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The Thermometer—लंग्स कैंसर का कारण तंबाकू: डॉ. सैनी

The Thermometer—लंग्स कैंसर का कारण तंबाकू: डॉ. सैनी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। The thermometer कार्यक्रम में कैंसर एक्सपर्ट डॉ. गगन सैनी ने पहली कड़ी में सर्वाइकल कैंसर से बचाव और उपचार के बारे में जाना था। आगे वे लंग्स कैंसर और सिगरेट—तंबाकू को लेकर भी चेतावनी दे रहे हैं। डॉ. सैनी रेडिएशन ओकोलॉजी के एक्सपर्ट हैं और गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल में इस विभाग को लीड करते हैं। उनसे बातचीत की थी समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने। प्रस्तुत है बातचीत की अंतिम कड़ी—

आशुतोष: हम लोगों ने मोटा-मोटी सर्वाइकल कैंसर को समझा। अब लंग्स कैंसर के बारे में बताएं।
डॉ. सैनी: लंग्स कैंसर डरावना है। किसी की 20 पैक इयर्स की हिस्ट्री है। अब एक पैकेट सिगरेट में मानिए कि 10 सिगरेट होती हैं। अगर हमने एक पैकेट सिगरेट हर रोज 20 साल तक पी तो 20 पैक इयर्स हो गए। हमने दो पैकेट 10 साल तक पी तब भी 20 पैक इयर्स हो गए। कहने का मतलब यह है कि इन दोनों चीज का गुना जब 20 आ जाता है तो लंग्स कैंसर के लिए आप वेरी हाई रिस्क कैटेगरी में आ जाते हैं। अभी एक जनाब मिले थे जिन्होंने कहा कि 50 साल हो गए स्मोकिंग करते हुए। अगर 20 पैकेट की हिस्ट्री है तो आपको समय—समय पर 5 महीने या साल में एक बार एचआरसीटी लंका कराना चाहिए। इसमें छोटा-मोटा कोई नोड्यूल अगर पकड़ा जाए तो उसको फॉलो किया जा सकता है। उसे अगर फॉलो करेंगे तो हमें समझ आ जाएगा कि बढ़ रहा है या नहीं। कोई वैसे ही नोड्यूल है, कोई इंफेक्शन हुआ था जो भर गया था, तो वो बढ़ेगा नहीं। लेकिन अगर लंग्स कैंसर होगा तो थोड़ा बहुत बढ़ेगा। जैसे ही बढ़ेगा, वैसे ही पकड़ा जाएगा। सो छोटे-मोटे लंग्स के लीजंस होते हैं, उनको ऑपरेट करके निकाला जा सकता है। अगर मरीज ऑपरेशन के लायक ना हो या ऑपरेशन नहीं कराना चाहता हो तो उसको रेडिएशन करके खत्म किया जा सकता है। अर्ली स्टेज का लंग्स कैंसर फिर भी उपचार योग्य है लेकिन एडवांस स्टेज में मुश्किल होती है। इस कैंसर के उपचार में पिछले 10-15 साल के अंदर बहुत विकास हुआ है। यह एक ऐसा कैंसर था जिसमें बड़ा मुश्किल था किसी को उम्मीद में रखना। बहुत रिसर्च की गई इस पर। यह भी कॉमन कैंसर है। इसके बावजूद ज्यादा मरीज एडवांस स्टेज में पकड़े जा रहे हैं। ये एचआरसीटी वगैरह की गाइडलाइंस तो बाद में आई। अभी भी कई देशों में जल्दी पकड़ नहीं पाते। एडवांस स्टेज होते ही आप मरीज को बहुत ज्यादा आशान्वित नहीं कर सकते। तो फिर रिसर्च की गई। रिसर्च में यह पाया गया कि लंग्स कैंसर के अंदर बहुत सारे बायोमार्कर्स हैं। बायोमार्कर्स मतलब उसके अंदर बहुत सारे गुण हैं जो माइक्रोस्कोप से टेस्ट किए जा सकते हैं और वो गुण जिस तरह से सामने होते हैं, उस हिसाब से दवा को बदल सकते हैं। अगर उसके बायोमार्कर और दवा का गुण मैच कर जाए तो बहुत अच्छा सर्वाइवल मिलता है। इसे पर्सनलाइज मेडिसिन बोलते हैं। इसकी वजह से मरीज का सर्वाइवल बढ़ गया। कुछ मरीज ऐसे हैं जिन्हे ट्यूमर है लेकिन वो अपनी पूरी लाइफ सामान्य रूप से जी रहे हैं। ये बड़ी खुशी की बात है कि मेडिकल साइंस इतना बड़ा चेंज कर देती है किसी की लाइफ में। पहले तो इनमें बहुत सारे ट्रीटमेंट्स थे और लागत बहुत ज्यादा थी। अब तो लागत भी उतनी ज्यादा नहीं है। वैसे ₹4000 में उसकी दवाई आ जाती है। मतलब इसमें टेक्नोलॉजी का बहुत बेहतर तरीके से हस्तक्षेप हुआ। टेक्नोलॉजी ने कैंसर ट्रीटमेंट का पूरा ओरा बदला है। एक बड़ा अच्छा आर्टिकल है अह एस्को का जिसमें उन्होंने यह लिखा है कि भई कंप्यूटर साइंस में 1990 के बाद ग्रोथ आई है तो सभी जानते हैं। इन 30 साल में सारी ग्रोथ का सबसे ज्यादा लाभ कैंसर ट्रीटमेंट को हुआ है और कैंसर ट्रीटमेंट में भी सबसे ज्यादा रेडिएशन थेरेपी, रेडिएशन ओंकोलॉजी को हुआ है। यही चीजें थी जो टेक्नोलॉजी में छूट रही थी। वो सब मिल गई तथा एकदम बात बनती चली गई। अब आपको लग रहा है कि ये सब एकदम पर्सनलाइज तरीके से आप कर पा रहे हो। बहुत सारे कैंसर्स में अच्छी पर्सनलाइजेशन हो गई। आने वाले समय में यह और हो रही है। इम्यूनोथेरेपी बहुत स्ट्रांग हो गई है।

