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गुरुदत्त का साहित्य बतायेगा कि असली कथा सम्राट कौन : प्रो. हरीश अरोड़ा

पार्थ सारथी थपलियाल

नयी दिल्ली। आज से ठीक 128 साल पहले 8 दिसंबर 1894 को तत्कालीन भारत के लाहौर शहर में एक सामान्य आर्य समाजी परिवार में जन्मे गुरु दत्त जिनका बाल्यकाल का नाम गुरुदास था, बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। संसाधनों के अभाव होते भी उन्होंने औपचारिक शिक्षा एमएससी तक प्राप्त की लेकिन आजीविका के लिए आयुर्वेद चिकित्सा को आधार बनाया, लक्ष्य बनाया राष्ट्रवाद और अभिरुचि साहित्यिक लेखन। वे लाला लाजपतराय के साथी थे। वैद्य गुरुदत्त जी ने लगभग 200 उपन्यास, अनेक जीवन चरित्र और कहानियां लिखकर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।

गुरु दत्त का योगदान पर संगोष्ठी

ऐसे महान लेखक की स्मृति में से सभ्यता अध्ययन केंद्र, पीजी डीएवी कॉलेज (सांध्य) और भारतीय धरोहर ने दिल्ली में नेहरू नगर स्थित कॉलेज के सभागार में ‘भारत के बौद्धिक संघर्ष में वैद्य गुरु दत्त का योगदान’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी के सहभागी थे-प्रो. हरीश अरोड़ा, वरिष्ठ साहित्यकार राजीव रंजन प्रसाद और जेएनयू में राष्ट्रीय भाषा केंद्र के डॉ. मलखान सिंह। विशिष्ट अतिथि थे-वैद्य गुरु दत्त जी के सुपौत्र ईशान दत्त और संगोष्ठी को सानिध्य मिला प्रो. आर के गुप्ता का।

कितना नहीं, क्या लिखा का महत्व

साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों और राष्ट्रीय विचारधारा के पोषक व्यक्तियों से भरे सभागार में अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर स्व. वैद्य गुरु दत्त के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। अतिथियों का स्वागत किया कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर रवीन्द्र कुमार गुप्ता ने। उन्होंने वैद्य गुरु दत्त जी के कृतित्व का विशेष स्मरण किया और मुख्य अतिथि ईशान शर्मा को अपने मध्य गुरु दत्त जी के अंश के रूप में व्यक्त किया। उन्होंने कहा- किसी व्यक्ति ने कितना लिखा से अधिक महत्व इस बात का होता है कि क्या लिखा। वैद्य गुरु दत्त जी ने 200 उपन्यास लिखे और लगभग सौ कहानियां भी जिनमें देश-समाज के लिए बहुत कुछ ऐसा लिखा जो आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना उनके जीवन काल में था।

भारत और भारतीयता उनका प्रबल पक्ष

सभ्यता अध्ययन केंद्र के निदेशक श्री रविशंकर ने कहा कि वैद्य गुरु दत्त जी का 95 वर्षीय जीवन काल वैचारिक संघर्षों के दौर था। देश मे अनेक उथल-पुथल चल रही थी लेकिन वैद्य जी, जो स्वराज आंदोलन में थे, ने सत्य को अंगीकार किया। उनके जीवन का प्रबल पक्ष उनका वैचारिक अधिष्ठान-भारत और भारतीयता थी। रविशंकर जी ने वैद्य गुरु दत्त के साहित्य का उल्लेख करते हुए बताया कि उनकी कहानी ‘दो लहरों की टक्कर’ में दो विचारों का संघर्ष था जो एक ओर अंग्रेजों का औपनिवेशिकवाद था तो दूसरी ओर भारत में स्वराज और राष्ट्रप्रेम की विचार धारा।

गुरु दत्त के सम्पूर्ण साहित्य के प्रकाशन की योजना

वैद्य गुरु दत्त जी के सुपौत्र ईशान दत्त ने अपने दादा जी को स्मरण किया। उन्होंने कहा- -वैद्य गुरु दत्त जी ने मेरे पिताजी को कहा कि ईशान को मेरा पेन दे दो। इस वाक्य का मेरे मन पर जो असर पड़ा वह आज तक प्रज्ज्वलित है। वे डीएवी स्कूल लाहौर में हेड मास्टर थे। बाद में वे अमेठी आ गए। उन्होंने आयुर्वेद का अध्ययन किया। साथ-साथ लेखन शुरू किया। हम प्रयास कर रहे हैं कि वैद्य गुरु दत्त जी के सम्पूर्ण साहित्य को प्रकाशित करें। अब तक हम 190 पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं।

