अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) में अब चंद दिन ही रह गए हैं। इस मौके पर प्रस्तुत है खास आलेखों की दूसरी कड़ी।
कुमार कृष्णन
अपनी अंतरात्मा में स्वयं को महसूस करने से बेहतर कोई अनुभव नहीं है। सदियों से योग अंतर्मन की शांति जागृत करने के लिए जाना जाता है। हम अकसर मन की शांति की तलाश भौतिक वस्तुओं में करते हैं।
बीसवीं सदी के भारत के प्रख्यात योगी, चिकित्सक, आध्यात्मिक गुरु और वेदांत के महान आचार्य के शिष्य और विश्व योग आंदोलन के प्रवर्तक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योगिक अभ्यासों के प्रसार के माध्यम से लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने में अग्रणी भूमिका निभाई। बिहार योग विद्यालय,मुंगेर के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा विकसित सत्यानंद योग जो बिहार योग के रूप में विदेशों में अत्यधिक लोकप्रिय है। यह पारंपरिक योग पद्धतियों, वैज्ञानिक शोधों और आधुनिक जीवनशैली का एक अनूठा मिश्रण है। इस कारण परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती को आधुनिक युग का पतंजलि माना जाता है, क्योंकि उन्होंने प्राचीन और जटिल योग विज्ञान को सरल, वैज्ञानिक और व्यावहारिक बनाकर आम जनमानस तक पहुँचाया। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार-“स्वामी सत्यानंद ने योग को नया जीवन, नया जन्म दिया। उन्होंने योग का पुनरुद्धार किया –अन्यथा यह लुप्त हो गया होता। इसलिए, स्वामी सत्यानंद आज के पतंजलि हैं।”
1963 में उनके द्वारा स्थापित बिहार योग विद्यालय वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र बन गया, जिसने मस्तिष्क, हृदय और हाथों की इंद्रियों को विकसित करने के लिए यौगिक अभ्यासों और सिद्धांतों के मिश्रण का प्रचार किया। इस प्रणाली को बिहार योग या सत्यानंद योग परंपरा कहा जाता है। उन्होंने स्वामी शिवानंद द्वारा परिकल्पित ‘संश्लेषण योग’ प्रणाली को अपनाया और वेदांत, योग और तंत्र के व्यावहारिक और अनुप्रयुक्त पहलुओं को मिलाकर बिहार योग/सत्यानंद योग प्रणाली की रचना की।
बिहार योग/सत्यानंद योग की प्रमुख विशेषताओं में से एक है योग के सभी पहलुओं का एकीकरण। योग की विभिन्न शाखाओं को एक व्यवस्थित दृष्टिकोण में समाहित किया गया है ताकि संतुलित विकास और पूर्णता प्राप्त की जा सके। समग्र योग साधना की नींव मूलभूत योगों द्वारा रखी जाती है जो मस्तिष्क, हृदय और हाथों की इंद्रियों को विकसित करते हैं: हठ योग, राज योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग। योग की अन्य शाखाएँ भी बिहार योग/सत्यानंद योग प्रणाली का हिस्सा हैं, जिनमें मंत्र योग, नाद योग, क्रिया योग, कुंडलिनी योग, लय योग आदि शामिल हैं।
बिहार योग/सत्यानंद योग प्रणाली विकसित करते हुए, स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने प्राचीन योग और तांत्रिक प्रणालियों से अज्ञात और गुप्त अभ्यासों को प्रकाश में लाया। उन्होंने अभ्यासों के प्रगतिशील चरणों, अवस्थाओं और क्रमों की पहचान की और उन्हें सरल और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया, जिससे सभी लोग इस मूल्यवान विज्ञान में गहराई से उतर सकें और इसके लाभ प्राप्त कर सकें। पहली बार ये अभ्यास आम लोगों के लिए व्यावहारिक, सुरक्षित और प्रभावी रूप में सुलभ हुए। स्वामी सत्यानंद ने देखा कि सरल अभ्यास समकालीन लोगों के लिए उपयुक्त हैं, और नियमित अभ्यास से गहन और परिवर्तनकारी अनुभव प्राप्त होते हैं।
श्री स्वामी सत्यानंद ने योग की पद्धतियों को अद्वितीय ढंग से व्यवस्थित किया और प्राचीन ग्रंथों और ज्ञान से प्रेरणा लेकर अनेक ऐसी तकनीकें विकसित कीं जिनका अभ्यास आज विश्व भर में किया जाता है।
उन्होंने ऋषि पतंजलि के योग-सूत्रों का आधुनिक विश्लेषण कर मानवता को एक सुगम योग पद्धति प्रदान की। स्वामी सत्यानंद ने योगिक तकनीकों के प्रभावों पर वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रयोगों की अपार संभावनाओं और लाभों को पहचाना और 1970 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने कई योगिक अनुसंधान परियोजनाओं की शुरुआत की और उन्हें प्रेरित किया। इस अनुसंधान ने समाज को यह समझने में मदद की है कि योगिक अभ्यास मानव शरीर, मन और भावनाओं को कैसे प्रभावित करते हैं, और कैसे ये अभ्यास आंतरिक छिपी हुई क्षमता को जागृत कर सकते हैं और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।
