नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। यू—ट्यूब के The thermometer कार्यक्रम के 6ठे एपिसोड में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ममता ठाकुर से बातचीत हुई थी। स्वस्थ भारत मीडिया के संपादक आशुतोष कुमार सिंह के साथ हुई बातचीत का फोकस महिला स्वास्थ्य को लेकर था। उनका स्पष्ट मानना है कि आधी आबादी को घर—परिवार या नौकरी के साथ अपने हेल्थ को लेकर भी कॉन्शस रहना होगा क्योंकि उनके स्वस्थ रहने पर ही सब कुछ आश्रित है। डॉ. ठाकुर पिछले 25 सालों से स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में देश के तमाम बड़े अस्पतालों में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं। वह सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीति के स्तर भी बहुत सक्रिय हैं। वे IMA और DMA काउंसिल से भी जुड़ी हुई हैं। सर्वाइकल कैंसर की जागरूकता में भी एक बड़ा नाम है उनका। लीजिए उनसे हुई बातचीत का पहला हिस्सा…
#Thethermometer
आशुतोष: महिलाओं में आजकल किस तरह की बीमारियां देखी जा रही है और उसका समाधान क्या है?
डॉ. ममता: महिलाओं में हेल्थ चैलेंजेज बहुत ज्यादा है क्योंकि वे अपने शरीर को इग्नोर करती हैं। इससे उनकी हेल्थ समस्याएं बढ़ती जा रही है। उनका हेल्थ बहुत अच्छा रहना जरूरी है। वो मातृशक्ति हैं, सृष्टि का निर्माण करती हैं। उनकी वजह से ही परिवार, समाज और देश आगे बढ़ रहा है। उनकी सबसे बड़ी समस्या प्रजनन की है। हार्मोनिकल इमबैलेंस हो गया है। पीरियड टाइम पर नहीं आना भी। पीसीओडी एक बीमारी है जो बहुत परेशानी की चीज हो गई है। यह लाइफस्टाइल की वजह से होता है। इसमें पीरियड टाइम पर नहीं आते। रिप्रोडक्टिव क्षमता कम हो जाती है। एक ओवम के बदले मल्टीपल ओवम बन जाते हैं तो इनफर्टिलिटी हो जाती है। उसका उपाय लाइफस्टाइल में है तो उसे ठीक कीजिए। लेकिन कर नहीं पाते क्योंकि समस्याएं और भी हैं। उसके साथ-साथ एंड्रोमेट्रोसिस बहुत बढ़ गया है। PID—पेल्विक इनफ्लामेटरी डिजीज से औरतें ग्रसित होती हैं जिसे आम भाषा में धात की बीमारी कहते हैं। वो इसे कमर दर्द या डिस्चार्ज कह कर इग्नोर करती हैं। उससे आगे परेशानी बढ़ जाती है। सिस्ट बन जाते हैं। करियर ओरिएंटेड होने से लेट शादी होती है। लेट शादी के बाद फिर बेबी करने में विलंब तो उनमें PCOD और हार्मोनिकल इमंबैलेंस बहुत ज्यादा बढ़ता है।
आशुतोष: अगर कोई दंपति बच्चा प्लान कर रहा है कि तो किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
डॉ. ममता: यदि बेबी प्लान करना है तो एक साल पहले आप जांच कराओ, स्क्रीनिंग कराओ कि आप बिल्कुल सही हैं। थैलेसीमिया, पीसीओडी तो नहीं है। पीरियड्स अनियमित तो नहीं है। एज फैक्टर भी है। सही उम्र पर प्रजनन बहुत जरूरी है। नहीं तो वह भी हार्मोनिकल इमबैलेंस के लिए इशू हो जाता है।
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आशुतोष: क्या मेडिकल साइंस में बच्चा प्लान करने के लिए उम्र का कोई निर्धारण है?
डॉ. ममता: हां। 25 साल से पहले एक बेबी हो जाना चाहिए लेकिन शादी ही नहीं हो रही। अब यह बताइए कि आज सारे करियर ओरिएंटेड हैं। वो 32—33 में शादी करते हैं। उसके बाद एक— दो साल कहते हैं कि अभी बिजी हैं। अपनी लाइफ जीनी है। तब तक बहुत लेट हो जाता है। नव दंपत्ति से तो मैं यही कहती हूं कि सबसे पहले बेबी प्लान कर लो। फिर सारे हार्मोंस चेक कराएं, अल्ट्रासाउंड कराएं, पीसीओडी का सारा पैनल कराएं, थैलेसीमिया का कराएं। पूरा प्लान करें ताकि आप स्वस्थ हों तब बेबी प्लान करो जिससे एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकें। प्लानिंग के बाद भी 9 महीना जो गर्भावस्था का है, उस समय भी बहुत केयर की जरूरत होती है। लेकिन बहुत सी बातों को महिलाएं इग्नोर करती हैं।
आशुतोष: इसमें आप क्या गाइड करना चाहेंगे कि ये 9 महीना किस तरह से रहना चाहिए?
