स्वस्थ भारत मीडिया
SBA विशेष

क्या आप जानते हैं एम्स में एक दिन के बच्चे का ईलाज नहीं होेता है!

एक दिन का बच्चे को जन्म लेते ही झेलना पड़ा स्वास्थ्य सेवाओं का दर्द
एम्स जैसे अस्पतालों में भी असंवेदनशीलता अपने चरम पर है…

 

नई दिल्ली का एम्स
नई दिल्ली का एम्स

देश की स्वास्थ्य सेवाएँ कितनी संवेदनहीन और जर्जर हो चुकी हैं इससे स्वस्थ भारत अभियान समय समय पर रूबरू कराता रहा है। इसी तरह की दो घटनाओं से कल स्वस्थ भारत अभियान रूबरू हुआ। एक अपोलो अस्पताल की जिसमे अपोलो अस्पताल की संवेदनहीनता पर एक एफ़आईआर सरिता विहार थाने मे दर्ज़ करा दी गयी है। दूसरी घटना एम्स की है।
एनसीआर मे कार्यरत एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पत्नी को सोमवार रात बिजनौर के एक अस्पताल मे संतान प्राप्ति हुयी। मंगलवार दोपहर को अस्पताल ने बताया कि बच्चे की आहार नाल बंद है और इसका इलाज़ उनके पास नहीं है। बच्चे को रेफर कर दिया गया और आनन फानन मे परिजन उस बच्चे को लेकर एम्स पहुँच गए। देश के सबसे बड़े अस्पताल की आपातकालीन सेवाओं मे उस बच्चे को एड्मिट करने से मना कर दिया गया। कारण बताया गया कि एक दिन के बच्चे को नहीं करेंगे उसको एड्स का खतरा हो सकता है। इतने बड़े अस्पताल का ये बे-सिर पैर का तर्क समझ से परे था। बच्चे की दादी जो स्वयं एक शिक्षिका है और ग्रामीण अंचल से आती हैं, शहर की चकाचौंध के बीच इस जमी इस गर्द से बहुत व्यथित हो गईं। उन्होने दोबारा वहाँ मौजूद लोगों से गुजारिश की तो इस बार उनका तर्क था कि डेंगू के मरीज बहुत आ रहे हैं। थक हार कर उन्होने स्वस्थ भारत टीम से संपर्क किया तो आशुतोष जी ने अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए। आधे घंटे बाद एक नर्स ने बच्चे को अटैंड किया और इसके दो घंटे बाद बेहद प्रयासों के बाद बच्चे को एम्स मे दाखिल कराया जा सका। अभी सिर्फ बच्चे को एड्मिट किया गया है। इलाज़ शुरू होना तो बाकी है।
इस घटना के मूल में कुछ प्रश्न ये है कि हमारे बड़े अस्पताल क्या प्राथमिक चिकित्सा देने मे भी असफल होने लगे हैं या इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि उन्हे किसी के दुख दर्द से कोई सरोकार ही नहीं है ? क्या जिस व्यक्ति के पास कोई प्रभाव नहीं है उसको इस देश मे इलाज़ भी नहीं मिल पाएगा ? क्या निजी अस्पतालों की कमरतोड़ फीस के बीच सरकारी अस्पतालों पर बोझ ज़्यादा तो नहीं होता जा रहा है? या सरकारी अस्पतालों की निजी अस्पतालों से मिली भगत है ? वजहें कुछ भी हो सकती है पर एक दिन के बच्चे ने भारत की स्वास्थ्य सेवाओं के मर्म को आँख खोलने के पहले ही समझ लिया है। बड़ा होने पर जब वह बच्चा यह श्लोक पढ़ेगा तब उसके अपने निहितार्थ भी इसमे छुपे होंगे।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि।
(लेखक स्वस्थ भारत अभियान के विधिक सलाहकार हैं।)

Related posts

जनऔषधि केंद्रों तक नहीं पहुंच रही दवाइयां, अब ऐप से मिलेगी मदद!

swasthadmin

10 हजार किमी की यात्रा कर स्वस्थ भारत यात्री पहुंचे गुवाहाटी

बिलासपुर नसबंदी मामलाःएक दर्द … कुछ सवाल

swasthadmin

Leave a Comment