विभिन्न अभ्यासों और तकनीकों का उपयोग अस्थमा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर और गर्भावस्था सहित कई प्रकार की स्थितियों की रोकथाम, प्रबंधन और उपचार के लिए चिकित्सीय रूप से कैसे किया जा सकता है।स्वामी सत्यानंद ने योग पर छाए रहस्यवाद के पर्दे को हटाकर इसे व्यक्तिगत और आध्यात्मिक विकास के विज्ञान के रूप में न केवल भारत में, बल्कि विश्व के हर महाद्वीप में साधकों के सामने प्रस्तुत किया। योग को चेतना के विकास के लिए एक आध्यात्मिक विज्ञान के रूप में उसके शुद्धतम रूप में प्रकट किया गया और यह जीवन के सभी क्षेत्रों और परिस्थितियों के लोगों तक उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास के लिए पहुँचा।
उन्होंने प्राचीन योग विज्ञान को आधुनिक चिकित्सा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ने में अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में कई क्रांतिकारी प्रयोग और अनुसंधान किए। स्वामी जी ने तंत्र शास्त्र की प्राचीन ‘न्यास’ पद्धति को वैज्ञानिक रूप देकर ‘योग निद्रा’ का आविष्कार किया। चिकित्सा विज्ञान ने माना है कि यह तकनीक तनाव, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा और कैंसर जैसी घातक बीमारियों के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने में अत्यंत प्रभावी है। आधुनिक चिकित्सा शोधों से प्रमाणित हुआ है कि योग निद्रा मस्तिष्क की तरंगों को शांत करती है और मानसिक-भावनात्मक असंतुलन को ठीक करती है।
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार -“योग निद्रा आज पूरे विश्व में प्रचलित अभ्यास बन चुकी है।कई देशों के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री भी इसका अभ्यास कर रहे हैं।स्वामी सत्यानंद ने योग निद्रा की खोज की थी और इसे विश्वभर में प्रचारित किया। जैसे घर और कमरों की सफाई रोज होती है, उसी तरह मन की सफाई भी प्रतिदिन जरूरी है। हर रात केवल पांच मिनट देकर मन के कचरे को साफ किया जा सकता है। आज लोगों के मन में तनाव, क्रोध और अशांति बढ़ रही है।”
स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने जटिल आसनों को सरल बनाकर ‘पवनमुक्तासन’ की श्रृंखला विकसित की।इन आसनों को चिकित्सा और फिजियोथेरेपी के रूप में उपयोग किया जाता है। ये विशेष रूप से गठिया, पाचन तंत्र के विकारों और जोड़ों के दर्द के इलाज में अत्यंत लाभकारी पाए गए हैं। वहीं श्वसन तंत्र और प्राण-ऊर्जा के बीच के संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। स्वामी सत्यानंद सरस्वती के इन अभूतपूर्व चिकित्सा प्रयोगों के कारण ही आज योग को पश्चिमी देशों के आधुनिक अस्पतालों और चिकित्सा केंद्रों में भी मान्यता और अपना स्थान प्राप्त हुआ है।
इस कारण योग जैसे शानदार विज्ञान के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। वास्तव में वे भारत को योग, ध्यान, दर्शन, ज्ञान, संस्कृति तथा आध्यात्मवाद की भूमि मानते हैं। स्वामी सत्यानंद सरस्वती और उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस निरंजनानंद सरस्वती ने अमेरिका, भारत और स्वीडन जैसे देशों में कैदियों और बंदियों, जिनमें हिंसक अपराधों के आरोपी भी शामिल हैं, के जीवन को भी प्रभावित कर रही हैं।
