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NEET PG: कुछ विभागों में छात्रों की रुचि घटी

NEET PG: कुछ विभागों में छात्रों की रुचि घटी

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। NEET PG में जनरल सर्जरी, पीडियाट्रिक्स और गायनेकोलॉजी की विशेषज्ञता हासिेल करनें के प्रति रुचि घटती जा रही है। जबकि कभी MBBS के बाद सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ या स्त्री रोग विशेषज्ञ बनना बहुत से विद्यार्थियों का सपना हुआ करता था। ऐसा नतीजा इस साल की काउंसिलिंग के टॉप—100 की सूची के विश्लेषण से पता चलता है। इसमें 96 सीट आवंटनों में केवल 3 विद्यार्थियों ने जनरल सर्जरी, 3 ने पीडियाट्रिक्स और महज एक 1 विद्यार्थी ने गायनेकोलॉजी जैसी ब्रांच को चुना। क्या मेडिकल विद्यार्थियों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं या इसके पीछे समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था की भी कोई भूमिका है?

भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं

यह प्रतिक्रिया है लखनउ के केजीएमयू के नवजात शिशु और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विनय कुमार शुक्ल के। उनकी नजर में इसकी वजह हो सकती है—लंबे समय तक ड्यूटी, रात की इमरजेंसी, गंभीर मरीजों की जिम्मेदारी और हर समय किसी अनहोनी की आशंका। मेडिकल क्षेत्र में भविष्य के लिए इसे अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है। आज की सामाजिक स्थिति में सबसे ज्यादा चिंता तब होती है जब डॉक्टर अपनी पूरी कोशिश करने के बावजूद मरीज को बचा नहीं पाता और उसे मरीज के परिजनों के गुस्से, गाली-गलौज, मारपीट और अस्पताल में तोड़फोड़ का सामना करना पड़ता है। उनका कहना है कि हमारे समाज में एक अजीब सोच बनती जा रही है। मरीज ठीक हो गया तो यह उसका अधिकार है, लेकिन अगर मरीज की मृत्यु हो गई तो डॉक्टर अपराधी है। क्या किसी डॉक्टर के पास यह गारंटी है कि वह हर मरीज को ठीक करके ही घर भेजेगा? मेडिकल साइंस में इलाज की संभावना होती है, हर बार सफलता की गारंटी नहीं।

10 में 7 स्वास्थ्यकर्मियों से दुर्व्यवहार

डॉ. शुक्ल लिखते हैं कि भारत के दो इमरजेंसी विभागों में 200 स्वास्थ्यकर्मियों पर किए गए एक अध्ययन में लगभग 68 प्रतिशत लोगों ने गाली-गलौज या दुर्व्यवहार और 26 प्रतिशत ने मारपीट जैसी शारीरिक हिंसा का सामना करने की बात बताई। इसका मतलब है कि वहां सर्वे में शामिल हर 10 में से लगभग 7 स्वास्थ्यकर्मियों ने किसी न किसी तरह का दुर्व्यवहार झेला था। यह पूरे भारत का आंकड़ा नहीं है, लेकिन अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टरों की स्थिति समझने के लिए काफी है। अब विदेशों की स्थिति भी समझिए। OECD की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 98,857 भारत में जन्मे डॉक्टर OECD देशों में काम कर रहे थे। यानी भारत में जन्मे और प्रशिक्षित डॉक्टरों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में भी अपनी सेवाएं दे रहा है। यह संख्या केवल OECD देशों की है, पूरी दुनिया की नहीं। तो क्या विदेशों में डॉक्टरों के साथ मारपीट नहीं होती? बिल्कुल होती है। ब्रिटेन की NHS की 2025 की रिपोर्ट में लगभग 12 प्रतिशत मेडिकल और डेंटल कर्मचारियों ने बताया कि पिछले एक साल में उन्हें शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा। यानी वहां भी ऐसी घटनाएं होती हैं, लेकिन अस्पतालों की सुरक्षा, शिकायतों पर कार्रवाई और कर्मचारियों के संरक्षण की व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर है। अंतर केवल अस्पताल की बिल्डिंग, मशीनों और सुविधाओं का नहीं है। अंतर उस व्यवस्था का भी है जिसमें डॉक्टर काम करता है। वहां अस्पतालों में प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, पैरामेडिकल टीम, सुरक्षा व्यवस्था, इमरजेंसी प्रोटोकॉल और संस्थागत स्तर पर शिकायतों के समाधान की व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित हो सकती है। हालांकि हर अस्पताल और हर देश में परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं।