डॉ. ममता: सबसे जरूरी है हेल्दी बच्चा, जो शरीर से भी हेल्दी हो और माइंड से भी क्योंकि आज मेंटल इशू भी बहुत ज्यादा बढ़ गया है। तो एक गर्भवती माता को चाहिए कि अपनी हेल्थ और मेंटल हेल्थ का बहुत ज्यादा ध्यान रखें। लेकिन यह केवल उन्हीं पर निर्भर नहीं है। पूरे परिवार पर निर्भर करता है। परिवार का माहौल ठीक और स्वस्थ हो क्योंकि बच्चा डेढ़—दो महीने के बाद सब कुछ सुनना शुरू कर देता है। उसमें धड़कन आती है। खाना पीना तो बिल्कुल बैलेंस न्यूट्रिशन होना ही चाहिए। एनीमिया पूरा ठीक होना चाहिए। 12 से कम में कोई भी मां अपने बच्चे को पैदा ना करें। 12 हीमोग्लोबिन बहुत जरूरी है। इसे बनाए रखना जरूरी है। इस पर डॉक्टर भी काम करें और परिवार भी। महिला को भी सोचना चाहिए कि बच्चा हमारा बिल्कुल हेल्दी और अच्छे आईक्यू के साथ हो। मां अच्छा सोचे, अच्छा बोले। उसकी सोच पॉजिटिव हो। उस गर्भस्थ बच्चे से बात करें कि मैं चाहता हूं कि आप ऐसा हो। इतने संस्कारी हो। इतनी पढ़ाई करें। अपनी हेल्थ का ध्यान रखें। मम्मी पापा का रिस्पेक्ट, परिवार—समाज का रिस्पेक्ट करें। देश के लिए काम करें। ऐसा यदि 9 महीने कम से कम 10 मिनट सुबह—शाम अपने बच्चे को यह कहा जाए तो बच्चा वही सब संस्कार लेकर पैदा होता। इसके लिए शुरू से ही मेहनत करने की जरूरत है। हेल्थ के साथ-साथ मां अच्छी पढ़ाई करे, फालतू की रील्स ना देखे। आप अच्छे चैनल देखो। उसमें विभोर हो तो बच्चा आपका देखेगा। बच्चे से बात करो कि आप भी देखो। जहां लड़की का खाना अच्छा नहीं है, माहौल अच्छा नहीं है, डांट पड़ती है, परेशान रहती है, डरी सहमी रहती है। वो बच्चा फिर ऐसा ही होता है। आप अपने बच्चे के लिए अपनी सोच पॉजिटिव रखिए।
आशुतोष: आपने कहा कि परिवार का बहुत बड़ा रोल है लेकिन कई परिवारों में पति विभिन्न कारणों से नेगेटिव वातावरण बनाकर रखते हैं। एक डॉक्टर होने के नाते उनको आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
डॉ. ममता: सारी जिम्मेदारी उन्हीं पर है क्योंकि एक महिला आपके घर में खुशियां दे रही है तो उसमें आपका ही ज्यादा योगदान है। आप उसको जितनी खुशी दोगे, जितना प्यार दोगे, जितना अच्छे से बात करोगे, उतना ही उसके अंदर पॉजिटिविटी जाएगी और जितनी पॉजिटिविटी में वो रहेगी, वो बच्चा उतना ही पॉजिटिविटी के साथ आएगा। कोई पिता अच्छा व्यवहार नहीं करता है तो बच्चा पेट में डरता है। डरता है कि अरे मेरे पापा आए हैं और अभी मां को डांटेंगे। पहले ही सहम जाता है। वह अपने पिता के लिए नेगेटिविटी लेकर पैदा होगा। यदि आप चाहते हैं कि बच्चा आपको प्यार करें, सम्मान दे, अच्छी पढ़ाई करे, हेल्दी रहे और समाज देश के लिए अच्छा नागरिक बने तो इन बातों पर बहुत ध्यान देना जरूरी है।
आशुतोष: जन्म देने से लेकर तीन साल तक अधिक केयर करने की जरूरत होती है। ये क्या है? मेडिकली इसमें किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए?
