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The Thermometer.2—सावधानी बचाए मूत्र रोगों से: डॉ. शैलेंद्र गोयल

The Thermometer.2—सावधानी बचाए मूत्र रोगों से: डॉ. शैलेंद्र गोयल

नयी दिल्ली। The Thermometer.2 टॉक शो के अगले एपिसोड में इस बार हम जिस विशेषज्ञ से आपको मिलाने जा रहे हैं, वह मूत्र रोग यानी यूरोलॉजी से संबंधित हैं। वे हैं डॉक्टर शैलेंद्र गोयल। उनसे बात की है स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने। इस बातचीत में मूत्र रोग से लेकर किडनी स्टोन, बार—बार पथरी का बनना, प्रोस्टेट ग्लैंड, यूटीआई, सेक्स, मास्टरबेशन, स्वप्नदोष आदि तमाम परेशानियों पर डॉ. गोयल ने सावधानी संबंधी विस्तृत जानकारी दी और बचाव के मंत्र भी दिए। इस सबकी जानकारी हर उम्र के पुरुषों—महिलाओं के लिए जरूरी है।

आशुतोष: मूत्र रोग में किस—किस तरह की बीमारियों का उपचार आप करते हैं?
डॉ. गोयल: मूत्र रोग विशेषज्ञ मूत्र और जननांग आदि बीमारियों का उपचार करते हैं। इसमें किडनी की पथरियां, प्रोस्टेट ग्लैंड और मूत्र जननांग सिस्टम्स के कैंसर्स, किडनी फेलियर या ट्रांसप्लांट, सेक्सुअल समस्या, मेल इनफर्टिलिटी आदि रोग कवर किए जाते हैं। इसमें पुरुष एवं महिलाएं, दोनों का उपचार करते हैं।

आशुतोष: आपने पथरी की बात की। इसको लेकर गांवों में बहुत तरह की भ्रांतियां है। लोगों के पास सही जानकारी नहीं है। क्या है सही जानकारी?
डॉ. गोयल: बहुत सारी छोटी पथरियां अपने आप निकल जाती है क्योंकि बॉडी के अपने प्रोटेक्टिव मैकेनिज्म होते हैं। जैसे वायरल फीवर होता है तो सामान्यत: पांच छ दिन में ठीक होता है। तो आप पहले डॉक्टर के पास जाते हैं। दो दिन में नहीं ठीक हुआ। दूसरे के पास जाते हैं। दो दिन में नहीं ठीक हुआ। तीसरे के पास जाते हैं और उसी दिन ठीक हो जाते हैं तो आप तीसरे डॉक्टर को क्रेडिट दे देते हैं और पहले दो डॉक्टर को बोलते हैं कि उन्होंने सही दवा नहीं दी। छोटी पथरियां अपने आप निकल जाती है। आपके डॉक्टर ने दवा दी और पथरी निकल गई तो आपको वो वाली पैथी और वो वाला डॉक्टर सूटेबल है। कई बार बियर को भी क्रेडिट मिल जाता है कि आपने बियर पी, उससे पथरी निकल गई, आपने ये वाली दाल खाई, आपने इस डॉक्टर की दवा ली आपने इस पैथी की दवा ली या किसी ने अपने मंदिर—मस्जिद से दवा ली या किसी ने नानी—दादी वाले नुस्खे आजमाए।

आशुतोष: आखिर ये पथरी होती क्यों है? क्या शरीर में कोई केमिकल लोचा है जिसकी वजह से ये होती है?

डॉ. गोयल: किडनी का काम है कि बॉडी के जो नॉर्मल उपापच या मेटाबॉलिज्म में जो केमिकल्स ज्यादा बने उसे पानी में घोलकर बाहर निकालना जिसे मूत्र कहते हैं। इसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटेशियम, यूरिक एसिड, यूरिया, क्रिटिनिन भी होते हैं। लेकिन किडनी कोई केमिकल ज्यादा निकालने लगती है, कोई कम तो वो यूरिन में वो प्रेसिपिटेट होने लगता है। जैसे एक गिलास पानी में एक चम्मच नमक डालें तो वो घुल जाएगा। लेकिन चार चम्मच नमक डालें तो वो नीचे जम जाएगा, तो वही चीज इसमें है। जब वो केमिकल किडनी में जमने लगते हैं तो वो पथरी बनाने लगते हैं। ये किडनी की एक बीमारी है कि वो केमिकल्स को सही ढंग से डील नहीं कर पाया। पथरी की बीमारी बहुत से लोगों को हो जाती है। किसी को छोटी तो किसी को बड़ी। 90 फीसद चांस है कि चार—पांच एमएम तक की पथरियां निकल जाती है लेकिन उससे बड़ी नहीं निकल पाती। तब सर्जरी करनी होती है। कुछ दवाइयां होती हैं जो यूरेटर को रिलैक्स करती हैं। कुछ पेन को कम करने की तो कुछ इनफेक्शन को टालने की। दवा सिर्फ राहत देती है।

