आशुतोष कुमार सिंह
भारत के फार्मा उद्योग की पहचान वैश्विक है। हम अपनों के लिए दवा तो बना ही रहे हैं, दूसरे देश के लोगों को भी दवाइयों की आपूर्ति करते हैं। इसलिए भारत को ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ के रूप में जाना जाता है। भारत के इस विश्वव्यापी पहचान को उस समय धक्का लगा, जब एक कफ सिरप खांसी ठीक करने की जगह बच्चों की किडनी फेल करने लगा। देश के दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश से कफ सिरप के सेवन से मासूम बच्चों की मौत की खबर आनी शुरू हुई, जो अभी तक थमी नहीं है। अभी तक 22 मासूमों को कोल्डड्रीफ नामक इस कफ सिरप ने निगल लिया है।
दवा: फार्मा कंपनियों की साख का सवाल
ऐसे में देश भर में भारतीय फार्मा कंपनियों की साख जांच के दायरे में आ चुकी है। अंग्रेजी दवाइयों के अंधाधुंध प्रयोग एवं अमानक उत्पादन, ये दो ऐसी समस्याएं है जिनका निदान जरूरी है। ऐसे में मासूम बच्चों की मौत का जिम्मेवार कौन है? यह एक यक्ष प्रश्न है?
सरकार की ओर से इस दिशा में कुछ कार्रवाई हुई है। मसलन एक शिशु रोग विशेषज्ञ एवं दवा कंपनी श्रीसन मेडिकल्स के मालिक रंगनाथन को गिरफ्तार कर लिया है। कंपनी का लाइसेंस रद्द कर दिया है। एक जनहित याचिका कोर्ट में भी दाखिल हुई है, जिसे कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। ऐसे में सरकार कह सकती है कि उसने तो अपना फर्ज निभाते हुए त्वरित कार्रवाई की है और जांच कर रही है। फिर प्रश्न उठता है कि क्या यह कार्रवाई न्यायोचित है? क्या मासूमों के मौत के जिम्मेदार कंपनी और डॉक्टर ही है? या किसी और पर भी इसकी जिम्मेदारी है! किसी और को भी कटघरे में लाने की जरूरत है!
दवा बनाने से लेकर बेचने तक की प्रक्रिया
किसी दवा को निर्माण से लेकर आम उपभोक्ता तक पहुंचने में तमाम प्रकियाओं का सामना करना पड़ता है। सबसे पहले किसी कंपनी को दवा निर्माण के लिए खुद को पंजीकृत करना होता है। लाइसेंस लेना होता है। इस लाइसेंस को राज्य एवं केन्द्र सरकार की संबंधित एजेंसियां जारी करती हैं। उसके बाद दवाइयों का निरीक्षण होता है। उसकी गुणवत्ता की जांच होती है। गुणवत्ता जांच पास होने के बाद, उसे बाजार में वितरक के पास भेजा जाता है। वहां से एक फार्मासिस्ट या दवा दुकानदार उस दवा को खरीदकर अपनी दुकान में रखता है। उस दवा को एक चिकित्सक अपनी पर्ची पर लिखता है, फिर फार्मासिस्ट उस दवा को डिस्पेंस यानी बेचता है। लाइसेंसिंग से लेकर दवा निर्माण, निरीक्षण, वितरण एवं डिस्पेंसिंग तक की जो प्रक्रिया है, उसमें व्यूरोक्रेट्स, निर्माता कंपनी का मालिक, वितरक, चिकित्सक एवं फार्मासिस्ट ये सभी एक ही धागे से बंधे हैं। वह है ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट, 1940।
दवा: औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940
औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 को औषधियों एवं प्रसाधन सामग्री के आयात, निर्माण, बिक्री एवं वितरण हेतु अंगीकृत किया गया है। यह सुनिश्चित करता है कि जनता को बेचे जाने वाले उत्पाद सुरक्षित, प्रभावी एवं गुणवत्तापूर्ण होंगे। इस अधिनियम का मुख्य सार यह आश्वासन है कि औषधियां एवं प्रसाधन सामग्री उपयोगकर्ताओं को नुकसान नहीं पहुंचाएंगी या निर्धारित मानकों के अनुरूप होंगी। ऐसे में यह बड़ा प्रश्न यह है कि इस अधिनियम को लागू करवाने की जिम्मेदारी किसकी है?
