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डॉक्टर की सलाह से लें Antibiotic: पीएम मोदी

डॉक्टर की सलाह से लें Antibiotic: पीएम मोदी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। कुछ सालों से दुनियाभर में एंटीबायोटिक के कम होते असर को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। एक्सपर्ट बता रहे हैं कि बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक के सेवन ने न केवल उसका असर कम किया है बल्कि शरीर को भी नुकसान पहुंचाने लगा है। यह बात वैज्ञानिक रूप से भी सत्यापित हो चुकी है। ग्लोबल स्तर से WHO तो भारत में ICMR यानि Indian Council of Medical Research ने भी इसे साबित किया है। पीएम मोदी भी इससे चिंतित हैं तभी 2025 के आखिरी ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने इस पर चिंता जताई। उन्होंने भी इस रिपोर्ट का जिक्र किया जिसमें कहा गया है कि कई बीमारियों के खिलाफ एंटीबायोटिक कमजोर पड़ रही है।

एंटीबायोटिक: मनमर्जी से बचें

अपने संबोधन में पीएम ने कहा कि मेडिसिन के लिए गाइडेंस और एंटीबायोटिक के लिए डॉक्टर की जरूरत है। अपनी मनमर्जी से दवाओं का इस्तेमाल न करें, इससे रोगाणुओं पर इसका असर कम हो जाता है। इस दौरान उन्होंने निमोनिया और यूटीआई जैसी बीमारियों का जिक्र किया और कहा कि इन बीमारियों पर एंटीबायोटिक का असर कम होता जा रहा है, जो बेहद चिंता की बात है। पीएम ने जनता से अनुरोध किया कि किसी भी तरह की दवाई डॉक्टर से बगैर पूछे न खाएँ। ये बेहद खतरनाक है। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक ऐसी दवाएं नहीं हैं, जिन्हें यूं ही ले लिया जाए। इनका इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए। आजकल लोग ये मानने लगे हैं कि बस एक गोली ले लो, हर तकलीफ दूर हो जाएगी। यही वजह है कि बीमारियाँ और संक्रमण इन दवाओं पर भारी पड़ रहे हैं। उन्होंने आग्रह किया कि कृपया अपनी मनमर्जी से दवाओं का इस्तेमाल करने से बचें। एंटीबायोटिक दवाओं के मामले में तो इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। दवा के लिए सलाह और एंटीबायोटिक के लिए डॉक्टर की जरूरत है। यह आदत आपकी सेहत को बेहतर बनाने में बहुत मददगार साबित होने वाली है।

एंटीबायोटिक: संक्रमण रोकना कठिन

दरअसल ICMR रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि शरीर में प्रतिरोधक क्षमता में कमी का एक बड़ा कारण लोगों द्वारा बिना सोचे-समझे ऐसी दवाओं का सेवन है। ICMR ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारत में रोगाणु लगातार एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर रहे हैं। इसका असर ये हो रहा है कि ये दवाएँ इन रोगाणुओं को खत्म करने में सक्षम नहीं रहीं। इससे संक्रमण को रोकना मुश्किल होता जा रहा है। इससे मृत्यु का खतरा भी बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खून में होने वाले संक्रमण यानी ब्लडस्ट्रीम इंफेक्शन के लिए जिम्मेदार एक अहम रोगाणु क्लेबसिएला निमोनिया है। यह फेफड़ों को संक्रमित करके निमोनिया का कारण बन सकता है। इसके अलावा रक्त, त्वचा में घाव और मस्तिष्क की परत को संक्रमित करके मेनिन्जाइटिस से ग्रसित करता है। इसे रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले एंटीबायोटिक्स की क्षमता कमजोर साबित हो रही है। इससे बीमारी से निपटना मुश्किल होता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार स्थिति इतनी चिंताजनक है कि निमोनिया संक्रमणों में से केवल 43 फीसद का ही 2021 में प्राथमिक एंटीबायोटिक दवाओं से इलाज किया जा सका, जबकि 2016 में यह आंकड़ा 65 फीसद था।

एंटीबायोटिक: इम्युनिटी भी कमजोर

रिपोर्ट में एक और रोगाणु एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के संक्रमण को लेकर कहा गया है कि सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये रोगाणु बहु-दवा प्रतिरोधी क्षमता प्राप्त कर चुका है। ये आईसीयू में जीवन रक्षक उपकरणों पर रखे गए रोगियों के फेफड़ों पर हमला करता है। इससे मरीज की हालत और खराब हो जाती है। ई. कोलाई (E coli) एक ऐसा रोगाणु है, जो दूषित भोजन के सेवन के बाद मनुष्यों और जानवरों की आंतों में आमतौर पर पाया जाता है। ये भारत में आम बीमारी है। इसके अलावा क्लेबसिएला न्यूमोनिया, स्यूडोमोनास एरुगिनोसा, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी और स्टैफिलोकोकस ऑरियस जैसे रोगाणु आते हैं, जिसका संक्रमण सबसे ज्यादा फैलता है। इनके लिए इस्तेमाल होने वाले फ़्लोरोक्विनोलोन, थर्ड जनरेशन सेफलोस्पोरिन, कार्बापेनेम्स और पिपेरासिलीन टैज़ोबैक्टम जैसे एंटीबायोटिक लगातार अपना असर कम करते जा रहे हैं। इस मसले पर यह भारत के अलावा ग्लोबल चिंता का कारण बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में भी ऐसी ही चिंताएं व्यक्त की थी।

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