धीप्रज्ञ द्विवेदी
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence-AI) मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे परिवर्तनकारी तकनीकों में गिनी जा रही है। चिकित्सा में रोगों की पहचान से लेकर कृषि में मौसम पूर्वानुमान, शिक्षा में व्यक्तिगत शिक्षण और उद्योगों में स्वचालन तक AI ने विकास की नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। लेकिन जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ प्रदूषण और जलवायु संकट को जन्म दिया था, उसी प्रकार AI क्रांति भी अपने साथ एक ऐसी पर्यावरणीय लागत लेकर आ रही है, जिस पर अभी अपेक्षाकृत कम चर्चा हो रही है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की हालिया रिपोर्टें चेतावनी देती हैं कि AI के विस्तार के साथ ऊर्जा, जल, भूमि और खनिज संसाधनों की मांग अभूतपूर्व गति से बढ़ रही है। यदि इस विकास को टिकाऊ दिशा नहीं दी गई, तो AI जलवायु परिवर्तन और संसाधन संकट को और गहरा कर सकती है।
AI डेटा सेंटरों का फैलता साम्राज्य
जब कोई व्यक्ति किसी AI चैटबॉट से प्रश्न पूछता है, कोई चित्र बनाता है, वीडियो तैयार करता है या भाषा अनुवाद कराता है, तब उसके पीछे हजारों सर्वरों से युक्त विशाल डेटा सेंटर काम कर रहे होते हैं। ये डेटा सेंटर आधुनिक युग के कारखाने हैं, जहाँ कच्चे माल के स्थान पर डेटा और ऊर्जा का उपयोग होता है। IEA के अनुसार 2024 में दुनिया के डेटा सेंटर लगभग 415 टेरावाट-घंटे (TWh) बिजली की खपत कर रहे थे, जो वैश्विक विद्युत खपत का लगभग 1.5 प्रतिशत है। किंतु AI के तीव्र विस्तार के कारण यह खपत 2030 तक बढ़कर 945 TWh तक पहुँच सकती है, अर्थात मात्र छह वर्षों में लगभग दोगुनी से भी अधिक। यह जापान जैसे विकसित देश की वर्तमान वार्षिक बिजली खपत के बराबर है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में AI डेटा सेंटरों की बिजली आवश्यकता कई देशों की कुल विद्युत मांग के बराबर हो सकती है। अमेरिका, यूरोप और एशिया के अनेक क्षेत्रों में विद्युत ग्रिड पहले से ही इस बढ़ती मांग को लेकर चिंतित हैं। हाल के महीनों में अमेरिका के टेक्सास और एरिज़ोना जैसे राज्यों में नियामक संस्थाओं को विशेष नीतियाँ बनानी पड़ी हैं ताकि AI डेटा सेंटरों की बढ़ती बिजली मांग से ग्रिड पर अत्यधिक दबाव न पड़े।
पानी भी निगल रहा है AI
अधिकांश लोग यह मानते हैं कि AI की पर्यावरणीय समस्या केवल बिजली की खपत है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है। डेटा सेंटरों में लगे सर्वर लगातार गर्मी उत्पन्न करते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए विशाल शीतलन प्रणालियों की आवश्यकता होती है, जिनमें बड़ी मात्रा में पानी खर्च होता है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक AI से संबंधित जल उपयोग इतना बढ़ सकता है कि उससे 1.3 अरब लोगों की वार्षिक घरेलू जल आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं। यह विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि दुनिया पहले से ही जल संकट का सामना कर रही है। भारत, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। ऐसे में यदि AI उद्योग की जल मांग अनियंत्रित रूप से बढ़ती है, तो स्थानीय समुदायों और उद्योगों के बीच जल संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
भूमि और खनिज संसाधनों पर बढ़ता दबाव
AI का प्रभाव केवल बिजली और पानी तक सीमित नहीं है। डेटा सेंटरों के निर्माण, बिजली उत्पादन और अत्याधुनिक चिप निर्माण के लिए विशाल भूमि और दुर्लभ खनिजों की आवश्यकता होती है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2030 तक AI का भूमि पदचिह्न 14,500 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो सकता है, जो कई महानगरों के संयुक्त क्षेत्रफल के बराबर है। इसके अतिरिक्त AI चिप्स के निर्माण में लिथियम, कोबाल्ट, निकल, तांबा और दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements) का उपयोग किया जाता है। इन खनिजों के खनन से वनों की कटाई, मिट्टी का क्षरण, जल प्रदूषण और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
AI का सबसे बड़ा पर्यावरणीय बोझ
आमतौर पर यह माना जाता है कि AI मॉडल को प्रशिक्षित (Training) करने में सबसे अधिक ऊर्जा खर्च होती है। किंतु नवीन अध्ययनों से पता चलता है कि समस्या केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। आज करोड़ों लोग प्रतिदिन AI से प्रश्न पूछ रहे हैं, चित्र बना रहे हैं, वीडियो तैयार कर रहे हैं और विभिन्न डिजिटल सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं। इस प्रक्रिया को “इन्फरेंस” (Inference) कहा जाता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि AI की कुल ऊर्जा खपत का अधिकांश हिस्सा इसी दैनिक उपयोग से आता है। यानी AI का पर्यावरणीय प्रभाव केवल बड़ी टेक कंपनियों तक सीमित नहीं है; इसका संबंध हम सभी के दैनिक डिजिटल व्यवहार से भी है।
ई-कचरे का बढ़ता पहाड़
AI क्रांति का एक और कम चर्चित पक्ष है—इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste)। नए AI मॉडल अधिक शक्तिशाली प्रोसेसर और GPU की मांग करते हैं। परिणामस्वरूप पुराने सर्वर और उपकरण अपेक्षाकृत जल्दी अप्रचलित हो जाते हैं। इससे ई-कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। यदि इन उपकरणों का सुरक्षित पुनर्चक्रण नहीं किया गया तो इनमें मौजूद सीसा, पारा और अन्य विषैले पदार्थ मिट्टी और जल को प्रदूषित कर सकते हैं।
क्या तकनीक स्वयं समाधान भी दे सकती है?