डॉ. ममता: न्यूट्रिशियस और बैलेंस डाइट होनी चाहिए। एनीमिया नहीं होना चाहिए। जब मां डेढ़ दो साल तक अपने बच्चे को फीड करती है वही एक्सक्लूसिव फीड है। सारा कुछ तो मां से ही बच्चे में जाता है। जितना उसका खाना—पीना पौष्टिक रहेगा, बच्चा उतना हेल्दी रहेगा। मां को मिलने वाला कैल्शियम, विटामिन उस बच्चे को भी जाएगा। वही चीज जो आप प्रेगनेंसी में दे रहे हो, वही आप जन्म के बाद भी दे रहे हो। बच्चा आपको साक्षात देख रहा है, सुन रहा है, सहम रहा है। आजकल के बच्चों के आईक्यू इतने तेज हैं कि महीने भर बाद ही वो आप पर रिएक्ट कर सकता है। हंसना, बोलना, डांट, तेज आवाज, झगड़ा—लड़ाई से उस पर बहुत फर्क पड़ता है। उसके मेंटल हेल्थ और स्वास्थ्य पर फर्क पड़ता है। आखिर मेंटल हेल्थ तो नॉर्मल हेल्थ से निर्भर है। जिस वातावरण में वो गर्भवस्था में रहा, वो सारी चीजें तीन साल तक चाहिए ताकि वो अच्छे संस्कार लेकर स्कूल जाए।
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आशुतोष: न्यू जेनरेशन तो दूध भी पिलाना नहीं चाहती है। तो ऐसे लोगों को किस तरह से समझाया जाए?
डॉ. ममता: अवेयरनेस की जरूरत है। 5 या 10 प्रतिशत ऐसी महिला होंगी। जैसे कोई मॉडलिंग करती है। उनके लिए इशू बन जाता है कि मेरा फिगर ठीक रहे। ऐसे में हम उनको समझाते हैं कि आप एक मां बनी हो लेकिन ग्लैमर की दुनिया दो—चार, 5 साल में खत्म हो जाएगी। लेकिन एक मां जो अपने बच्चे को जन्म देती है, उन्हें छ: महीने तक ब्रेस्ट फीडिंग की राय देते हैं। पहले दो—तीन साल मां का दूध पिलाने से उसका इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। लाइफ थ्रेटनिंग बीमारी में वही इम्यून सिस्टम काम देता है। वो कैसे स्वस्थ रहेगा, वो आप पर है। ग्लैमर की दुनिया की चिंता है तो प्लास्टिक सर्जरी है न। लेकिन अपने बच्चों से इम्यून सिस्टम मत छीनिए। इससे वो पूरी जिंदगी हेल्दी रहेगा। लड़की है तो उसको आगे इतनी सारी बीमारी झेलनी है। इम्यून सिस्टम कमजोर हुआ तो वो बीमार होता रहेगा। यदि किसी की डिलीवरी सिज़ेरियन हुई है तो मैं कहती हूं कि दो घंटे बाद फीड लगाओ। विदेशों में देखा गया है कि सिज़ेरियन से डिलीवरी हुई तो मां की छाती से पहले लगाया जाता है। उससे उसकी गर्मी की फीलिंग आ जाती है। मां से प्यार हमेशा बना रहता है।
आशुताष: महिलाओं में खासतौर से ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं। ये सर्वाइकल कैंसर क्या है? इससे कैसे बचें? इसके प्रिवेंशन में वैक्सीनेशन का क्या प्रक्रिया है?
डॉ. ममता: महिलाओं के लिए खतरा पहले ब्रेस्ट कैंसर और फिर सर्वाइकल कैंसर का है। गर्भाशय के मुंह को सर्विक्स कहते हैं इसीलिए सर्वाइकल कैंसर कहते हैं। यानी बच्चेदानी के मुंह के कैंसर को सर्वाइकल कैंसर कहते हैं। तीन साल पहले तक हर 7 मिनट पर इससे एक महिला की मौत हो रही थी। लेकिन अब हर 5 मिनट में एक मौत हो रही है। यह खतरनाक तो है लेकिन इससे बचना उतना ही आसान है।
आशुतोष: क्या बात है?
