आशुतोष कुमार सिंह
नई दिल्ली। बीते 26 अक्टूबर, 2026 को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में शशिप्रभा तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक ‘संगीत धरोहर’ पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। जब मैं पहुँचा तो मंच सज चुका था। चर्चा शुरू हो चुकी थी। मंच पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के विदेश विभाग में संस्कृति निदेशक रह चुके डॉ. चैतन्य प्रकाश जी, दिल्ली विश्वविद्यालय संगीत विभाग से जुड़े तबला वादक डॉ. अजय कुमार, बनारस घराने की संगीतज्ञ डॉ. मीनाक्षी प्रसाद, तानसेन पुरस्कार से सम्मानित पण्डित डालचन्द शर्मा एवं संगीत धरोहर पुस्तक की लेखिका शशिप्रभा तिवारी की मंच पर उपस्थिति से मंच गौरवान्वित हो रहा था। संजय कुमार तिवारी सभी मंचाशिन विद्वानों व कलाधर्मियों का परिचय करा चुके थे। सभी को पुष्पगुच्छ से सम्मानित किया जा चुका था। डॉ. अजय कुमार एवं डॉ. मीनाक्षी बारी—बारी से कभी शशिप्रभा तिवारी से तो कभी पण्डित डालचन्द शर्मा से इस पुस्तक के बारे में बातचीत कर रहे थे। संगीत, संगीत धरोहर, कला विरासत, कलाकार का धर्म, लेखकीय अनुशासन, महिला एवं कला जैसे तमाम विषयों पर गहन चर्चा हुई। एक श्रोता के रिश्तेदार मैं सभी विद्वानों को सुनकर आनंदित होता रहा।
उत्साहित शशिप्रभा तिवारी द्वारा लिखित इस पुस्तक में तानसेन सम्मान से अलंकृत उन विभूतियों से संवाद स्थापित किया गया है, जो इस पुस्तक को लिखे जाने तक जीवित थे। इस पुस्तक का प्रकाशन उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद द्वारा किया गया है। बाबा तानसेन के 525वें जन्म वर्ष एवं तानसेन समारोह के शताब्दी वर्ष के अवसर पर प्रकाशित इस पुस्तक की भूमिका में लेखिका लिखती हैं- “सच तो यह है कि शास्त्रीय संगीत निरंतर शांति, संगति, मौन और गहराई की अपनी परंपरा सजीव मायने रखती है, हमें अपनी परंपरा की जीवन्तता का अग्रदूत करवाता है। दशकों से पश्चिमी संगीत और सिनेमा का लोकप्रिय संगीत, इसकी अस्मिता के लिए चुनौती प्रस्तुत करते हैं। पर शाश्वत सत्य के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। संगीत अपने सनातन, पुरातन एवं अधुनातन रूप में चिरकाल तक कायम रहेगा, यह आशा सदियों से हर कलाकार करता रहा है।”
शशि जी की भूमिका के ये शब्द यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि वे संगीत एवं कला को कितनी गहराई से समझते हैं। इसी समझ का नतीजा है कि वे इस पुस्तक के लिए पण्डित कृष्णराव शंकर पण्डित, सुलोचना बृहस्पति, विदुषी गिरिजा देवी, उस्ताद अमजद अली खां, पण्डित शिव कुमार शर्मा, पंडित गोस्वामी गोकुलोत्सव महाराज, पण्डित अजय पोहनकर, विदुषी सविता देवी, पण्डित राजन मिश्र व पंडित साजन मिश्र, पण्डित प्रभाकर कारेकर, पण्डित विश्वमोहन भट्ट, पण्डित अजय चक्रवर्ती, पण्डित लक्ष्मण कृष्णराव पण्डित, पंडित डालचन्द शर्मा, पण्डित उल्हास कशालकर, विदुषी मंजू मेहता, डॉ. विद्याधर व्यास, पण्डित सतीश व्यास, पण्डित नित्यानंद हल्दीपुर और पण्डित गणपति भट्ट हसगणि जैसे महान विभूतियों की अनुभूति को कलमबद्ध कर पाईं।
एक पुस्तक में संगीत की दुनिया के लम्बे धरोहर कलाकारों से साक्षात्कार अपने आप में एक दुर्लभ कार्य है। इस दुष्कर कार्य को पत्रकार, कवियत्री लेखिका व कला समीक्षक शशिप्रभा तिवारी जैसी कर्मठ एवं अनुशासित व्यक्तित्व के धनी कला मर्मज्ञ ही कर सकता था।
खैर, इन सबके बीच में मेरे लिए सबसे आनंदमय विषय डॉ. चैतन्य प्रकाश जी से मुलाकात रही।<extra_id_1> 15 साल बाद उनसे मिलीं हुआ। डॉ. चैतन्य प्रकाश जी के कारण ही मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में आ पाया। अंत में, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, जहां पर देश की राजनीति एवं समाज नीति के चर्चा आमतौर पर होती है, उस शाम देश के संगीत कला-संस्कृति पर चर्चा का होना अपने आप में एक अनूठा प्रयोग है। ऐसे प्रयोग प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली को करते रहना चाहिए।
(स्वतंत्र लेखक व पत्रकार)
