नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। काफी प्रयासों के बावजूद बच्चों में कुपोषण की समस्या दूर नहीं हो रही है। एक रिपोर्ट बताती है कि एक ओर लाखों बच्चे पर्याप्त पोषण न मिलने के कारण कमजोर और दुबले रह जाते हैं तो दूसरी ओर छोटी उम्र में ही बढ़ता मोटापा बच्चों की सेहत के लिए नया खतरा बनकर उभर रहा है। क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, हैदराबाद से जुड़े शोधकर्ताओं के एक साझा अध्ययन (Study) में यह बात सामने आई है। यह स्टडी जर्नल द लैंसेट रीजनल हेल्थ-साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुए हैं। खास बात यह कि दोनों तरह के बच्चे स्लम इलाकों के हैं।
स्टडी: स्लम के बच्चों पर अध्ययन
स्टडी के मुताबिक भारतीय बच्चों पर कुपोषण और मोटापे की यह ‘दोहरी मार’ ठीक उस उम्र में हमला करती है जब वे स्कूल जाना शुरू करते हैं, यानी 5 से 9 साल के बीच। अपनी इस स्टडी में शोधकर्ताओं ने जन्म से लेकर नौ वर्ष की आयु तक स्लम के 251 बच्चों का अध्ययन किया है। इस अध्ययन में पाया गया कि पांच साल की उम्र के बाद बच्चों में कुपोषण का ‘दोहरा बोझ’ साफ दिखाई देने लगता है। यानी एक ही समुदाय में कुछ बच्चे कुपोषण और दुबलेपन की समस्या से जूझ रहे हैं, जबकि दूसरे बच्चे बढ़ते वजन और मोटापे का शिकार हो रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दो साल की उम्र तक करीब 45 फीसद बच्चों की लम्बाई उम्र के हिसाब से पर्याप्त ऊंची नहीं हुई थी। मतलब कि बचपन शुरू होने से पहले ही उनका विकास थम गया। इसी तरह सात साल की उम्र में 26.3 फीसद बच्चे बेहद कमजोर या दुबले पाए गए, जबकि 5.2 फीसद बच्चों में मोटापा पैर पसार चुका था। नौ साल की उम्र तक स्थिति और चिंताजनक हो गई। इस उम्र तक 21.6 फीसद बच्चे अब भी कमजोर थे। वहीं मोटापे और अत्यधिक वजन से जूझने वाले बच्चों का आंकड़ा तीन गुणा बढ़कर 14.6 फीसद पर पहुंच गया।
स्टडी: फोकस सिर्फ हजार दिनों तक
इस स्टडी ने मां की सेहत को भी रेखांकित किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों में आगे चलकर दुबले रहने की संभावना अधिक रहती है। वहीं मां का स्वास्थ्य भी बच्चों के भविष्य को गहराई से प्रभावित करता है। जिन बच्चों की माएं स्वयं कमजोर थीं, उन बच्चों के बड़े होने पर भी कमजोर और बीमार रहने की आशंका सबसे ज्यादा थी। स्पष्ट है कि एक कमजोर मां चाहकर भी अपने बच्चे को एक स्वस्थ कल नहीं दे पाती। यह चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। अब तक सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं का पूरा ध्यान बच्चे के जन्म के शुरुआती 1,000 दिनों (गर्भावस्था से लेकर 2 साल तक) पर रहता था। लेकिन यह रिसर्च स्पष्ट करती है कि सिर्फ इतना काफी नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों के पोषण को केवल जीवन के शुरुआती 1,000 दिनों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। स्वस्थ बचपन सुनिश्चित करने के लिए गर्भावस्था से लेकर किशोरावस्था तक लगातार पोषण सहायता, वृद्धि की निगरानी और स्वस्थ खानपान को बढ़ावा देना जरूरी है।
स्टडी: नौ साल तक मोटापे का खतरा
यह अध्ययन चेतावनी देता है कि भारत अब केवल भूख और कुपोषण से नहीं जूझ रहा, बल्कि मोटापे की बढ़ती चुनौती का भी सामना कर रहा है। यदि समय रहते पर्याप्त कदम न उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां कुपोषण और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के दोहरे संकट में फंस सकती हैं। अगर देश के भविष्य को स्वस्थ और मजबूत बनाना है, तो शुरुआत गर्भवती महिलाओं और बच्चियों के पोषण से करनी होगी। साथ ही, तेजी से फैल रहे जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर भी रोक लगानी होगी। विडंबना यह है कि स्लम और कमजोर बस्तियों में जहां कभी भूख और कुपोषण सबसे बड़ी चुनौती थी, वहीं अब सस्ते और अनहेल्दी भोजन के कारण मोटापा भी तेजी से पांव पसार रहा है। यह बच्चों को पोषण देने के बजाय मोटापे की बीमारी दे रहा है।
स्टडी: जलवायु का भी असर
इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए एक अन्य अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारत के जलवायु संवेदनशील जिलों में बच्चों के कुपोषित होने का खतरा अन्य जिलों की तुलना में 25 फीसद अधिक है। इन जिलों में महिलाओं के घर पर प्रसव और बच्चों के ठिगने होने की आशंका भी अधिक है। मतलब कि जलवायु संकट का सीधा असर मां और शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। अध्ययन के मुताबिक उच्च जोखिम वाले जिलों में महिलाओं के घर पर प्रसव होने की आशंका 38 फीसद अधिक है। इसके अलावा बच्चों के ठिगने होने की आशंका 14 फीसद अधिक दर्ज की गई। इसी तरह जिन जिलों में जलवायु जोखिम अधिक है वहां बच्चों में ऊंचाई के अनुपात में कम वजन होने की आशंका छह फीसद अधिक दर्ज की गई। यह महज एक वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य की सेहत का एक चेतावनी भरा आईना भी है। यह दिखाता है कि हमारे बच्चे एक साथ कुपोषण और मोटापे जैसी दोहरी मार झेल रहे हैं।