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आशुतोष: इम्यूनोथेरेपी क्या होती है?
डॉ. सैनी: अब इम्यूनोथेरेपी बड़ी मजेदार चीज है। कैंसर किसी की बॉडी में है। बॉडी में वायरस आ जाए, बैक्टीरिया आ जाए तो मेरी इम्युनिटी बड़ा काम करती है। कैंसर आया तो क्यों नहीं काम करती? कह सकते हैं कि ये तो बॉडी के अपने ही सेल्स हैं जो कैंसर बन जाते हैं तो इसलिए इम्युनिटी काम नहीं करती। नहीं। बॉडी समझ पाती है कि यह कुछ गड़बड़ है। लेकिन कैंसर के सेल्स आतंकवादी की तरह होते हैं। नेगेटिव माइंडसेट होता है उसका। वो बॉडी के सेल्स को पहले ही न्यूट्रलाइज कर देते हैं। उनके अंदर कुछ ऐसे केमिकल्स होते हैं जो बॉडी के सेल्स को अपने आप को डिटेक्ट नहीं करने देते। इम्यूनोथेरेपी आई है तो वह उस मैकेनिज्म को, जिससे पहचान को ब्लॉक कर रहा था, उसे ही ब्लॉक कर देती है। आपकी अपनी इम्यूनिटी कैंसर के विरुद्ध काम कर सके, इसके लिए आपको ताकत देती है। वो काम करती है। कई कैंसर्स में बहुत अच्छा काम करती है यानी जो नेगेटिव माइंडसेट वाला है उसको वो खत्म कर देती है।

आशुतोष: लोग सामान्य बोलचाल में कहते हैं ना कि हर फिक्र को धुएं में उड़ाए जा। तो ये जो फिक्र है, कहीं वही फिक्र न बन जाए?
डॉ. सैनी: आपने बिल्कुल सही बोला। स्मोकिंग तो सबसे बड़ा, नंबर वन कारण है कैंसर्स का। स्मोकिंग और तंबाकू। स्मोकिंग में तंबाकू होता ही है।
आशुतोष: बाकी सफेद दंडिका के अंदर कितने तरह के केमिकल होते हैं?
डॉ. सैनी: संभवत: 200 तरह के केमिकल होते हैं और 200 कार्सिनोजेनिक। एक मरीज मिले। वो कहते हैं कि मैं तो पान खाता था, तंबाकू नहीं। मैंने कहा साहब आपको पता नहीं है। एक तो पान में तंबाकू होता ही होता है। उनने कहा कि थोड़ा कम होता है। मान गए भाई। कोई कहता है कि मैं पान तंबाकू सीधा खा रहा हूं। पान जैसी चीज के अंदर भी जो जर्दा और यह—वो चीजें डलती है, वो अपने आप में अलग-अलग कैंसरकारक तत्व हैं। सिगरेट एक इंजीनियरिंग पीस है जिसकी इंजीनियरिंग इस प्रकार से गई है कि उसका धुंआ आपके अंदर जाता रहे, आप एंजॉय करते रहें। वो जो धुआं है वो आपको दूसरी दुनिया में ले जाता है और आपको लगता है कि हमें आनंद आ रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके अंदर जो केमिकल्स जा रहे हैं, वो आपके ब्रेन को कंट्रोल करते हैं। अलग-अलग चीजों का अलग-अलग काम है। बहुत गहरे रिसर्च से बनाई गई है ये चीज़। लोग तो ई सिगरेट भी पी रहे हैं। उसमें भी नुकसान है। इंडिया में यह बैन है। हमलोग भाग्यशाली हैं कि हमारी सरकार ने उसे सही समय पर बैन कर दिया। अगर वो बैन न होती तो उसकी भी एक बड़ी कंपनी बन जाती। इसकी अपनी एक लॉबी बन जाती।

