डॉ. हर्षवर्धन
नयी दिल्ली। भारत में चिकित्सा विज्ञान का इतिहास अनेक महान वैज्ञानिकों की तपस्या और योगदान से भरा हुआ है। इन्हीं में एक नाम है, डॉ. वसंत रामजी खानोलकर, जिन्हें उचित रूप से “भारतीय रोग विज्ञान (Pathology) और चिकित्सा अनुसंधान के जनक” कहा जाता है। उनकी शोध यात्रा ने न केवल भारतीय चिकित्सा क्षेत्र को नई दिशा दी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुसंधान की ठोस नींव भी रखी।
1901 में गोवा में जन्मे डॉ. खानोलकर ने बचपन से ही ज्ञान की खोज को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर इंग्लैंड में जाकर पैथोलॉजी में विशेषज्ञता हासिल की। देश लौटकर उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान को भारतीय दृष्टिकोण से विकसित करने की दिशा में कार्य प्रारंभ किया। उस समय जब भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए संसाधन और अवसर सीमित थे, डॉ. खानोलकर ने अपने अदम्य संकल्प और दृष्टि से चिकित्सा अनुसंधान की नई परंपरा स्थापित की।
उन्होंने कैंसर रिसर्च, ब्लड डिज़ीज़, लीवर डिसऑर्डर्स और ट्रॉपिकल डिज़ीज़ेस पर गहन अध्ययन किया। मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल और इंडियन कैंसर रिसर्च सेंटर (अब ACTREC) की स्थापना में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। यही संस्थान आज भारत में कैंसर अनुसंधान और उपचार के प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता है।
डॉ. खानोलकर ने यह सिद्ध किया कि चिकित्सा केवल उपचार का विज्ञान नहीं, बल्कि जीवन के रहस्यों को समझने की कला भी है। उन्होंने भारतीयों में पाए जाने वाले रोगों की विशेषताओं पर विस्तृत अध्ययन किया और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार चिकित्सा प्रणाली के विकास पर बल दिया। उनके कार्य ने “Indian School of Pathology” की अवधारणा को आकार दिया, एक ऐसा दृष्टिकोण जो पश्चिमी चिकित्सा को भारतीय यथार्थ के अनुरूप बनाने का प्रयास करता था।
उनकी वैज्ञानिक दृष्टि के साथ-साथ उनका मानवीय दृष्टिकोण भी उतना ही प्रेरक था। वे मानते थे कि “रोग का अध्ययन केवल शरीर के भीतर नहीं, समाज के भीतर भी किया जाना चाहिए।” उन्होंने सामाजिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और सार्वजनिक चिकित्सा शिक्षा के प्रसार पर भी बल दिया।
उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1955 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। उनकी स्थापित संस्थाएँ और विचार आज भी भारत के चिकित्सा जगत के स्तंभ हैं।
उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देते हुए हम सब उनके प्रति कृतज्ञ हैं, उस महान वैज्ञानिक के प्रति जिसने भारत में चिकित्सा अनुसंधान को आत्मनिर्भरता और स्वदेशी दृष्टि दी।