आशुतोष: पथरी की सर्जरी की सफलता को लेकर भी मरीजों में संशय रहता है।
डॉ. गोयल: अब तकनीक बेहतर हो चुकी है। आज से 30-40 साल पहले जो ऑपरेशंस करते थे, उसमें पेट में पूरा कट लगा देते थे। महीनों पेशेंट उठ भी नहीं पाता था। आज की तारीख में 99 फीसद सर्जरी बिना कट के होती है। पेशाब के रास्ते लेजर से एक बहुत पतली सी दो-तीन एमएम की दूरबीन किडनी तक जाकर पथरियों को तोड़कर डस्ट करके निकाल देती है। यदि बड़ी पथरी है तो एक मिनी पीसीएनएल तकनीक होती है जिसमें दो-तीन एमएम का कट लगता है। पीसीएनएल में तो 10 एमएम का कट लगाते थे। अब इन सब तकनीक की वजह से पेशेंट को हॉस्पिटल में केवल एक दिन रुकना होता है। कुछ केस में एक स्टेंट डाला जाता है जिससे कुछ डस्ट पार्टिकल है तो निकल जाए। किडनी में स्वेलिंग, इन्फेक्शन साफ हो जाए। पथरी जहां पर फंसी थी, वहां कोई घाव है तो हील हो जाए। इसे दो चार हफ्ते बाद निकाल दिया जाता है। जब तक स्टंट रहता है तो पेशाब में थोड़ा बहुत इरिटेशन या माइनर पेन हो सकता है। उसके लिए दवाएं हैं।

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आशुतोष: एक सवाल और है। एक बार आपने ऑपरेशन कर पथरी निकाल दिया लेकिन पथरी की शिकायत फिर कैसे हो जाती है?
डॉ. गोयल: पथरी बनी तो उसे निकाल दिया लेकिन किडनी की बीमारी तो ठीक नहीं हुई। अब वो है तो फिर बनेगी। पथरी पूरी साफ भी हो जाए तब भी दोबारा बनेगी। बहुत सारी पैथीज में बीमारी का जड़ से इलाज होता है। वो बीमारी को खत्म करते हैं। ये दवाइयां पथरी को गलाती हैं। आयुर्वेद, होम्योपैथ पुरानी पैथीज है और बहुत डेवलप पैथीज रही। पर हजारों साल की गुलामी में इसके सारे साहित्य को नष्ट कर दिया गया। पुरानी पैथी किडनी के उस केमिकल लोचे को ठीक करती है कि पथरी फिर ना बने। दवाइयां पथरी बनने को रोकती है। जो बन गई, उसको नहीं गलाएंगी।

आशुतोष: आप प्रोस्टेट ग्लैंड का भी उपचार करते हैं। इसका बढ़ना—घटना, छोटा होना या बड़ा होना…इसमें किस तरह की बीमारी होती है?
डॉ. गोयल: प्रोस्टेट ग्लैंड एक सेक्सुअल ऑर्गन है जहां वीर्य बनता है। ऐसा नहीं कि बुढ़ापे में ही प्रोस्टेट बढ़ता है। जवान लोगों में भी प्रोस्टेट में इंफेक्शन होता है जिसको हम प्रोस्टेटाइटिस कहते हैं। ओल्ड ऐज़ में प्रॉस्टेट जब बढ़ने लगता है तो उसको हम बीपीएच कहते हैं। प्रॉस्टेट में कैंसर भी हो जाता है। यंग ऐज में लोगों को लगता है कि वीर्य निकल जाएगा, तो शरीर में कमजोरी आ जाएगी और पता नहीं क्या-क्या भ्रांतियां होती हैं। जबकि वीर्य नेचुरल है। जब सेक्सुअल ऑर्गन विकसित हो जाता है तो वीर्य बनना शुरू हो जाता है और उसका निकलना जरूरी है। जैसे थूक, लैट्रिन, पेशाब है। इनका निकलना जरूरी है वरना परेशानी होगी। ऐसे ही वीर्य यदि नहीं निकलेगा तो अंदर ग्लैंड में इकट्ठा होगा और वहां इनफेक्शन करेगा। लेकिन हमारा समाज ऐसा है कि सेक्सुअल बातें हम नहीं करते हैं। यौन शिक्षा की कमी है। सेक्स की बात करना गंदी बात मानी जाती है। हमारा सोशल सिस्टम है कि हम सेक्स तब करते हैं जब हमारी शादी हो गई हो। आप आउट ऑफ वेडिंग यदि आप सेक्स कर रहे हो तो वो गलत माना जाता है। तो मास्टरबेशन से वीर्य निकाला जाता है। प्रकृति ने तो आपको 15 साल में जवान बना दिया। ये मेरा सोशल सिस्टम है कि मैं तब शादी कर रहा हूं जब 30 साल का हो गया।