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आशुतोष: मतलब तंबाकू का उत्पादन ही बैन हो जाए?
डॉ.सैनी: बिल्कुल होना चाहिए। यह कैंसर का सबसे बड़ा कारण है। दुनिया के कैंसर रोगियों का आधा मुंह के कैंसर का केस भारत में मिलता है तो फिर क्यों नहीं बैन होना चाहिए? लेकिन कैसे करोगे? टैक्स है। इस चीज को अगर बैन करेंगे तो समाज को बहुत फायदा है। इसमें कोई कंफ्यूजन ही नहीं है। पिछले 100 साल में कई बार प्रूव हो गया कि इससे ही कैंसर होता है। ई सिगरेट के अंदर भी केमिकल्स हैं और कोई भी केमिकल, कोई भी हाइड्रोकार्बंस जब आप फूंकते हैं और तो वो आपके अंदर जाते हैं। उसके अंदर तंबाकू भी होता है। और चीजें भी होती हैं। अगर उसका नाम स्ट्रॉबेरी है या उसके अंदर कुछ भी फ्लेवर बना कर रखे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आप सिर्फ स्ट्रॉबेरी ले रहे हैं। मान लें कि किसी को नींबू इतना पसंद है तो नींबू पानी क्यों नहीं उतना एंजॉय करते जितना ई सिगरेट? उसके अंदर हैबिट फॉर्मिंग चीजें हैं जो आदत में ढाल देगी।

आशुतोष: भारत के लोग कैंसर के प्रिवेंशन के लिए अपने आप को कैसे तैयार करें? दूसरा, अगर कैंसर होने की आशंका है तो गांव के लोग किसके पास जाएं क्योंकि वहां तो ओंकोलॉजिस्ट नहीं हैं?
डॉ.सैनी: गांव के लोग शहर के लोगों की ही तरह अपने मेन डॉक्टर के पास जाएं। अपने सिम्टम्स को रखें। पहला ट्रीटमेंट जो होता है वो आपकी हिस्ट्री, आपसे बात करके जो उनको समझ में आएगा, उस हिसाब से करेंगे, जब तक बहुत सीवियर केस ना हो। जेनरली कोई रेडियोलॉजी, सीटी, एमआरआई, एक्सरे पहली बार में नहीं भी किया जाता। डॉक्टर ने आपको फर्स्ट टाइम जो दवा दी, उससे सिम्टम नहीं ठीक हुआ तो वापस जरूर जाएं। जब सेकंड टाइम आप जाएंगे और डॉक्टर साहब ये नोट करेंगे कि उनका पिछला ट्रीटमेंट काम नहीं कर सका तो वो अगले लेवल पर सोचेंगे। उस हिसाब से या तो आपको रेफर करेंगे या टेस्ट करवाएंगे। शहरी क्षेत्रों में भी पहली दफा दवा लिखी जाती है। काबू में न आने पर आगे की सोचा जाता है। मेडिकल साइंस में बताया जाता है कि ये काम नहीं करे तो आगे क्या करना है। अगर कैंसर है तो उस तक पहुंच जाएंगे डॉक्टर साहब।

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आशुतोष: कैंसर अपने आप में एक बड़ा मामला बनता जा रहा है। कैंसर को लेकर जागरूकता की बहुत जरूरत है। तो इस लिहाज से क्या कैंसर से संबंधित प्राथमिक जानकारी देने के लिए उसकी पढ़ाई टेक्स्ट बुक में होनी चाहिए?
डॉ. सैनी: हो भी सकती है। लेकिन कोई सिम्टम है तो उसे इग्नोर ना करें। आप डॉक्टर से मिलें। लोगों को तो शुरू से जानकारी होनी चाहिए। एक दो चैप्टर इस तरह के हों। पब्लिक हेल्थ के बारे में ओवरऑल जानकारी होनी चाहिए। स्मोकिंग के दुर्गुण की जानकारी होनी चाहिए। मदिरापान के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

आशुतोष: आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे?
डॉ.सैनी: मैं सब लोगों को ये संदेश देना चाहूंगा कि अपने हेल्थ को टेकन फॉर ग्रांटेड मत लो। हेल्थ को समझो। यह समझो कि हेल्थ है क्या? हेल्थ इज अ स्टेट ऑफ फिजिकल, मेंटल एंड सोशल वेल बीइंग। हमारी मानसिक—शारीरिक स्थिति जब सुचारू चले तो उसे हेल्थ कहा जाता है। जब सुचारू चल रही है तो उसे मेंटेन करना है और नहीं चल रही है तो उसके लिए हार्ड वर्क करना है। एक मोटिवेशन रखनी है। ऊपर वाले ने हमें जो आत्मा दी है, उसका एक ही घर है यह शरीर और इसको फिट रखना बड़ा जरूरी है। इसके लिए हमेशा जागरूक रहना जरूरी है। इसके लिए कोई एक चीज नहीं करनी। इसके लिए हर समय हर चीज करनी है।

समाप्त

प्रस्तुति: अजय वर्मा

पहली कड़ी देखें—https://www.swasthbharat.in/the-thermometer-treatment-of-cervical-cancer-is-easy-dr-gagan-saini/

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