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जागरूकता की कमी का नतीजा है Cancer

जागरूकता की कमी का नतीजा है Cancer

डॉ. हर्षवर्धन

नयी दिल्ली। कैंसर, एक ऐसा शब्द, जो सुनते ही मन में भय और निराशा का भाव भर देता है। लेकिन सच्चाई यह है कि कैंसर मृत्यु का नहीं, बल्कि जागरूकता की कमी का परिणाम है। जब यह बीमारी प्रारंभिक चरण में पहचान ली जाए, तो इसका उपचार पूरी तरह संभव है। इसी संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए हर वर्ष 7 नवम्बर को राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सही समय पर की गई जांच और सही जानकारी किसी भी जानलेवा बीमारी से बड़ी ढाल बन सकती है।
आज भारत में हर वर्ष लाखों लोग कैंसर से प्रभावित होते हैं। दुख की बात यह है कि इनमें से बहुत से मामले तब सामने आते हैं जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। जबकि अगर शुरुआती लक्षणों पर ध्यान दिया जाए जैसे शरीर में असामान्य गांठ, वजन का अचानक घटना, लगातार खांसी या थकान, या किसी हिस्से से असामान्य रक्तस्राव तो उपचार की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन अक्सर हम इन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं, और यही लापरवाही सबसे बड़ी भूल बन जाती है।
कैंसर से लड़ाई केवल डॉक्टरों या दवाइयों की नहीं है, यह एक सामाजिक लड़ाई है, हमारे सोच, हमारी आदतों और हमारी जीवनशैली से जुड़ी हुई। धूम्रपान, तंबाकू, शराब, जंक फूड और प्रदूषण जैसे कारक इस रोग को जन्म देते हैं, जबकि संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और सकारात्मक सोच इससे रक्षा करते हैं। हमें यह समझना होगा कि कैंसर से बचाव इलाज से कहीं अधिक प्रभावी और सस्ता उपाय है।
इस दिन का असली उद्देश्य डर नहीं, बल्कि समझ पैदा करना है। हमें अपने परिवार, दोस्तों और समाज में यह संदेश फैलाना चाहिए कि नियमित स्वास्थ्य जांच कराना कमजोरी नहीं, बल्कि सजगता का प्रतीक है। हर व्यक्ति अपने स्तर पर इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, घर में चर्चा करके, सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाकर, या किसी जरूरतमंद को जांच के लिए प्रेरित करके।
आइए, इस राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस पर हम सब यह संकल्प लें कि हम खुद भी जागरूक बनेंगे और दूसरों को भी जागरूक करेंगे। क्योंकि कैंसर से डरना नहीं है, उसे समझकर हराना है। जागरूकता ही वह रोशनी है जो अंधकार में उम्मीद की किरण जलाती है, एक स्वस्थ, सशक्त और संवेदनशील भारत के निर्माण की दिशा में हमें लेकर आगे बढ़ेगी।

(पूर्व स्वास्थ्य मंत्री, भारत सरकार)

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