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कणेरी मठ में 5 अगस्त से समृद्ध मातृत्व अभियान

कणेरी मठ में 5 अगस्त से समृद्ध मातृत्व अभियान

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। कोल्हापुर स्थित श्रीक्षेत्र सिद्धगिरी मठ (कणेरी मठ-Kaneri math) की ख्याति, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास एवं जनसेवा के क्षेत्र में अपनी समृद्ध परंपरा के लिए भी है। मठ के सिद्धगिरी हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के अंतर्गत संचालित मातृत्व एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं ने अल्प समय में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित करते हुए अनेक निःसंतान दम्पतियों के जीवन में नई आशा का संचार किया है। इसी अनुभव और सेवा-परंपरा के आधार पर सिद्धगिरी मठ ने ‘समृद्ध मातृत्व अभियान’ के रूप में एक राष्ट्रीय जन-जागरूकता अभियान प्रारंभ किया है। यहां 5 एवं 6 अगस्त को आयोजित इस दो-दिवसीय कार्यक्रम में चिकित्सकों, नीति-निर्माताओं, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बीच व्यापक विचार-विमर्श होगा।

भाग लेने की अपील

मठ की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह जानकारी दी गई है। इस अभियान की राष्ट्रीय संयोजक डॉ. वर्षा वी. पाटील हैं, जो प्रजनन चिकित्सा के क्षेत्र की वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं। अभियान का उद्देश्य भारत में घटती प्रजनन दर, बढ़ती बांझपन की समस्या तथा मातृत्व एवं प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े विविध विषयों पर समाज में जागरूकता उत्पन्न करना और इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करना है। इस अवसर पर कणेरी मठ के परम पूज्य स्वामी अदृश्य काडसिद्धेश्वर महाराज का पावन सान्निध्य एवं आशीर्वचन प्राप्त होगा। सिद्धगिरि मित्र मंडल की विज्ञप्ति में अपील की गई है कि आप भारत के भविष्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनें और घटती प्रजनन दर एवं बढ़ती बांझपन की चुनौती के समाधान हेतु प्रारंभ हुई इस राष्ट्रीय पहल में सहभागी बनकर अपना सहयोग प्रदान करें।

सरकार से उम्मीदें

इस अभियान की सरकार से कुछ उम्मीदें भी हैं जैसे आशा कार्यकर्ताओं के नेटवर्क का बेहतर उपयोग करके लोगों में जागरूकता फैलाना और समय पर जांच के लिए प्रेरित करना, आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) के तहत IUI और IVF जैसे इलाजों को भी शामिल करना और पूरे देश में एक राष्ट्रीय प्रजनन रजिस्टर बनाना, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कितने लोगों का इलाज हो रहा है, ऐसी योजनाएं कितनी सफल हैं और उनकी सही निगरानी व जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। इस समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है, जब केंद्र और राज्य सरकारें बांझपन को एक महत्वपूर्ण जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में स्वीकार करें और उसके लिए स्पष्ट नीति बनाए।

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