नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। रूमेटोलॉजिस्ट यानी गठिया रोग विशेषज्ञ डॉ. उमा कुमार कहती हैं कि यह रोग बहुत सारी बीमारियों का लक्षण है। डॉ. साहिबा दिल्ली एम्स में इस विभाग की अध्यक्ष हैं। उनसे The thermometer के तीसरे एपिसोड में बातचीत हुई थी। यह बातचीत द थर्मामीटर टॉक शो जो स्वस्थ भारत मीडिया का यूट्यूब चैनल है पर हुई थी।
आशुतोष: जब कोई डॉक्टर रूमेटोलॉजिस्ट से दिखाने के लिए रेफर करता है तो इसका क्या मतलब है?
डॉ. उमा: जैसे किसी को चोट लगी, फ्रैक्चर हुआ, हड्डी की परेशानी हुई तो वो ऑर्थोपेडिक सर्जन के पास जाते हैं। हड्डियां हैं और वो जुड़ती हैं तो जोड़ बनते हैं। कोई भी मेडिकल डिसऑर्डर किसी और बीमारी की वजह से हुई है। उन बीमारियों को जो डील करते हैं, उनको हम रूमेटोलॉजिस्ट या गठिया रोग विशेषज्ञ भी कह सकते हैं। गठिया सुनने में जितना सिंपल लगता है, उतना है नहीं। वो एक लक्षण मात्र है बहुत सारी बीमारियों का। तो गठिया रोग विशेषज्ञ बहुत ही सिंपलीफाइड टर्म है रूमेटोलॉजिस्ट के लिए।
आशुतोष: साधारण लोगों को कैसे लगेगा कि गठिया रोग के लक्षण दिख रहे हैं?
डॉ. उमा: जहां पर दो हड्डियां जुड़ती हैं वो गांठ यानी जोड़ बन जाता है। लेकिन जोड़ सिर्फ दो हड्डियों से ही नहीं बनता। दोनों हड्डियों को जोड़ने वाले कुछ स्ट्रक्चर्स होते हैं, कुछ चीजें होती हैं जो उनको कनेक्ट करके रखती हैं। मसल्स भी इंपॉर्टेंट होती है जोड़ को बनाने में। तो कुल मिला कर लिगामेंट्स, टेंडेंस, जॉइंट कैप्सूल, उसके अंदर का फ्लूइड और जॉइंट के ऊपर का आर्टिकुलर सरफेस, जहां कार्टिलेज होता है जिसे शॉक एब्सॉर्बर भी कहा जाता है और मांसपेशियां। इनमें कोई भी परेशानी है, कोई भी डिसऑर्डर है, दर्द है, मतलब कोई भी तकलीफ होगी तो दर्द से ही मैनिफेस्ट करेगी। तो यह समझा जाता है कि इस इंसान को जोड़ों की परेशानी हो गई है। जब जोड़ों में दर्द हो रहा है तो वो गठिया भी हो सकता है और नहीं भी। जोड़ में सिर्फ दर्द हो रहा होता है किसी वजह से और जैसे मान लीजिए, कोई खास काम करने का आदि नहीं है। उसने बहुत ज्यादा काम कर लिया तो जिन जोड़ों का इस्तेमाल हुआ उस काम में तो उसमें दर्द शुरू हो गया। जब वो रेस्ट देगा उस जॉइंट को तो ठीक हो जाएगा। तो वो गठिया नहीं हुआ। कहने का मतलब कि हर दो जोड़ का जो दर्द है वह गठिया नहीं होता।
आशुतोष: तो गठिया कब होता है?
डॉ. उमा: जैसे जोड़ में सूजन, लालिमा आ गई, कामकाज करने पर बहुत दर्द हो जोड़ों में…जब सुबह सोकर उठने पर आधे घंटे से अधिक जकड़न रहे। यह सारे अगर लक्षण मिल रहे हैं तो कहते हैं कि यह गठिया का लक्षण है। वो एक दिन के लिए भी हो सकता है और महीनों तक हो सकता है। लेकिन अगर यह स्थिति जोड़ में चोट लगने के बाद आई है तो हड्डी के डॉक्टर के पास जाएंगे। अगर चोट नहीं लगी जोड़ में और उसके बाद ही अचानक से प्रॉब्लम हो गई है तो रूमेटोलॉजिस्ट के पास जाना होता है। तो जैसे मैंने कहा कि गठिया सुनने में साधारण लगता है या आम लोगों के लिए यह टर्म यूज़ किया जाता है। लेकिन जोड़ों में तकलीफ ना हो और परेशानी हो तो भी गठिया हो जाता है। जैसे लक्षण की बात करें तो जोड़ में तो ये परेशानी हो गई। लेकिन इसके बहुत प्रकार होते हैं।
आशुतोष: यानी गठिया भी कई तरह का होता है?