आशुतोष: लेकिन हस्तमैथुन को लेकर भी तो समाज में गलत धारणा बनी हुई है?
डॉ. गोयल: वही मैं बताना चाहूंगा कि वीर्य यदि बन रहा है तो उसके साथ पांच चीजें हो सकती है। या तो सेक्स से निकलेगा, हस्तमैथुन से निकलेगा। यदि इन दोनों में नहीं निकल रहा तो नाइट फॉल में निकलेगा। स्वप्न दोष जिसको बीमारी कह देते हैं जबकि वो बीमारी नहीं है क्योंकि वो तो एक्स्ट्रा सिक्रेशन है सो निकल रहे हैं। इन तीनों चीजों में नहीं निकला तो पेशाब के साथ मिक्स होकर निकलेगा। आप लैट्रिन गए, पेशाब के साथ थोड़ा सा निकला जिसे धात कहते हैं। वो भी कोई बीमारी नहीं। पांचवी चीज है कि वो अंदर रुकेगा और प्रोस्टेट ग्लैंड में इंफेक्शन करेगा। तब लोगों को होता है कि पेशाब कर रहे हैं तो जलन हो रही है, दर्द हो रहा है, दिक्कत हो रही है, पेशाब बार-बार जाना पड़ रहा है। ये गड़बड़ है। वो प्रॉस्टेटाइटिस हो रही है।

आशुतोष: इसका मतलब हस्तमैथुन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और उससे कोई नुकसान नहीं होता। नुकसान होता है इस सोच से कि गलत काम हुआ। थॉट प्रोसेस से?
डॉ. गोयल: इसे ऐसे समझें। अभी आपको बहुत बड़ा गिफ्ट दूं तो यहां से खुश होकर निकलेंगे। चेहरे पर मुस्कान होगी, छाती फूल रही होगी, अच्छा लगेगा। अब इस चीज का दूसरा एंगल है कि आप यहां से कोई सामान चोरी करके उठा लें। वही सामान जो मैं आपको देना चाह रहा था। अब क्या होगा? अब ये जुबान सूख रही होगी। दिल धड़क रहा होगा कि किसी ने देख तो नहीं लिया? डॉक्टर साहब पुलिस कंप्लेन तो नहीं कर देंगे। पकड़ तो नहीं लेंगे। फिजिकली क्या हुआ? सामान यहां से वहां गया। बस एक चीज को बॉडी ने समझा कि अच्छा काम हुआ। एक चीज को बॉडी ने समझा गलत काम। तो हमारी बॉडी ने उसी तरीके से रिएक्ट किया। तो मास्टरबेशन से लोग कहते हैं कि किसी को अंधापन हो गया, किसी की नजर कमजोर हो गई, किसी को कमजोरी हो गई, हड्डी गलने लगी क्योंकि उसके थॉट प्रोसेस में आया कि उसने बहुत गलत काम किया। तो उसको वो सब चीजें फिजिकली हो रही है।

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आशुतोष: ऐसा कुछ है क्या इसमें कि एक महीने में कितनी बार आप कर सकते हैं?
डॉ. गोयल: एक चीज़ होती है एडिक्शन कि आप दिन में चार-चार पांच—पांच बार कर लो। सही फ्रीक्वेंसी ये है कि आपका जो वीर्य बन रहा है, वो हफ्ते में दो या तीन बार निकलना चाहिए। दूसरी चीज कि वीर्य निकलने के बाद फौरन पेशाब नहीं जाना चाहिए। बॉडी के अंग मल्टीटास्किंग नहीं होते। गले से बात करें, पानी भी पी लें, सांस भी लें तो ये सब साथ नहीं कर सकते। पानी पेट में जाता है, सांस की नली उससे भिन्न है। सांस लंग्स में जाती है। पेशाब के रास्ते से जब प्रोस्टेट ग्लैंड खुला है और वीर्य निकल रहा है तो पेशाब वाला रास्ता बंद है। यदि उस समय पेशाब करें तो प्रोस्टेट में जाएगा और प्रोस्टेटाइटिस करेगा। तो टाइम का अंतर रहे। ये पुरुषों के लिए है। महिलाओं के लिए दूसरी चीज है कि उनको सेक्स के बाद फौरन जाना चाहिए।

