negative) रखा गया है। सभी 47 में से सबसे लोकप्रिय ABO रक्त समूह प्रणाली की खोज 1900 के दशक की शुरुआत में की गई थी। फ्रांसीसी शोधकर्ताओं ने उसे अल्ट्रा रेयर यानी दुर्लभ में दुर्लभ ब्लड ग्रुप बताया है, जो ग्वाडेलिपयन महिला में पाया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह दुनिया में अब तक खोजा गया 48वां ब्लड ग्रुप है। ब्लड ग्रुप की पहचान खून चढ़ाने और अंगों के प्रत्यारोपण में बेहद अहम होती है। कुछ खास तरह की बीमारियों का पता लगाने में ब्लड ग्रुप मददगार होता है।

ब्लड ग्रुप : 14 साल बाद मान्यता

मालूम हो कि ब्लड ग्रुप की पहचान से डॉक्टरों को रक्तदाता और रक्त लेने वाले के बीच खतरे को पहले भांपा जा सकता है। अमेरिकी स्वास्थ्य संगठन यूएस सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार, सिर्फ अमेरिका में ही हर साल 1.4 करोड़ यूनिट ब्लड चढ़ाया जाता है। अगर सामान्य ए, बी और ओ ग्रुप को छोड़ दें तो दुनिया में कई तरह के दुर्लभ ब्लड ग्रुप हैं। इस ब्लड ग्रुप की पहचान को लेकर शोध 2011 में शुरू हुआ, जब उस महिला को रक्त चढ़ाने की जरूरत थी लेकिन किसी भी रक्तदाता का ब्लड ग्रुप उससे मैच नहीं कर रहा था। शोधकर्ताओं ने फिर सामान्य तरीके से उसका हीमोग्लोबिन बढ़ाने की कोशिश की और आठ साल के लंबे शोध और DNA सीक्वेंसिंग के बाद 2019 में उसके नए ब्लड ग्रुप के तौर पर पहचान की लेकिन इसे अब 14 साल बाद पूरी मान्यता मिल पाई है।

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