डॉ. उमा: इसमें 200 से ज्यादा प्रकार की कंडीशंस इंक्लूडेड होती हैं जिसमें जोड़ों में तकलीफ हो सकती है। जोड़ों में तकलीफ के साथ-साथ लक्षण को देखकर डायग्नोसिस होती है। जैसे किसी के जोड़ों में दर्द शुरू हुआ। एंकल में सूजन आ गई। अंगूठे में सूजन आ गई तो उस समय हम सोचेंगे कि हो सकता है कि इसको एक कंडीशन होती है स्पॉन्डाइलो अर्थराइटिस जिसमें कमर के जो जोड़ हैं, उसमें भी असर आ जाता है जो पुरुषों में ज्यादा मिलता है या फिर देखेंगे कि कहीं गाउट तो नहीं है। है तो गठिया की शुरुआत कैसे हुई? कौन-कौन से जोड़ उसमें प्रभावित हो रहे हैं और जोड़ों के साथ-साथ और क्या लक्षण हैं? बुखार है, मुंह में छाले हैं, आंखों में सूखापन आ गया है। मतलब आंसू नहीं बन रहे। मुंह में सूखापन आ गया है। मतलब लार कम बन रही है या कानों से सुनना बंद हो जाए अचानक। आंख की रोशनी चली जाए अचानक। साथ में जोड़ के लक्षण हैं सांसों का फूलना, खून की उल्टियां होना या बलगम में खून आना जिसे हिमोप्टेसिस कहते हैं। पेट में दर्द रहता है जो खाने के बाद शुरू होता है या पैंकक्रिएटाइटिस या इंटेस्टीन का इन्वॉल्वमेंट, जिसे हम विसरल स्कीमिया कह देते हैं। किसी को दौरे आने शुरू हो जाए, कोई बेहोश हो जाए। मतलब ऐसे तमाम लक्षण हैं जिनके आधार पर गठिया का पता चलता है।
आशुतोष: इतने तमाम लक्षण हैं जो गठिया के कारण बन सकते हैं? तब तो कंफ्यूजन भी होगा। बलगम से खून आने पर टीबी की शंका हो सकती है। आप कह रहे हैं कि गठिया भी हो सकता है। तो इसे दूर करने के लिए आम आदमी को सबसे पहले क्या करना चाहिए? मतलब किसी फिजिशियन के पास जाए या सीधे रूममेटोलॉजिस्ट के पास?
डॉ. उमा: भारत में बहुत हाल में, लगभग 10 साल में ये डेवलपमेंट हुआ है रूमेटोलॉजी में। तो रूमेटोलॉजिस्ट की संख्या बहुत कम है। मैं कहूंगी फिजिशियन के पास जाएं क्योंकि ये जितनी भी बीमारियां है वो दवाओं से ठीक होने वाली हैं। फिजिशियंस इन बीमारियों के बारे में जानते हैं। एमडी मेडिसिन की किताबों में यह पढ़ाई जाती है। रूमेटोलॉजी पर भी कुछ पेजेस बढ़ गए हैं किताबों में तो फिजिशियन के पास जाना चाहिए। फिजिशियन को लगे कि ये स्टेज बढ़ गया है स्पेसिफिक रुमेटोलॉजिस्ट के पास ही जाना है तो वो रेफर करेगा।
आशुतोष: भारत में कितने रुमेटोलॉजिस्ट हैं? बड़े शहरों में होंगे ही लेकिन गांव—देहात के आम लोग?
डॉ. उमा: बहुत कम हैं। गिनती योग्य। अगर मैं बोलूं कि 2000 या इसके आसपास होंगे लेकिन पिछले कुछ सालों में ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू हुए हैं। डिपार्टमेंट्स बनने शुरू हो गए हैं। चाहे वो कॉर्पोरेट हॉस्पिटल हो या फिर गवर्नमेंट। सीट्स भी बढ़ी है इस दौरान। मेरी समझ में एक साल में 50 के करीब सीट्स आ रही हैं। जब शुरुआत हुई थी 2012 के आसपास, उस समय तो सीट्स भी बहुत कम थी। अब लोग आ रहे हैं। रूमेटोलॉजी तो डिमांड में भी है। तो मतलब फ्यूचर इज ब्राइट। लेकिन लोग ये ना सोचें कि रूमेटोलॉजिस्ट के पास ही पहुंचना है। क्या होता है कि कभी-कभी अपॉइंटमेंट बहुत देरी से मिलती है। हफ्तों—महीनों गुजर जाते हैं। इसलिए जो आपके डॉक्टर हैं, उनसे तो सलाह जरूर लें। कम से कम कुछ शुरुआत हो। डायग्नोसिस तो हो जाए। कुछ लाइफ थ्रेटनिंग लक्षण होते हैं, कुछ में तुरंत इलाज से राहत मिल जाएगी। सिम्टम कंप्लीटली रिवर्स हो सकता है। अगर अचानक आंख की रोशनी चली गई तो तुरंत इलाज से कुछ दिन के अंदर नॉर्मल हो जाता है।
आशुतोष: रोशनी फिर वापस आ जाती है?