सौभाग्य से तकनीकी जगत इस चुनौती को समझ रहा है और अनेक अभिनव प्रयोग किए जा रहे हैं। सबसे चर्चित प्रयासों में से एक था माइक्रोसॉफ्ट का Project Natick। इस परियोजना के अंतर्गत कंपनी ने समुद्र के भीतर डेटा सेंटर स्थापित करने का प्रयोग किया। विचार यह था कि समुद्र का ठंडा पानी सर्वरों को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखेगा, जिससे ऊर्जा और पानी की खपत कम होगी। परियोजना के परिणामों ने यह दिखाया कि पानी के भीतर स्थित सर्वरों में खराबी की दर भूमि पर स्थित सर्वरों की तुलना में काफी कम थी तथा शीतलन की दक्षता भी बेहतर रही। यद्यपि माइक्रोसॉफ्ट ने बाद में इस परियोजना को व्यावसायिक स्तर पर आगे नहीं बढ़ाया, फिर भी इसने दुनिया को यह दिखाया कि डेटा सेंटरों को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए पारंपरिक सोच से हटकर समाधान खोजे जा सकते हैं।
इसी प्रकार कई कंपनियाँ अब निम्नलिखित उपाय अपना रही हैं—
– नवीकरणीय ऊर्जा (सौर एवं पवन) आधारित डेटा सेंटर।
– जल-मुक्त या कम-जल शीतलन प्रणालियाँ।
– AI की सहायता से डेटा सेंटरों की ऊर्जा दक्षता बढ़ाना।
– अपशिष्ट ऊष्मा (Waste Heat) का पुनः उपयोग।
– कम ऊर्जा खपत वाले AI मॉडल विकसित करना।
– चिप निर्माण और सर्वर उत्पादन में पुनर्चक्रित सामग्री का उपयोग।
कुछ कंपनियाँ रेगिस्तानी और जल-संकट वाले क्षेत्रों में पारंपरिक जल-आधारित शीतलन के स्थान पर वायु-आधारित शीतलन प्रणालियाँ भी विकसित कर रही हैं।
AI: समस्या भी, समाधान भी
विडंबना यह है कि AI स्वयं जलवायु संकट के समाधान का भी एक महत्वपूर्ण उपकरण बन सकती है। AI का उपयोग मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, ऊर्जा दक्षता, स्मार्ट ग्रिड, जैव विविधता संरक्षण और कृषि उत्पादकता बढ़ाने में किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का मानना है कि यदि AI का उपयोग ऊर्जा प्रणालियों के अनुकूलन, विद्युत वितरण और अक्षय ऊर्जा प्रबंधन में किया जाए, तो यह स्वयं अपने पर्यावरणीय प्रभाव का एक हिस्सा कम करने में मदद कर सकती है।
निष्कर्ष: बुद्धिमत्ता तभी सार्थक है जब वह टिकाऊ हो
कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव इतिहास की सबसे शक्तिशाली तकनीकों में से एक है। किंतु यदि इसकी सफलता केवल गणनात्मक शक्ति और आर्थिक लाभ से मापी जाएगी, तो हम भविष्य में एक नए पर्यावरणीय संकट का सामना कर सकते हैं। वास्तविक चुनौती AI को रोकना नहीं, बल्कि उसे जिम्मेदार और टिकाऊ बनाना है। जिस प्रकार 20वीं सदी ने हमें औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता सिखाई थी, उसी प्रकार 21वीं सदी हमें “हरित कृत्रिम बुद्धिमत्ता” (Green AI) का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है। भविष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल अधिक बुद्धिमान मशीनें बनाना नहीं होगी, बल्कि ऐसी तकनीक विकसित करना होगी जो पृथ्वी के सीमित संसाधनों का सम्मान करते हुए मानवता के विकास को आगे बढ़ाए। आखिरकार, सच्ची बुद्धिमत्ता वही है जो प्रगति और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
