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भारत में वायु प्रदूषण: विश्व बैंक की रिपोर्ट और भविष्य की रणनीतियाँ

भारत में वायु प्रदूषण: विश्व बैंक की रिपोर्ट और भविष्य की रणनीतियाँ

धीप्रज्ञ द्विवेदी

नयी दिल्ली। विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट, ‘ए ब्रीथ ऑफ चेंज: सॉल्यूशंस फॉर क्लीनर एयर इन साउथ एशिया’, भारत में वायु प्रदूषण (Air pollution) को एक सामान्य पर्यावरणीय समस्या के बजाय एक गंभीर ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक आपातकाल’ के रूप में प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत का सिंधु-गंगा का मैदान और हिमालयी तलहटी क्षेत्र वर्तमान में दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में शुमार हैं, जहाँ हवा की गुणवत्ता वैश्विक स्वास्थ्य मानकों से कई गुना खराब है। यह संकट केवल सांसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की जीवन प्रत्याशा और मानवीय क्षमता पर सीधा प्रहार कर रहा है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि सूक्ष्म कणों (PM_{2.5}) के निरंतर संपर्क में रहने के कारण उत्तर भारत के निवासियों की औसत आयु में 3.5 से 5 वर्ष की कमी आ रही है। इसके अतिरिक्त, दक्षिण एशिया में हर साल लगभग दस लाख लोग वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों जैसे हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर के कारण अकाल मृत्यु का शिकार हो रहे हैं, जो एक बड़ी मानवीय त्रासदी है।

वायु प्रदूषण: 10% का नुकसान

आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो वायु प्रदूषण भारत के ‘5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था’ के लक्ष्य की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभरा है। विश्व बैंक के विश्लेषण के अनुसार, प्रदूषण के कारण होने वाले स्वास्थ्य खर्च, समय से पहले होने वाली मौतों और श्रम उत्पादकता में गिरावट की वजह से भारत को अपनी वार्षिक जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ रहा है। यह नुकसान केवल औद्योगिक शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र पर भी इसका गहरा असर पड़ रहा है, जहरीली धुंध सूरज की रोशनी को बाधित कर रही है, जिससे प्रमुख फसलों की पैदावार में 5 से 8 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि, रिपोर्ट एक उम्मीद की किरण भी दिखाती है कि यदि भारत वायु गुणवत्ता मानकों में सुधार करता है, तो स्वास्थ्य खर्च की बचत और कार्यबल की बढ़ी हुई उत्पादकता के माध्यम से जीडीपी विकास दर में 1.5 प्रतिशत तक की अतिरिक्त वृद्धि संभव है।

वायु प्रदूषण: एकीकृत रणनीति की जरूरत

इस जटिल समस्या के समाधान के रूप में विश्व बैंक ने ‘एयरशेड’ (Airshed) दृष्टिकोण को अपनाने की अनिवार्य सिफारिश की है। रिपोर्ट तर्क देती है कि वायु प्रदूषण राजनीतिक सीमाओं या राज्यों के नक्शों का पालन नहीं करता। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के वायु प्रदूषण का आधे से अधिक हिस्सा उन स्रोतों से आता है जो शहर की सीमा के बाहर स्थित हैं, जैसे पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना या औद्योगिक धुआं। अतः, ‘शहर-विशिष्ट’ योजनाएं अब पर्याप्त नहीं हैं। इसके बजाय, पूरे उत्तर भारत को एक साझा ‘एयरशेड’ मानकर एक एकीकृत क्षेत्रीय रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य मिलकर काम करें। विश्व बैंक ने इस दिशा में ‘4-I’ मॉडल—सूचना (Information), प्रोत्साहन (Incentives), संस्थान (Institutions) और बुनियादी ढांचा (Infrastructure)—का सुझाव दिया है, ताकि डेटा-आधारित नीतियों और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से प्रदूषण को कम किया जा सके।

वायु प्रदूषण: NCAP के लक्ष्यों में संशोधन

भारत सरकार ने भी इन वैश्विक सिफारिशों को गंभीरता से लेते हुए अपने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के लक्ष्यों को संशोधित किया है। अब सरकार का लक्ष्य 2026-27 तक प्रमुख प्रदूषित शहरों में कण प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक कम करना है। इसके लिए ‘प्राण’ (PRANA) पोर्टल के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाई गई है और 15वें वित्त आयोग के तहत नगर पालिकाओं के फंड को ‘वायु गुणवत्ता सुधार’ के प्रदर्शन से जोड़ दिया गया है। साथ ही, विश्व बैंक ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों के लिए 600 मिलियन डॉलर की विशेष सहायता मंजूर की है ताकि स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन और इलेक्ट्रिक परिवहन के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा सके। निष्कर्षतः, वायु प्रदूषण के विरुद्ध यह युद्ध अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य की स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता का सवाल है। यदि एयरशेड आधारित सामूहिक प्रयासों को सख्ती से लागू किया जाता है, तो भारत आने वाले दशक में एक स्वच्छ और समृद्ध राष्ट्र बनने की ओर सफलतापूर्वक कदम बढ़ा सकेगा।

(लेखक पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।)

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