दवा: CDSCO की जिम्मेदारी
स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के तहत केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) भारत का राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण (NRA) है। इसका मुख्यालय एफडीए भवन, कोटला रोड, नई दिल्ली 110002 में स्थित है। इसके तहत छह क्षेत्रीय कार्यालय, चार उप क्षेत्रीय कार्यालय, तेरह पोर्ट कार्यालय और देश भर में फैली सात प्रयोगशालाएं भी कार्यरत हैं। इसी सीडीएससीओ की यह जिम्मेदारी है वह औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 और नियम 1945 के तहत मिली शक्तियों का उपयोग करते हुए दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों की गुणवत्ता को अपने राज्य इकाइयों के सहयोग से सुनिश्चित करे। सीडीएससीओ को देश में निर्मित, आयातित और वितरित किए जाने वाले चिकित्सा उत्पाद की सुरक्षा, प्रभावकारिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली शीर्ष निकाय के रूप में जाना जाता है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि देश को गुणवत्तायुक्त दवाइयां मिले, इसकी जिम्मेदारी जिस संगठन की है, वह क्या कर रहा है? या अभी तक क्या करता रहा है।
दवा: ड्रग इंस्पेक्टरों का भ्रष्ट नेटवर्क
कई फार्मासिस्टों से बातचीत करने पर पता चला कि देश भर में ड्रग इंस्पेक्टरों का एक बहुत ही बड़ा नेटवर्क है। ये ड्रग इंस्पेक्टर सिर्फ दुकानों पर वसूली के लिए जाते हैं। उनका प्रत्येक दुकान से महीना फिक्स है। जिस बाजार या जगह पर वे जाते हैं, वहां पर उनका कोई न कोई जानने वाला दुकानदार होता है, वह बाकी दुकानदारों से वसूली कर के उनको पूरा पैसा देता है। ऐसे में ये ड्रग इंस्पेक्टर भारत के आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले सबसे बड़े गुनाहगार हैं। इनकी कार्यपद्धति की ऑडिट बहुत जरूरी है। दूसरे हैं दवा कंपनियों के रिप्रजेंटेटिव जिन्हें मेडिकल रिप्रेजेंटिटिव कहते हैं। दवा कंपनी एवं चिकित्सक के बीच व्यापारिक सांठगांठ की कड़ी यही होते हैं। कौन-सी दवा लिखने पर कितना कट मिलेगा, कितना गिफ्ट दिया जाएगा, यह सब मेडिकल रिप्रेजेंटिव ही तय करते हैं।
ऐसे में कुकुरमुत्तों की तरह उग आईं हेल्थकेयर कंपनियां जो थर्ड पार्टी से मैनिफैक्चरिंग कराकर अपने मनमर्जी से दवाइयों की कीमत तय करती हैं और डॉक्टर के साथ सांठ-गांठ कर के अमानक दवाइयां बाजार में आपूर्ति करती हैं। इस गठजोड़ को भी तोड़ना जरूरी है। इस गठजोड़ ने ही छोटी-छोटी हेल्थकेयर कंपनियों को पनपने का मौका दिया है जिसके परिणाम स्वरूप ‘कोल्ड्रिफ’ जैसी अमानक दवाइयां बनीं, वितरित हुईं, पर्चा पर लिखी गईं और उसका उपभोग हुआ। नतीजन दर्जनों मासूमों ने अपनी जान गंवाई।
दवा: ऑपरेशन फार्मा की जरूरत
ऐसे में जिस तरीके से मतदाताओं की सूची को शुद्ध करने हेतु निर्वाचन आयोग ने गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम बिहार में चलाया और पूरे देश में चलाए जाने की योजना बनी, उसी तर्ज पर देश में बन रही एक-एक दवा का गहन पुनरीक्षण बहुत जरूरी है। गुणवत्ता सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है और इसके लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की भूमिका बहुत अहम् हो जाती है। सिस्टम में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए गहन सफाई अभियान की भी जरूरत है। साथ ही जिस तरीके से मेडिकल कॉउसिंल ऑफ इंडिया को भंग कर के एनएमसी का गठन हुआ, उसी तरह फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया, सीडीएससीओ जैसी सरकारी महकमें को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। इनमें पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। और इन सब के लिए मोदी सरकार को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की तर्ज पर ‘ऑपरेशन फार्मा’ चलाने की जरूरत है। तब जाकर इस भ्रष्ट मिलीभगत के कारण अपनी जान गंवा चुके बच्चों की आत्मा को शांति मिलेगी और उनके माता-पिता को न्याय।
(लेखक वरिष्ठ स्वास्थ्य पत्रकार एवं समूह संपादक हैं।)
