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Operation Pharma: नकली दवाइयां, जनऔषधि एवं अमृत फार्मेसी

ऑपरेशन फार्माः नकली दवाइयां, जनऔषधि एवं अमृत फार्मेसी

आशुतोष कुमार सिंह

दवा बाजार में आजकल बहुत उथल-पुथल है। एक ओर नकली दवाइयों का शोर है, तो दूसरी ओर भारत सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। इसी बीच स्वास्थ्य मंत्री जे.पी.नड्डा ने अमृत फार्मेसी के विस्तार का शिगूफा छोड़ दिया है।

नकली दवाएं…

सबसे पहले नकली दवाइयों की बात करते हैं। जब नकली कफ सीरप से दर्जनों बच्चों की जान गई तब जाकर भारत में इन दवाइयों पर शिकंजा कसना शुरू हुआ। राजस्थान हो या उत्तर प्रदेश हो या दिल्ली, सभी जगहों से नकली दवाइयां पकड़ी जा रही है। इतना ही नहीं, इन नकली दवाइयों की सप्लाई सरकारी अस्पतालों में भी की गई। यह बहुत ही गंभीर मामला है।
राजस्थान में पिछले 1 महीने में दो दर्जन से अधिक अमानक (सैंपल फेल) दवाएं पकड़ी जा चुकी हैं। हाल ही में सर्दी जुकाम (एलर्जी) में इस्तेमाल होने वाली टैबलेट विनसेट-एल (लिवोसिट्राजिन डाई हाइड्रोकलोराइड) को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। इसे बनाने वाली कंपनी को हिमाचल प्रदेश में मार्च में ही बैन कर दिया गया था। इसके बावजूद कंपनी लैब में गुपचुप तरीके से दवाइयां बनाकर राजस्थान में बेच रही थी।
यूपी के आगरा से भी इस तरह की लगातार खबर आ रही है कि वहां के फव्वारा बाजार में नकली दवाइयों का देश-व्यापी व्यापार हो रहा है। दवा कारोबारियों के साथ चिकित्सक और एजेंट भी पकड़े जा चुके हैं। इसी बीच पिछले दिनों दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की टीम ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए नकली दवाइयों के एक अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है। इसमें 6 लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। भारी मात्रा में नकली तैयार दवाइयां और उन्हें बनाने का सामान जब्त किया गया है। पुलिस के मुताबिक, ये गिरोह जॉनसन एंड जॉनसन, ग्लास्को स्मिथ क्लिन और अलकेम जैसी नामी दवा कंपनियों के नाम पर नकली दवाइयां बनाकर देशभर में बेचता था।

जनऔषधि…

भारत सरकार लोगों को गुणवत्तायुक्त सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के अंतर्गत जनऔषधि केन्द्रों का संचालन करती है। अभी तक 16000 से ज्यादा जनऔषधि स्टोर खोले जा चुके हैं। इसका लाभ आम लोगों को हुआ भी है। रेग्यूलर दवा खाने वाले लोगों का मासिक बजट जनऔषधि से दवा लेने के कारण कम हुआ है। इससे आम लोगों को हजारों करोड़ रुपये की बचत हुई है, ऐसा सरकार कहती है। यानी एक तरह से कह सकते हैं कि कम आय वालों के लिए वरदान है यह योजना। फिर क्या हुआ कि इस योजना को डिरेल करने की कोशिश की जा रही है। पिछले दो-तीन महीनों में न तो इस योजना को स्थाई मुख्य कार्यकारी अधिकारी मिला है और न ही प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से चल रहे हैं। इस बीच पता नहीं किस ‘महामूर्ख’ ने अधिकारियों को सुझाव दिया कि जनऔषधि केन्द्रों को खोलने के लिए 1 किमी दूरी की सीमा को खत्म कर देना चाहिए। इस पर नोटिफिकेशन भी 10 सितंबर, 2025 को जारी हो गया। देश भर के जनऔषधि संचालक खुद को ठगा महसूस करने लगे। क्योंकि उनके साथ हुए कॉट्रेक्ट में 1 किमी की दूरी का क्लॉज था, जिसे सरकार ने हटा दिया। बहुत हो हल्ला मचा। मैंने खुद भी प्रधानमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री को स्वस्थ भारत की ओर से एक पत्र लिखा और जीरो डिस्टेंसिंग नीति को हटाने की मांग की। इसी 17 नवंबर, 2025 को जीरो डिस्टेंसिंग नीति को रद्द करते हुए जनऔषधि केन्द्र खोलने की सीमा 1 किमी से कम कर के 500 मीटर कर दी गई। यह सीमा मेट्रोपोलिटन शहरों एवं वे शहर, जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है, उन पर लागू होगी। ऐसे 46 शहर हैं, जहां पर यह नियम लागू होगा। हालांकि इस फैसला से जनऔषधि संचालक पूरी तरह से खुश नज़र नहीं आ रहे हैं, लेकिन जहां कुछ नहीं था, वहां कुछ हाथ लगा। इतना ही नहीं, जनऔषधि के लिए जेनरिक दवाइयों का निर्माण करने वाली कंपनियों का पैसा भी रोककर रखा गया। नए ऑर्डर समय से जारी नहीं हुए। वर्तमान में जनऔषधि के पास लगभग 400 करोड़ की दवा स्टॉक में बची हुई है, जो कभी 1000 करोड़ की हुआ करती थी। इससे दवाइयों की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है।

