धीप्रज्ञ द्विवेदी
भूमिका: आधुनिक विज्ञान और प्रकृति का सामंजस्य

मानव सभ्यता के इतिहास में प्रकृति और मनुष्य का संबंध सदैव पूरक रहा है। भारतीय मनीषा ने आदिकाल से ही ‘ऋतु-चर्या’ और ‘खगोल-शास्त्र’ के माध्यम से चराचर जगत के परिवर्तनों को समझने का प्रयास किया है। वर्तमान कालखंड में, जब ‘जलवायु परिवर्तन’ (Climate Change) एक वैश्विक संकट के रूप में संपूर्ण मानवता के समक्ष उपस्थित है, तब भारत सरकार द्वारा उद्घोषित ‘मिशन मौसम’ (Mission Mausam) वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और दूरदर्शिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा है। लगभग द्वि-सहस्र कोटि (₹2,000 करोड़) रुपये के विशाल वित्तीय प्रावधान के साथ, यह मिशन भारत को एक ‘मौसम-सजग’ और ‘आपदा-सहिष्णु’ राष्ट्र के रूप में पुनर्स्थापित करने हेतु संकल्पित है।
1.मिशन का दार्शनिक एवं सामरिक अधिष्ठान: ‘मिशन मौसम’ केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं है, अपितु यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का एक महत्वपूर्ण सोपान है। इस मिशन का मूल मंत्र ‘सूक्ष्मता, सटीकता और समयबद्धता’ है।
अति-स्थानीय पूर्वानुमान का युग: अब तक भारत का ऋतु-विज्ञान केवल व्यापक जनपदों (जिलों) के स्तर पर पूर्वानुमान प्रस्तुत करता था, किंतु इस मिशन ने इस सीमा का अतिक्रमण करते हुए इसे ‘ग्राम-पंचायत’ और ‘वार्ड’ स्तर तक सूक्ष्म बना दिया है।
कृषि-संस्कृति का संरक्षण: भारत एक कृषि-प्रधान राष्ट्र है, जहाँ प्रत्येक ऋतु-परिवर्तन का सीधा प्रभाव अन्नदाता के जीवन पर पड़ता है। यह मिशन कृषकों को बोवाई, सिंचाई और फसल संचयन के लिए अति-विशिष्ट वैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराने में सक्षम है।
2. तकनीकी मेधा: महासंगणक ‘अरुणिका’ और ‘अर्क’ का प्रादुर्भाव—किसी भी ऋतु-विज्ञान मिशन की सफलता उसके गणितीय मॉडलों और डेटा प्रोसेसिंग की शक्ति पर निर्भर करती है। ‘मिशन मौसम’ के अंतर्गत पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने भारत की गणना-शक्ति को वैश्विक स्तर पर पहुँचा दिया है:
महा-संगणकीय सामर्थ्य: भारत ने अपनी सुपरकंप्यूटिंग क्षमता को बढ़ाकर २८ पेटाफ्लॉप्स से अधिक कर लिया है। ‘अरुणिका’ और ‘अर्क’ जैसे अत्याधुनिक महासंगणक प्रति सेकंड अरबों गणनाएँ करने में सक्षम हैं, जिससे वायुमंडल की जटिल हलचलों का विश्लेषण अत्यंत सहज हो गया है।
भारत एफएस (BharatFS): यह उन्नत पूर्वानुमान प्रणाली 6 किलोमीटर के अति-सूक्ष्म अंतराल पर वायुमंडलीय मानचित्रण करती है। यह तकनीक न केवल वर्षा, अपितु वायु की गति, आर्द्रता और तापक्रम के सटीक परिवर्तनों को रेखांकित करती है, जिससे भविष्यवाणियों की विश्वसनीयता में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।
3. आपदा प्रबंधन और जन-सुरक्षा का सुरक्षा-कवच—वर्ष 2025 के आँकड़े साक्ष्य हैं कि भारत ने चरम मौसमी घटनाओं (Extreme Weather Events) का सामना करने के लिए अभूतपूर्व तैयारी की है।
तड़ित और वज्रपात सुरक्षा: भारत में आकाशीय बिजली गिरने से होने वाली जनहानि एक गंभीर चिंता रही है। मिशन मौसम के अंतर्गत स्थापित ‘नाउकास्ट’ (Nowcast) तंत्र अब 3 घंटे पूर्व ही सटीक चेतावनी देने में सक्षम है।
हीटवेव और चक्रवात: तटीय क्षेत्रों में चक्रवातों की पूर्व-सूचना और ग्रीष्म ऋतु में ‘लू’ (Heatwave) के सटीक अनुमान ने मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर पर ला दिया है। २०२५ की रिपोर्ट के अनुसार, लू के पूर्वानुमान में भारत की सटीकता दर 98 प्रतिशत रही है, जो एक वैश्विक कीर्तिमान है।
4. सतत विकास और वैश्विक नेतृत्व (SDG 13)—’मिशन मौसम’ संयुक्त राष्ट्र के ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (SDG 13-जलवायु कार्रवाई) और ‘सेंडाई फ्रेमवर्क’ के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को पुष्ट करता है। यह मिशन न केवल भारत के लिए, अपितु ‘ग्लोबल साउथ’ (दक्षिण एशिया और अफ्रीका के विकासशील देशों) के लिए भी एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है। भारत अब अपने उपग्रह आंकड़ों और मौसम संबंधी विश्लेषणों को पड़ोसी देशों के साथ साझा कर क्षेत्रीय सुरक्षा में अपना योगदान दे रहा है।
5. चुनौतियाँ और भविष्य का मार्गप्रशस्तन—किसी भी महती योजना के समक्ष ‘अंतिम छोर तक संप्रेषण’ (Last Mile Communication) की चुनौती सदैव रहती है। ‘मिशन मौसम’ का आगामी चरण कृत्रिम मेधा (AI) और मशीन लर्निंग (ML) के गहन समावेश पर केंद्रित है। साथ ही, क्षेत्रीय भाषाओं में इन सूचनाओं का प्रसार और जन-जागरूकता इस मिशन के सामाजिक उद्देश्यों को पूर्ण करेगी।
उपसंहार
‘मिशन मौसम’ आधुनिक विज्ञान के मंदिर में भारत की वह अर्घ्य है, जो मानवता की रक्षा के लिए समर्पित है। यह मिशन हमें सिखाता है कि हम प्रकृति को नियंत्रित नहीं कर सकते, किंतु अपनी वैज्ञानिक मेधा से स्वयं को प्रकृति के प्रकोप से रक्षित अवश्य कर सकते हैं। यह ‘न्यू इंडिया’ की वह हुंकार है जो अंतरिक्ष से लेकर धरती के अंतिम छोर तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।
(लेखक पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