आशुतोष: आपने एक और बात कही कि प्रोस्टेट में कैंसर हो जाता है। ये क्या है?
डॉ. गोयल: यह मोस्ट कॉमन कैंसर है जो पुरुषों में होता है। ओरल कैंसर और लंग्स कैंसर के बाद यह तीसरे नंबर पर आता है। सामान्यतया 40-50 साल के बाद की उम्र में यह होता है। अच्छी बात यह है कि इसका उपचार संभव है। कोई चौथे स्टेज में भी आता है तो लाइफ एक्सपेक्टेंसी 10 साल की दी जाती है। अर्ली स्टेज में क्योर हो जाता है। उसकी लाइफ पर फर्क ही नहीं पड़ता। कैंसर की बात आते ही लोग समझते हैं कि अब तो यमदूत आ गया और इसका मतलब छ महीने, साल भर। लेकिन यदि उपचार नहीं करते हैं तो परेशान करता है। दर्द करता है। पेशाब में तकलीफ करता है। ब्लीडिंग करता है। ऐसा कुछ हो रहा होगा तो यह प्रोस्टेट कैंसर होने की आशंका है। इसका कोई स्पेसिफिक सिम्टम नहीं होता। यही लक्षण बीपीएच में भी होता है। बीपीएच और कैंसर्स को अलग करता है एक ब्लड टेस्ट यानी पीएसए टेस्ट। मेरी सलाह है कि 40 साल के बाद पुरुषों को हर साल पीएसए टेस्ट कराना चाहिए। यदि पीएसए टेस्ट बढ़ा हुआ है तो मूत्र रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। पीएसए बढ़ा आने का एक कारण कैंसर भी होता है। एक कारण इनफेक्शन भी होता है। तो ऐसा नहीं कि पीएसए बढ़ा हुआ है तो 100 फीसद कैंसर ही है। पीएसए और भी चीजों से बढ़ सकता है। जरूरत पड़े तो एमआरआई, बायोप्सी या कोई टेस्ट कराएं।

आशुतोष: बायोप्सी को लेकर भी भ्रम है कि इससे कैंसर बढ़ जाएगा?
डॉ. गोयल: ये सब मिथ है, गलत जानकारी है। जब तक आपको बीमारी का पता नहीं चलेगा, आप इलाज कैसे करोगे? हर कैंसर के रूल्स अलग होते हैं। प्रोस्टेट कैंसर का रूल है। बायोप्सी करते हैं। किडनी कैंसर है तो उसमें हम बायोप्सी नहीं करते हैं। उसमें सिटी स्कैन से ही कंफर्म हो जाता है।

आशुतोष: किडनी में भी कैंसर हो तो कैसे पहचानेंगे?
डॉ. गोयल: किडनी में कैंसर नॉर्मली चेकअप्स में ही पता चलता है या पेशाब में यूरिन में ब्लड आ रहा है। जैसे हम गाड़ी खरीदते हैं। उसके हर तीन महीने के सफर के बाद ब्रेक, इंजन ऑयल चेक कराते हैं। लेकिन इंसान जब पैदा होता है तो वो डॉक्टर के पास तभी जाता है जब उसमें कुछ प्रॉब्लम हो। गाड़ी जैसी बात ही बॉडी के साथ है। अपना हेल्थ चेकअप साल में एक बार कराना चाहिए ताकि कोई बीमारी है तो पता चल जाए और अर्ली स्टेज में पता चल जाए। वरना जब बीमार पड़ोगे, जब हार्ट अटैक हो जाएगा, तब जाओगे डॉक्टर के पास। यदि पहले ही टेस्ट करा लेते हैं तो हो सकता है कि हार्ट अटैक वाली स्टेज ना जाए। पहले ही बीपी को कंट्रोल करने की दवा शुरू कर दें। शुगर को कंट्रोल करने की दवा शुरू कर दें।