डॉ. उमा: जैसे वैस्कुलाइटिस होती है। उसमें जो नसें, वसल्स, आर्टरीज, वेंस होते हैं तो आर्टरीज में सूजन आ जाती है। जब सूजन आएगी तो ब्लॉकेट की वजह से सर्कुलेशन कम हो जाएगा एक पर्टिकुलर पार्ट का। सर्कुलेशन कम होने से उसका जो फंक्शन है वो भी अफेक्टेड हो जाएगी। तो जैसे ही आपने दवा दिया और सूजन बिल्कुल कम हो गया तो ऑब्वियसली जब तक डैमेज नहीं हुई है तब तक तो रिवर्सल हो ही सकता है। अगर क्रॉनिक स्कीमिया है यानी क्रॉनिक हो गई है वह प्रॉब्लम तो डैमेज शुरू हो जाती है। टिश्यू डेड हो जाएगा तब रिकवरी कितनी होगी, कहना मुश्किल है। जैसे किसी को हार्ट अटैक होता है तो कहते हैं ना कि जितनी जल्दी गोल्डन आवर में डॉक्टर के पास ले जाएं। होता ऐसा हमारी भी बीमारियों में गोल्डन आवर होता है। गोल्डन आवर कुछ मिनटों का, कुछ घंटों, कुछ दिनों या कुछ महीनों का हो सकता है। जैसे रूमेटॉइड अर्थराइटिस। इसमें विलंब पर भी खास डैमेज की संभावना नहीं होती। लेकिन वैस्कुलाइटिस ऑर्गन थ्रेटनिंग है अगर समय पर नहीं पहुंचे तो।
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आशुतोष: आपने कहा कि दर्द का निवारण रुमेटोलॉजी करता है। तो आज का जो युवा है वो कई कारणों से स्ट्रेस में है। वर्किंग स्टाइल ऐसी कि 8 घंटे से 10 घंटे ही नहींं, उससे भी ज्यादाउन्हें बैठना होात है। दर्द में भी वो रहते हैं। तो क्या वैसे लोगों को भी रुमेटोलॉजी में और रुमेटोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए या लाइफस्टाइल में क्या कुछ करें?
डॉ. उमा: संपर्क तो करना चाहिए अगर कोई परेशानी बहुत दिनों तक टिकी हुई है। एक—दो दिन हुआ, रेस्ट लिया ठीक हो गया तो आप सोच सकते हैं कि ठीक है वर्क से रिलेटेड है। लेकिन अगर वह स्थिति बनी हुई है तो आपको कोई बताने वाला तो चाहिए कि यह सीरियस प्रॉब्लम है।डिफरेंशिएशन जरूरी है। एक बार यह पता चल जाए कि वर्क रिलेटेड है तो सिर्फ लाइफस्टाइल से आपको आराम मिलेगा। लेकिन शुरुआत में जाना तो चाहिए। युवा ही नहीं, डॉक्टर्स भी एक ही पोजीशन बैठे लिखते जा रहे हैं। उनको भी हर 20 मिनट्स में 2 मिनट्स के लिए वॉक कर लेना है, स्ट्रेच कर लेना है।
आशुतोष: आम युवाओं को आप क्या कहेंगे कि वो कैसे अपने इस स्ट्रेसफुल लाइफ को सही करें?
डॉ. उमा: मैं कहना चाहूंगी कि स्ट्रेस कोई नई चीज नहीं है। ये जब हम छोटे थे तब भी थी। हम जब युवा थे तो भी थी और अब इस उम्र में भी मतलब दैट इज गोइंग टू बी देयर। राइट? अब उसको जैसे आपने कहा कि उसको डील कैसे करना है यह आना चाहिए। तो उसको बहुत ज्यादा तबज्जो ना देकर जो जिस काम में वो अपना माहिर है, अपनी कोशिश करनी है। एक तो स्ट्रेस को उनको खुद कम करना पड़ेगा। कोई उन्हें बता नहीं सकता। कुछ लाइफ के कुछ प्रिंसिपल्स होते हैं कि आपने हार्ड वर्क करना है, गोल ओरिएंटेड वर्क करना है, बैलेंस फैला के चलना है लाइफ में। अपने परिवार को भी देखना है, अपने फ्रेंड्स को भी देखना है। सोशल लाइफ भी ठीक अच्छी होनी चाहिए। तो ये सब चीजें तो रहेंगी। अभी जो सोशल मीडिया है मुझे जो लगता है वो बहुत बड़ा एक विलेन का रोल प्ले कर रहा है। क्योंकि आप आपका सोशल इंटरेक्शन खत्म हो गया। अपने फ्रेंड्स से मिलना, जोक्स क्रैक करना, बातें करना, अपना गुस्सा निकालना, परिवार के लोगों के साथ उठना—बैठना कम हो गया है। आजकल कनफाइंड रहते हैं अपने रूम्स में। यंगस्टर्स सिर्फ WhatsApp या जो भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स हैं, उसमें वक्त दे रहे हैं तो वो गलत है। मैं कहूंगी गलत है क्योंकि क्योंकि मैंने दोनों ही दुनिया देखी है। जब यह नहीं था और आज जब यह है तो जो मेंटल इलनेस बढ़ रहे हैं, फिजिकल डिसेबिलिटी, स्ट्रेस बढ़ रहा है। आज का यंग जनरेशन है किसी की सुनना नहीं चाहते। लेकिन 10—20 साल बाद समझ सकेंगे।
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(जारी)