अमृत फार्मेसी…

इन तमाम उठापटक के बीच केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा जी अमृत फार्मेसी को बढ़ावा देने के लिए जोर लगा रहे हैं। पिछले 15 नवंबर को उन्होंने देशभर में अमृत नेटवर्क के व्यापक विस्तार की घोषणा करते हुए कहा कि अब लक्ष्य है कि देश के हर मेडिकल कॉलेज और हर जिला अस्पताल में अमृत फार्मेसी उपलब्ध कराई जाए, ताकि सस्ती दवाओं की पहुंच हर नागरिक तक सुनिश्चित हो सके। 2015 में शुरू हुए अमृत फार्मेसी कार्यक्रम ने आज एक दशक में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की है। वर्तमान में देशभर में 255 अमृत आउटलेट कार्यरत हैं और निकट भविष्य में इन्हें बढ़ाकर 500 तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार की मानें तो अमृत फार्मेसी द्वारा 50 से 90 प्रतिशत तक की छूट पर दवाएं और इम्प्लांट उपलब्ध कराई जाती है। अब तक 6.85 करोड़ से अधिक मरीज अमृत की सेवाओं से लाभान्वित हुए हैं। 17 हजार करोड़ रुपये से अधिक की एमआरपी कीमत वाली दवाएं छूट पर प्रदान की गईं, जिससे मरीजों को कुल मिलाकर 8,500 करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई है। अमृत का संचालन करने वाला एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड, स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन मिनी रत्न सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम है।
जनऔषधि की स्थिति का खराब होना और अमृत को बढ़ावा देने की रणनीति पर दवा बाजार में कई तरह की बाते की जा रही हैं। व्यवसायियों का कहना है कि नड्डा जी जनऔषधि को मनसुख लाल मांडविया जी का प्रोजेक्ट समझते हैं, जबकि अमृत फार्मेसी को अपना। इसलिए यह दोहरा व्यवहार हो रहा है। मेरे जैसे इंसान के लिए तो यह बात समझ से परे है कि आखिर स्वास्थ्य मंत्री ऐसा क्यों करेंगे? उनका तो जनता और संगठन दोनों से सीधे जुड़ाव रहता है, उन तक इस तरह की बात जरूर पहुंचती होगी। वे अपनी इमेज को क्यों खराब कराएंगे?
बात चाहे जो भी हो, मैं तो यही चाहूंगा कि देश के लोगों को सस्ती, गुणवत्तायुक्त दवाइयां मिले और इसके लिए नकली दवाइयों का जो जाल फैला है, उसे ऑपरेशन फार्मा के तहत पूरी तरह से समाप्त किया जाए। साथ ही अमृत और जनऔषधि के फर्क को खत्म कर दवाइयों की कीमतों में जो मनमर्जी चल रही है, उसे समाप्त किया जाए। पिछले दिनों मैंने अपने टॉक शो ‘द थर्मामीटर’ में हरियाणा आईएमए के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ बाल रोग एवं पैरेंट्स केयर विशेषज्ञ डॉ. रमेश गोयल से लंबी बातचीत की थी। उनका मानना है कि दवाइयों की एमआरपी में जो लिक्विडिटी है, उसे समाप्त किया जाना जरूरी है। उन्होंने उस शो में कहा कि ‘एक देश, एक दवा और एक दाम’ के सूत्र को लागू किया जाना चाहिए, जिससे हेल्थ इकोसिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार का उन्मूलन किया जा सके। डॉ. गोयल की बात से मैं भी सहमत हूं। यही कारण है कि 2012 में मैंने ‘कंट्रोल मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस’ कैंपेन शुरू किया था क्योंकि दवाइयों में सारा लोचा ‘एमआरपी’ का ही है। यह न्यायिक हो जाए तो आधा काम तो ऐसे ही हो सकता है।
उपरोक्त सारी बातें राम राज्य के सपने जैसा है। राम को मानने वाली अपनी सरकार इस सपने को पूरा करने के लिए कितना राम बनेगी, यह तो वक्त ही बताएगा।

(लेखक स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक हैं)

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