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IBOLA: उपचार के लिए वैक्सीन बनाने की तैयारी

IBOLA: उपचार के लिए वैक्सीन बनाने की तैयारी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। इबोला (IBOLA) के बढ़ते प्रसार को देखते हुए वैक्सीन बनाने की पहल हुई है। इसके लिए इंगलैंड के 37 वर्षीय इड हंट Ed Hunt ने पहले मानव ट्रायल में हिस्सा लेकर चिकित्सा विज्ञान में एक अहम कदम बढ़ाया है। यह वैक्सीन आक्सफोर्ड की उसी तकनीक पर आधारित होगी जिससे COVID-19 की Oxford–AstraZeneca वैक्सीन विकसित हुई थी। इस ट्रायल का उद्देश्य यह जांचना है कि वैक्सीन सुरक्षित है या नहीं और क्या यह Bundibugyo स्ट्रेन के खिलाफ मजबूत इम्यूनिटी पैदा कर सकती है।

कांगो में संक्रमण तेज

रिपोर्ट के अनुसार कांगो में इबोला वायरस का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक 3,200 से अधिक लोग इस बीमारी से संक्रमित हो चुके हैं, जबकि कम से कम 1,405 लोगों की मौत हो चुकी है। स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है क्योंकि केवल 10 दिनों में ही संक्रमण के मामलों में लगभग एक हजार रोगियों की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकार ने 15 मई को इस बीमारी के फैलने की घोषणा की थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रकोप आने वाले कई महीनों तक जारी रह सकता है और इसे रोकने के लिए लगातार प्रयासों की जरूरत होगी। डब्ल्यूएचओ के अनुसार इबोला के लगभग 90 प्रतिशत मामले डीआरसी के उत्तर-पूर्वी इटुरी प्रांत में सामने आए हैं। यह क्षेत्र दक्षिण सूडान और युगांडा की सीमा के पास स्थित है। इसके अलावा वायरस अब देश के पांच प्रांतों तक पहुंच चुका है, जिनमें दो नए प्रांत भी शामिल हैं जहां हाल ही में संक्रमण के मामले मिले हैं।

राहत में कई अड़चनें

स्वास्थ्यकर्मियों के सामने सबसे बड़ी समस्या प्रभावित इलाकों तक पहुंचना है। एक रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र की मानवीय हवाई सेवा (UNHAS) से जुड़े अधिकारी हेडली ताह ने बताया कि कई बार सहायता पहुंचाने की इच्छा होती है, लेकिन मुश्किल क्षेत्रों तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। यूएनएचएएस स्वास्थ्यकर्मियों और जांच टीमों को प्रभावित इलाकों तक पहुंचाने के साथ-साथ वायरस की जांच के लिए नमूने भी प्रयोगशालाओं तक पहुंचा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि बेहतर जांच और बीमारी की पहचान की व्यवस्था के कारण संक्रमण के अधिक मामले सामने आ रहे हैं। पहले कई मामलों का पता नहीं चल पाता था, लेकिन अब जांच सुविधाओं में सुधार होने से संक्रमित लोगों की पहचान तेजी से हो रही है। हालांकि, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बना हुआ है। कुछ अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों की हड़ताल के कारण बीमारी से निपटने के प्रयास प्रभावित हुए हैं। कई कर्मचारी बकाया वेतन की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

नए इलाज की कोशिश

इबोला एक गंभीर वायरल बीमारी है जो संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैलती है। इससे तेज बुखार, कमजोरी और कई मामलों में शरीर के अंदर या बाहर रक्तस्राव जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। पिछले 50 वर्षों में अफ्रीका में इबोला से 15 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इस बार फैल रहा वायरस बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का है। इस स्ट्रेन के लिए अभी तक कोई स्वीकृत टीका या इलाज उपलब्ध नहीं है। हालांकि, वैज्ञानिक तेजी से नए टीके और दवाओं पर काम कर रहे हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने हाल ही में बताया कि इस स्ट्रेन को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए एक प्रयोगात्मक टीके का परीक्षण शुरू हो चुका है। इसके अलावा कई अन्य संभावित टीकों और इलाजों को भी परीक्षण के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है।

एक और क्लिनिकल ट्रायल

इलाज के क्षेत्र में भी एक बड़ा कदम उठाया गया है। डीआरसी में पार्टनर्स नाम से एक अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया गया है। इसमें दो संभावित इलाजों की जांच की जा रही है। इनमें एक दवा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी एमबीपी134 है और दूसरी एंटीवायरल दवा रेमडेसिविर है। इस परीक्षण में मरीजों को दवाओं के साथ बेहतर सहायक इलाज भी दिया जा रहा है, जिसमें शरीर में पानी और लवण की कमी पूरी करना, ऑक्सीजन देना, रक्तचाप नियंत्रित करना और दर्द कम करना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि इबोला पर नियंत्रण पाने के लिए जल्दी पहचान, सही जांच, बेहतर इलाज और प्रभावित क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सबसे जरूरी है। डीआरसी में चल रहा प्रकोप दुनिया के लिए एक बार फिर यह याद दिलाता है कि संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैज्ञानिक प्रयास कितने महत्वपूर्ण हैं।

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