भारत में विशेषज्ञों की कमी

भारत में भी बहुत अच्छे सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल हैं, जहां डॉक्टर सीमित संसाधनों में बेहतरीन काम कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ ग्रामीण और जिला स्तर के अस्पतालों में विशेषज्ञों और आवश्यक संसाधनों की कमी एक बड़ी समस्या है। सरकार की Health Dynamics of India 2022-23 रिपोर्ट के अनुसार 2023 में ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी लगभग 80 प्रतिशत थी। इसमें सर्जन, फिजिशियन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ जैसे पद शामिल हैं। जिस देश को इन विशेषज्ञों की सबसे ज्यादा जरूरत है, उसी देश में अच्छे रैंक वाले विद्यार्थी इन ब्रांचों को अपेक्षाकृत कम चुन रहे हैं। हम एक तरफ चाहते हैं कि हर जिले में अच्छा सर्जन हो, हर अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ हो, हर गर्भवती महिला को सुरक्षित प्रसव की सुविधा मिले और हर इमरजेंसी में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हों। लेकिन दूसरी तरफ हम उन परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देना चाहते जिनमें ये डॉक्टर अपनी सेवाएं देते हैं।

भरोसा कायम रहे

सोशल मीडिया पर डॉ. शुक्ल ने लिखा है कि इस समस्या का समाधान डॉक्टर और मरीज को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने में नहीं, बल्कि दोनों के बीच विश्वास कायम करने में है। डॉक्टरों को भी मरीजों और उनके परिजनों से बेहतर संवाद करना चाहिए। इलाज की सीमाओं, संभावित जोखिमों और बीमारी की गंभीरता के बारे में समय रहते सही जानकारी देनी चाहिए। मरीजों के साथ संवेदनशीलता और सम्मान से पेश आना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में लापरवाही या गलत व्यवहार होने पर निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई भी होनी चाहिए। इसके साथ समाज को भी समझना होगा कि डॉक्टर के साथ मारपीट करने से किसी मरीज की जान नहीं बचती। अस्पताल में तोड़फोड़ करने से इलाज की गुणवत्ता नहीं बढ़ती। बल्कि इससे दूसरे मरीजों की जान भी खतरे में पड़ सकती है। सरकार को अस्पतालों में पर्याप्त सुरक्षा, आवश्यक मेडिकल स्टाफ, बेहतर इमरजेंसी सुविधाएं और डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं पर त्वरित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।

सुरक्षा बड़ी जरूरत

यह एक ऐसे स्वास्थ्य तंत्र की बात है जिसकी जरूरत कल सभी को पड़ सकती है। आज अगर किसी युवा को सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ या स्त्री रोग विशेषज्ञ बनने से पहले यह सोचना पड़ रहा है कि क्या वह इस पेशे में सुरक्षित रह पाएगा, तो यह केवल मेडिकल प्रोफेशन की समस्या नहीं है, यह पूरे समाज और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि आने वाले समय में जब किसी बच्चे को गंभीर बीमारी होगी, किसी महिला को प्रसव के दौरान इमरजेंसी होगी या किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति को तत्काल ऑपरेशन की जरूरत होगी, तब हमें रेडियोलॉजिस्ट और फिजिशियन के साथ-साथ एक अच्छे सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ और स्त्री रोग विशेषज्ञ की भी उतनी ही जरूरत होगी। डॉक्टरों को केवल मेडिकल कॉलेज में दाखिला देकर तैयार नहीं किया जा सकता। उन्हें एक सुरक्षित कार्यस्थल, सम्मानजनक वातावरण और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था भी देनी होगी। सवाल यह नहीं है कि आज के युवा डॉक्टर सर्जरी, पीडियाट्रिक्स या गायनेकोलॉजी क्यों नहीं चुन रहे हैं। सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसा समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था बना पा रहे हैं जिसमें आने वाली पीढ़ी इन जिम्मेदारियों को गर्व और सुरक्षा के साथ अपना सके?

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