आशुतोष: महिलाओं की बीमारियां, खासतौर से इनफेक्शन की बात पर प्रकाश डालें?
डॉ. गोयल: मूत्र, किडनी या सेक्सुअल संबंधी रोग महिलाओं में भी होता है चाहे किसी उम्र की हो। महिलाओं को भी यूरिन की दिक्कत होती है। महिलाओं में प्रोस्टेट ग्लैंड नहीं होता लेकिन समस्याएं पुरुषों जैसी ही होती है। यंग ऐज में यूटीआई बहुत कॉमन है। लेकिन अमूमन महिलाएं गायनेकोलॉजिस्ट के पास जाती हैं। यहां मैं बताना चाहूंगा कि महिला रोग विशेषज्ञ यूट्रस और बच्चा होने या बच्चेदानी के इनफेक्शंस, कैंसर्स सबको डील कर रही होती हैं। जो यूरिनरी पार्ट है वो गायनेकोलॉजिस्ट अच्छे से डील नहीं कर पाती हैं। उसके लिए सही डॉक्टर यूरोलॉजिस्ट या मूत्र रोग विशेषज्ञ होते हैं। अब बात करें यूटीआई की। यंग फीमेल्स में यूटीआई बहुत कॉमन होता है। एक होता है शादी के फौरन बाद जिसे हनीमून सिस्टाइटिस कहते हैं। उसका एक कॉमन कारण है। मैंने अभी आपको बताया कि मेल को सेक्स के बाद वॉश करना चाहिए, यूरिन नहीं जाना चाहिए और फीमेल को जरूर जाना चाहिए। होता क्या है कि फीमेल यूरथ्रा बहुत छोटी होती है और नॉर्मली वेजाइना में नॉर्मल बैक्टीरिया होते हैं। सेक्स के दौरान वेजाइना के बहुत सारे बैक्टीरिया पेशाब की थैली में चले जाते हैं। यदि आप बाद में यूरिन कर देते हैं तो वो बैक्टीरिया बाहर निकल गए। उसी समय निकल गए। 99 फीसद तो बाहर निकल गए। एक आध फीसद रहा तो बॉडी की इम्यूनिटी उसको देख लेती है। लेकिन यदि आप यूरिन नहीं गए और सो गए तो ब्लैडर में पड़े हुए सारे बैक्टीरिया इनफेक्शंस बढ़ा सकते हैं। उनके लिए सलाह है कि सेक्सुअल कांटेक्ट के बाद यूरिन जाना चाहिए जिससे यूटीआई के चांस बहुत कम कम हो जाते हैं।

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आशुतोष: ये आपने बहुत अच्छी बात बताई। अगर यूटीआई हो गया तो क्या सावधानी रखें?
डॉ. गोयल: कुछ महिलाएं होती हैं जिन्हें यूटीआई इनफेक्शंस बहुत ज्यादा होता है। उनको मूत्र रोग विशेषज्ञ से मिलना चाहिए। हम पहले यूटीआई का उपचार करते हैं और फिर बार-बार यूटीआई ना हो तो उसके बचाव के लिए कुछ दवाइयां भी देते हैं। कैनबेरी जूस, किन्नू, संतरा, मोसंबी जूस जिसमें सिट्रिक एसिड और स्कोर्बिक एसिड होती हैं। ये चीजें यूटीआई से बचाव करती हैं। पानी बहुत पीना चाहिए लेकिन बहुत के नाम पर 8—9 लीटर नहीं बल्कि लगभग 3 लीटर के आसपास होना चाहिए जिससे दो—ढाई लीटर के आसपास यूरिन का वॉल्यूम रहे।

आशुतोष: आपने सही और उपयोगी सुझाव दिया। एक यूरोलॉजिस्ट होने के नाते स्वस्थ रहने के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
डॉ. गोयल: एक तो पानी का इंटेक 3 लीटर के आसपास रहे क्योंकि किडनी जो केमिकल्स निकालती है उसे घुलने के लिए पानी पर्याप्त चाहिए। जब कम पानी लेंगे तो वो केमिकल्स जमकर पथरी, इनफेक्शंस कर सकते हैं। आप यदि बहुत ज्यादा फिजिकल वर्क कर रहे हैं जहां पसीना बहुत ज्यादा आता है तो थोड़ी मात्रा बढ़ा सकते हैं। गला और किडनी तर रहनी चाहिए। बैलेंस डाइट लें। कोक, कोला आदि हेल्दी नहीं है। नमक, चीनी थोड़ा सा कम करें। यदि ब्लड प्रेशर और डायबिटीज है तो कंट्रोल रखें। सीमन का रेगुलर निकलना चाहिए। मेल को सेक्स के फौरन बाद पेशाब नहीं जाना चाहिए और महिलाओं को फौरन बाद क्लीन अप और पेशाब जरूर करना चाहिए। यह मेरे छोटे—छोटे मंत्र हैं।

प्रस्तुति— अजय वर्मा

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