डॉ. ममता: उसकी जांच, स्क्रीनिंग बहुत आसान है। हर तीन साल में पेप्स मियर जो सिर्फिक्स होता है, जहां कैंसर होता है, वहां से एक पानी लिया जाता है जो लैब भेजना होता है। जो महिलाएं 30 साल की हो गई हैं और यदि वो मैरिड हैं तो उनकी तीन साल में एक जांच होती है। वायरस एचपी ह्यूमन पेपुलेमा वायरस, जो कैंसर बनाता है, वह यदि उसमें आ गया तो इलाज हो जाएगा। यही वायरस 15 साल के बाद कैंसर में परिवर्तन होता है। उस 15 साल के अंदर यदि सतर्क रहें तो उसे ठीक किया जा सकता है। 100 फीसद तक। दूसरा, किसी भी कैंसर का वैक्सीन अभी तक नहीं आया है। वैक्सीन केवल सर्विकल गर्भाशय कैंसर का आ गया है और वो 9 साल से लेकर 45 साल की औरतों को लग सकता है। डब्ल्यूएचओ कहता है 9 से 26 साल लेकिन 9 से 45 साल की बच्ची से लेकर युवा और महिलाएं हैं वो जरूर उस टीका को लगाएं।
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आशुताष: ये वैक्सीन कहां पर मिलता है?
डॉ. ममता: पूरे देश में मिलता है। अब अपनी वैक्सीन भी है। बाहर की वैक्सीन थोड़ा मंहगी थी। अब भारत सरकार ने अपनी वैक्सीन बना ली है जिसकी केवल तीन डोज लगनी है। यदि 9 से 14 साल तक की बच्ची है तो उसे केवल दो ही डोज लगनी है छह महीने पर। मतलब 4000 रुपए में बच्ची को आपने सुरक्षित कर लिया। 9 साल से 14 साल की बच्ची खुद तो समझेगी नहीं। उसके पेरेंट्स, परिवार और डॉक्टर को अवेयर करना पड़ेगा। इसमें हमारी भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि कोई बच्ची आए तो हम पहले से मां को सतर्क करें। यदि किसी ने 14 पार कर लिया तो 14 से 45 तक तीन टीके लगेंगे। पहला जीरो डोज़ जिस दिन लगना है, उसके 2 महीने बाद दूसरा और जीरो डोज़ से छठे महीने में तीसरा जिसको हम दूसरा डोज कहते हैं। 14 साल से ऊपर जो युवा या महिलाएं हैं उन्हें 45 साल तक तीन टीके लगने हैं। उसमें आप आसानी से उस खतरनाक बीमारी से बच सकते हैं। जहां तक ब्रेस्ट कैंसर की बात है, वह भी बहुत आसान है। सेल्फ एग्जामिनेशन होता है। यह हर लेडी को करना चाहिए। वे सोते हुए अपने ब्रेस्ट का निरीक्षण करें। आदत डाल दें, सिर्फ आधा सेकंड लगता है। अगर शक हो कि कोई गांठ है तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं। इसकी कोई वैक्सीन नहीं है। केवल सेल्फ एग्जामिनेशन से ही आप बच सकते हो।
आशुतोष: सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन का कोई साइड इफेक्ट तो नहीं है?
डॉ. ममता: नहीं—नहीं। कोई साइड इफेक्ट नहीं है। जब कैंसर इंस्टट्यूट में वैक्सीन सरकार की तरफ से फ्री दी जा रही थी तो मैंने समाज सेवा के नाते बस कर करके 12 से 14000 बच्चों को फ्री वैक्सीन लगवाया है। एक—दो ने कहा कि फीवर आया तो किसी वैक्सीन का जो इफ़ेक्ट होता है, वो थोड़ा सा फीवर आ जाता है। मैंने कोई खतरा नहीं देखा है। साइड इफेक्ट में जहां भी हम लगाते हैं, वहां डल्टॉइड मसल्स पेन होता है। डॉक्टर के पास जाकर लगाएं। 10 मिनट रुकें और अपने घर जाएं। यह 100 फीसद सुरक्षित है। विदेशों में तो यहां तक हो गया है कि आप कॉलेज जाने से पहले लगवा लें। कहीं—कहीं तो वैक्सीन सर्टिफिकेट देने पर एडमिशन होता है। पर हमारे यहां अभी स्टार्ट नहीं हुआ है। लेकिन सरकार जागरूक है। वित्त मंत्री श्रीमती सीतारमण ने बता दिया है कि हम अब स्कूल में ही उसको डालेंगे। दिल्ली मेडिकल फोरम, आईएमए की दिल्ली ब्रांच ने पूरी फाइल तैयार कर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के पास दो बार जा चुके हैं कि इसको जल्दी से जल्दी लागू किया जाए। यदि हम स्कूल में ही 9 से 14 की उम्र में दो टीके लगा देते हैं तो आगे लगाना ही नहीं पड़ेगा। जिन्होंने नहीं लगाया है उनको हम जागरूक कर लगा ही रहे हैं। तो आप अपने आसपास के गाइनोकोलॉजिस्ट के पास जाएं, वो आपको लगा देंगी। बहुत सिंपल दो मिनट का काम है।
(जारी)
प्रस्तुति: अजय वर्मा