बिहार योग पद्धति पर आधारित योगाभ्यास आज दुनिया के लगभग 56 से अधिक अर्जेंटिना, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चीन, कोलंबिया, क्रोएशिया, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, यूनान, ईरान, इराक, आयरलैंड, इटली, जापान, कजाकिस्तान, लेबनान, नेपाल, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल, स्कॉटलैंड, रूस, स्पेन, अमेरिका, लंदन, दक्षिण अफ्रीका, स्विट्जरलैंड सहित कई अन्य देशों में किया जा रहा है।मुंगेर स्थित ‘बिहार योग विद्यालय’ की परंपरा (सत्यानंद योग) ने फ्रांस में एक गहरा प्रभाव छोड़ा है। हज़ारों फ्रांसीसी नागरिक मुंगेर से प्रशिक्षित योग शिक्षकों से लाभान्वित हो रहे हैं, और यह प्राचीन पद्धति फ्रांस के स्कूलों से लेकर लोगों की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है। फ्रांस के किंडरगार्टन (केजी) से लेकर स्कूलों और कॉलेजों तक में मुंगेर की बिहार योग पद्धति (सत्यानंद योग) पढ़ाई और अपनाई जा रही है। मुंगेर से प्रशिक्षित योग शिक्षक वहां बच्चों को निरोगी बनाने और उनकी मानसिक मेधा विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।फ्रांस के प्रमुख शहरों में मुंगेर की परंपरा से जुड़े हज़ारों सक्रिय शिष्य और योग शिक्षक मौजूद हैं। इनमें से कई स्वतंत्र शिक्षक के रूप में पंजीकृत होकर योग सेवाएं प्रदान कर रहे हैं और समाज को स्वस्थ रखने में अपना योगदान दे रहे हैं।
साठ वर्ष से भी अधिक समय उन्होंने ने योग की एक एकीकृत प्रणाली तैयार की थी, जिसे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और भावनात्मक सामंजस्य को गुणात्मक रूप से बढ़ाने के तरीके के रूप में सिखाया जाता था।
बाह्य योग में प्रशिक्षण हठ योग, राज योग और फिर क्रिया योग के माध्यम से आगे बढ़ता था। साथ ही, आश्रम के वातावरण की जीवनशैली और प्रेरणा के माध्यम से कर्म योग, भक्ति और ज्ञान योग के आंतरिक पहलुओं का प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता था।
यह संरचना तब भी और अब भी एक समग्र योग प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें योग साधक मस्तिष्क, हृदय और हाथों की इंद्रियों को जागृत और एकीकृत कर सकता है। योग के विभिन्न अंग इस व्यक्तिगत सामंजस्य और एकीकृत अभिव्यक्ति को प्राप्त करने का साधन बन जाते हैं। तभी व्यक्तिगत स्तर पर उस गुणात्मक परिवर्तन और आंतरिक विकास की संभावना संभव हो पाती है, जिसकी परिकल्पना योग की दीर्घकालिक परंपरा में की गई है। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पुस्तक ‘आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध’, जिसका अनुवाद दुनिया की अनेक भाषाओं में हुआ है विश्वभर के कई योग विद्यालयों में मुख्य पाठ्यपुस्तक के रूप में प्रयुक्त होती है। आसनों को आसनों की स्थिति और क्रम के अनुसार वर्गीकृत किया है। आसनों की यह श्रृंखला योग आसनों को हर किसी के लिए सुलभ बनाती है, चाहे उनकी उम्र, क्षमता या अनुभव का स्तर कुछ भी हो।
परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती आध्यात्मिक उत्तराधिकारी स्वामी निरंजनानंद स्वयं योग के क्षेत्र में अग्रणी हैं। अपनी पुस्तक ‘धारणा दर्शन’ में उन्होंने तंत्र और उपनिषदों के प्राचीन ग्रंथों से कई धारणा (एकाग्रता) अभ्यास संकलित किए हैं। एक व्यवस्थित और प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने इन अभ्यासों को योग साधकों के लिए सुलभ बनाया है।
स्वामी निरंजनानंद ने योग कैप्सूल की शुरुआत भी की। योग कैप्सूल आधुनिक योग अभ्यासकर्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार किए गए अभ्यासों का एक समूह है। इन कैप्सूलों का अभ्यास करना सरल है और इन्हें पूरा करने में 10-20 मिनट लगते हैं। इन्हें विद्यार्थी के स्वास्थ्य और कल्याण को लाभ पहुंचाने के लिए बनाया गया है।उनका स्पष्ट मानना है कि योग को मात्र एक शारीरिक व्यायाम के रूप में न मानकर, इसे मानसिक एकाग्रता, भावनात्मक स्थिरता और एक संपूर्ण जीवनशैली के रूप में आत्मसात करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार शारीरिक स्वास्थ्य,मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करनेवाली योग विद्या के व्यावसायीकरण के साथ -साथ इसका परिवर्तित रुप समाज के सामने लाया जा रहा है और लोग योग विद्या के मूल उद्देश्य को भूल रहे हैं। सत्यानंद योग ने पूरे विश्व में योग के वास्तविक स्वरूप को पुनर्जाग्रत किया है। वह योग एवं आध्यात्म की गहन अनुभूतियों का स्पष्ट विवेचन ही नहीं करता, बल्कि जीवन में इन अनुभूतियों को प्राप्त करने की कला भी सिखाता है। सत्यम योग प्रसाद को जन जन तक पहुंचाने के लिए परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती भारत योग यात्रा कर रहे हैं।
