धीप्रज्ञ द्विवेदी
नयी दिल्ली। आधुनिक खगोल विज्ञान के इतिहास में मई 2021 की वह तारीख एक मील का पत्थर बन गई, जब यूटा के रेगिस्तान में स्थापित टेलिस्कोप एरे के संवेदकों ने एक ऐसी हलचल महसूस की, जिसने विज्ञान की बुनियादी समझ को चुनौती दे दी। अंतरिक्ष की गहराइयों से एक ऐसा अदृश्य कण पृथ्वी के वायुमंडल से टकराया, जिसकी ऊर्जा किसी भी ज्ञात मानवीय तकनीक की कल्पना से परे थी। इस कण को जापानी संस्कृति में प्रकाश और सूर्य की देवी के नाम पर ‘अमातेरासु’ कहा गया। यह केवल एक कण नहीं था, बल्कि सुदूर अंतरिक्ष के उस ‘शून्य’ से आया एक संदेश था, जिसे हम अब तक पूरी तरह खाली और निर्जीव समझते आए थे। इसकी ऊर्जा 244 एक्सा-इलेक्ट्रॉन वोल्ट (EeV) मापी गई, जो इसे अब तक के दर्ज इतिहास का दूसरा सबसे शक्तिशाली कॉस्मिक कण बनाती है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि एक सूक्ष्म परमाणु कण में इतनी अधिक गतिज ऊर्जा थी, जो एक ऊँचाई से गिरती हुई ईंट के प्रहार के बराबर प्रभाव डाल सकती थी।
ब्रह्मांड: सोच से परे उथलपुथल
अमातेरासु की उत्पत्ति का स्थान इस रहस्य को और अधिक गहरा बना देता है, क्योंकि जब खगोलविदों ने इसके आने की दिशा का सटीक मानचित्र तैयार किया, तो वे एक ऐसे विशाल क्षेत्र पर पहुँचे जिसे ‘लोकल वॉइड’ (Local Void) कहा जाता है। यह ‘शून्य’ हमारी आकाशगंगा के पड़ोस में स्थित लगभग 15 करोड़ प्रकाश वर्ष में फैला एक ऐसा अंधकारमय क्षेत्र है, जहाँ न तो कोई तारा मौजूद है और न ही कोई गैलेक्सी। भौतिकी के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, इतनी प्रचंड ऊर्जा केवल ब्लैक होल के पास होने वाले हिंसक टकरावों या मरते हुए तारों के महाविस्फोट (सुपरनोवा) से ही पैदा हो सकती है। लेकिन लोकल वॉइड में ऐसे किसी भी ‘कॉस्मिक इंजन’ का कोई नामोनिशान नहीं है। यह घटना इस संभावना की ओर इशारा करती है कि या तो उस शून्य में कुछ ऐसा है जिसे हमारे वर्तमान उपकरण देख नहीं पा रहे, या फिर ब्रह्मांड में ऊर्जा पैदा होने की कोई ऐसी प्रक्रिया चल रही है जो हमारे ‘स्टैंडर्ड मॉडल’ ऑफ फिजिक्स से बिल्कुल बाहर है।
ब्रह्मांड: आने वाले कणों की स्टडी होगी
इस रहस्य को सुलझाने की दिशा में टेलिस्कोप एरे की तकनीक हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है। 700 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैले इसके 507 सतह डिटेक्टर रात-दिन अंतरिक्ष से आने वाले इन अदृश्य संकेतों की निगरानी करते हैं। जब अमातेरासु जैसा उच्च-ऊर्जा कण हमारे वायुमंडल की गैसों से टकराता है, तो वह अरबों अन्य द्वितीयक कणों की एक ‘बौछार’ पैदा करता है, जिसे ये डिटेक्टर पकड़ लेते हैं। वैज्ञानिक अब इस एरे को चार गुना बड़ा करने की योजना बना रहे हैं (TAx4), ताकि इस ‘शून्य’ से आने वाले और भी कणों का अध्ययन किया जा सके। शोधकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि इस ऊर्जा का स्रोत डार्क मैटर का विखंडन या अंतरिक्ष के ताने-बाने में मौजूद कोई ‘टॉपोलॉजिकल डिफेक्ट’ हो सकता है। यदि यह सच साबित होता है, तो यह खोज हमें डार्क मैटर को प्रत्यक्ष रूप से समझने का पहला वास्तविक अवसर प्रदान करेगी।
ब्रह्मांड: बदलेगी शून्य की परिभाषा
भविष्य में अमातेरासु जैसे कणों का अध्ययन केवल अकादमिक कौतूहल का विषय नहीं रहेगा, बल्कि यह मानवता को ‘वैक्यूम एनर्जी’ या ‘जीरो-पॉइंट एनर्जी’ को समझने की दिशा में ले जा सकता है। यदि हम उस प्रक्रिया को डिकोड कर पाए जिससे एक खाली दिखने वाले शून्य से इतनी विशाल ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, तो यह भविष्य की ऊर्जा संबंधी समस्याओं का क्रांतिकारी समाधान बन सकता है। फिलहाल, अमातेरासु हमारे लिए एक दिव्य पहेली बना हुआ है, जो हमें याद दिलाता है कि ब्रह्मांड का वह हिस्सा जिसे हम ‘खाली’ समझते हैं, वास्तव में अज्ञात शक्तियों और असीमित ऊर्जा का एक विशाल भंडार हो सकता है। यह खोज विज्ञान को एक नए युग की दहलीज पर ले आई है, जहाँ ‘शून्य’ की परिभाषा बदलने वाली है।
