नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। जनजातीय कल्याण को बढ़ावा देने, स्थायी आजीविका को प्रोत्साहित करने और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत जनजातीय मामलों के मंत्रालय (MOTA) ने सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NBRI), लखनऊ के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस तीन वर्षीय साझेदारी का प्राथमिक उद्देश्य भारत भर में जनजातीय जैव संसाधनों के संरक्षण और नृजातीय वनस्पति विज्ञान संबंधी मूल्यांकन के लिए अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने हेतु दोनों संगठनों के बीच एक सतत, सहक्रियात्मक संबंध स्थापित करना है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव मनीष ठाकुर और सीएसआईआर के निदेशक डॉ. अजीत कुमार शसानी ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय की सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा की उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर सीएसआईआर के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. शरद श्रीवास्तव, सीएसआईआर के वैज्ञानिक डॉ. सचित्र रथा, डॉ. मनीष भोयर और जनजातीय मामलों के मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।
बीज बैंकों का विकास भी
इस समझौते के तहत, जनजातीय कल्याण और सामुदायिक संप्रभुता सभी वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए मूलभूत सिद्धांत के रूप में कार्य करते हैं। यह साझेदारी दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधों (Medicinal plant0 की प्रजातियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान केंद्रित करती है जिसमें ऊतक संवर्धन सुविधाओं और विशेष बीज बैंकों का विकास शामिल है। दीर्घकालिक, समुदाय-प्रबंधित स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए, स्थानीय जनजातीय युवाओं को इन प्रसार और संरक्षण तकनीकों में व्यावहारिक क्षमता निर्माण और तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त होगा। इसके अलावा, सभी क्षेत्र मूल्यांकन और अनुसंधान गतिविधियों के लिए स्थानीय ग्राम सभाओं और जनजातीय समुदायों की पूर्व-सूचित सहमति (PIC) अनिवार्य होगी, जो जैव विविधता अधिनियम, 2002 का पूर्ण अनुपालन है। प्रत्येक संयुक्त परियोजना प्रस्ताव में जमीनी स्तर पर सामुदायिक विकास, स्थानीय मूल्यवर्धन और क्षमता निर्माण के लिए एक समर्पित बजट मद शामिल होगा। स्थानीय हितों की रक्षा के लिए, उत्पन्न किसी भी बौद्धिक संपदा का स्वामित्व संयुक्त रूप से एमओटीए और सीएसआईआर-एनबीआरआई के पास होगा, जिसे योगदान देने वाले जनजातीय समुदायों के लिए न्यास में रखा जाएगा या उनके साथ समान रूप से साझा किया जाएगा, और वित्तीय लाभ राष्ट्रीय या राज्य जैव विविधता कोष और एमओटीए की समर्पित कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से वापस दिया जाएगा। यह समझौता स्पष्ट रूप से पारंपरिक ज्ञान को जनजातीय लोगों की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता देता है, और अनधिकृत व्यावसायीकरण को रोकने के लिए राष्ट्रीय पहुंच और लाभ साझाकरण तंत्रों का कड़ाई से अनुपालन अनिवार्य करता है।
परंपरागत ज्ञान—विज्ञान के बीच सेतु
पारंपरिक चिकित्सकों और वैज्ञानिकों को शामिल करते हुए संयुक्त विषयगत कार्यक्रमों, संगोष्ठी और सतत आदान-प्रदान कार्यक्रमों के माध्यम से, एमओटीए का उद्देश्य आदिवासी समुदाय के ज्ञान को अत्याधुनिक वनस्पति विज्ञान से जोड़ना है। आदिवासी युवाओं को सशक्त बनाकर और स्थानीय क्षमता को मजबूत करके, यह गठबंधन सुनिश्चित करता है कि जैव संसाधन संरक्षण सीधे तौर पर सतत सामुदायिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण में परिणत हो।