वाम मार्ग की परतें खोली गुरु दत्त ने

मुख्य वक्ता प्रोफेसर डॉ. मलखान सिंह ने कहा कि इस देश मे अधिकतर साहित्यकार पश्चिमी विचार के रंग में रंग गए। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हम भारत को भारतीयता के मार्ग पर नहीं ले जा सके। गुरु दत्त जी का साहित्य व्याख्यायित करता है कि वाम मार्ग किस विचार व मार्ग पर चल रहा है? क्या उल्लास और उमंग के साथ भारतीय समरसता को हम आगे बढ़ा सकें हैं। हमें विद्या चाहिए या शिक्षा चाहिए? उनका चिंतन सामाजिक था जो नैतिक मूल्यों पर प्रखरता से अपनी बात साहित्य में व्यक्त करते है। महिला का सशक्त होना अच्छी बात है लेकिन असभ्य होना सशक्त होने की बजाय समाज में विद्रूपता को प्रकट करता है।

भारत को जानने का साधन है उनका साहित्य

प्रोफेसर हरीश अरोड़ा ने प्रश्न किया क्या कि जो साहित्य हम वर्तमान में पढ़ रहे है वह हमारे समाज का सही दर्पण है? आपातकाल में जब संघ पर प्रतिबंध लगा तब भी हम इसी महाविद्यालय के परिसर में राजहिताय विचारों पर आधारित गोष्ठियां आयोजित करते थे। ऐसे भी लोग विश्वविद्यालयों में है जो वैद्य गुरु दत्त जी को गंभीरता से स्वीकार नही करते। विज्ञान व समाज के विविध पहलुओं को गुरु दत्त जी ने चिंतन की परम्परा से आगे बढ़ाया। विश्वविद्यालयों में ऐसे लोगों का वर्चस्व बना रहा जिहोने वैद्य गुरु दत्त जैसे साहित्यकारों को पाठ्यक्रम में आने ही नही दिया। अगर हमें भारत और भारतीयता को आगे बढ़ाना है तो उस साहित्य को पढ़ें जिससे हमें भारत को जानने का अवसर मिलेगा।

राष्ट्रीय पटल से गायब कर दिये गये गुरु दत्त

डॉ. राजीव रंजन ने कहा कि 1960 और 70 के दशक में वैद्य गुरुदत्त साहित्यिक चर्चाओं में जीवित थे। उसके बाद वे राष्ट्रीय पटल से कैसे गायब हो गए? 1941 में उनका पहला उपन्यास ‘स्वाधीनता के पथ पर’ आया। क्या यह राष्ट्रवाद का प्रमाण नही है? आज़ादी के द्वंद का पूरा समय उनके रचना संसार का वह महत्वपूर्ण भाग है जो उस धारा को पसंद नही आया, जो भारतीयता को व्यक्त करता है। हम उन्ही लोगों का साहित्य पढ़ते रहे हैं जिन्होंने भारतीय संस्कृति को विकृत करने के तमाम हथकंडे अपनाए।

भारतीय ज्ञान सर्वत्र व्याप्त

संगोष्ठी के अध्यक्ष विजय शंकर तिवारी ने कहा कि पश्चिम में विज्ञान का उपयोग वही कर सकता है जिसके पास पैसा है। भारतीय ज्ञान सर्वत्र है, हर कोई इसे प्राप्त कर सकता है। हमें वैद्य गुरु दत्त के साहित्य को पढ़ना चाहिए।

गुरु दत्त के नाम से चले पुरस्कार

अंत मे आभार व्यक्त किया भारतीय धरोहर के प्रवीण शर्मा ने। उन्होंने कहा कि संघ के कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए हर कार्यकर्ता वैद्य गुरु दत्त के साहित्य से प्रेरणा लेता रहा है। आज का युवा इस मशाल को आगे बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा कि वैद्य गुरु दत्त के नाम पर कोई पुरस्कार शुरू किया जाय।

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