नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। यू—ट्यूब के The thermometer के 8वें एपिसोड में के आंख संबंधी रोगों के जाने माने विशेषज्ञ डॉक्टर नीतू गगनेजा के साथ स्वस्थ भारत मीडिया के समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह से लंबी बातचीत हुई। प्रस्तुत है उनसे बातचीत का पहला हिस्सा जिसमें उन्होंने आंखों की देखभाल के बारे में विस्तार से बताया है।
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आशुतोष: आजकल छोटे-छोटे बच्चों की आंखों में चश्मे हैं। ये कैसी स्थिति है?
डॉ. नीतू: यह बहुत ही गंभीर समस्या है। इसका सबसे बड़ा कारण है मोबाइल क्योंकि आजकल ज्यादातर मां-बाप भी मोबाइल देख रहे हैं। इसके अलावा जो प्रदूषण है, ऑनलाइन क्लासेज हैं तो बच्चों को मोबाइल देखना ही पड़ रहा है। दूसरी चीज आउटडोर एक्टिविटी बिल्कुल जीरो हो गई है बच्चों की। वो बाहर जाना ही नहीं चाहते। ये सबसे बड़ा कारण है चश्मा लगने का।
आशुतोष: इसका क्या समाधान है?
डॉ. नीलू: ऐसे में अभिभावकों को सचेत रहना होगा। वे घबराएं नहीं। अगर चश्मे का नंबर आ रहा है और चश्मा नहीं लगाएगा तो आंखें लेजी (सुस्त) हो जाएंगी। आगे चलकर उसका ट्रीटमेंट करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
आशुतोष: लेजी आई? ये कुछ नया आप बता रही है। मतलब आंखें भी लेजी होती है क्या?
डॉ. नीतू: हां। इसमें आंख दिखती तो आंख जैसी है लेकिन वो देखती नहीं है। उसका जो ब्रेन के साथ कनेक्शन है वो सप्रेस हो जाता है। तो उस चीज को मां-बाप भी पता लगा सकते हैं। जैसे बच्चा टीवी के बहुत पास जाकर देख रहा है। वो उस केस में है जब दोनों आंखों में नंबर लगभग बराबर है। अगर एक ही आंख में नंबर है और एक आंख बिल्कुल ठीक है तो वह सिर्फ जांच करके ही पता लगेगा। तो इसलिए अनिवार्य है कि बच्चा जब पैदा हो तो सबसे पहला आंख का टेस्ट जरूरी है। खासकर प्रीमेच्योर बच्चे में रेटिनोपैथी और प्रीमेच्योरिटी भी होने की भी संभावना होती है। अगर यह है तो समय से ट्रीटमेंट किया जाए।
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आशुतोष: इस चीज की विस्तार से जानकारी दीजिए।
डॉ. नीतू: प्रीमेच्योर बच्चे को नियोनेटल आईसीयू में रखा जाता है। अगर वहां लगातार रखा जाता है तो उसके कारण विकसित हो रहा पर्दा कहीं ना कहीं हैंपर होता है। पर्दे की प्रॉपर ग्रोथ को देखने के लिए जरूरी है कि समय पर बच्चा पैदा होता है तो एक आई टेस्ट जरूरी है। दूसरा स्कूल जाने से पहले कराया जाता है। अगर चश्मा है तो हर साल टेस्ट जरूरी है। चश्मा नहीं है तो पेरेंट्स भी देख सकते हैं कि बच्चा आंख को मसलता है या लगातार ब्लिंक करता है। टीवी बहुत पास जाकर देख रहा है या बहुत पास से किताब पढ़ रहा है। स्क्रीन टाइम के बारे में WHO की गाइडलाइन है कि दो साल से छोटे बच्चे को बिल्कुल मोबाइल नहीं दिखाना है। दो से पांच साल के बच्चे को थोड़ा बहुत दिखा सकते हैं। 10-15 मिनट। पांच साल के बच्चे ब्रेक के साथ दो घंटे देख सकते हैं। ऑनलाइन क्लास में भी 20 मिनट के बाद 20 सेकंड के लिए एक ब्रेक जरूरी है।
आशुतोष: तब तो स्कूल के टीचर और प्रिंसिपल को भी इस गाइडलाइन का पालन करना चाहिए।
डॉ. नीतू: निश्चित रूप से। स्कूल को भी ध्यान देना होगा इस विषय पर।
आशुतोष: आंखों का डाइट से भी कोई संबंध है क्या?
डॉ. नीतू: बिल्कुल है। डाइट का संबंध है। पर जैसे हरे पत्ते, हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, दही, पनीर और गाजर आदि खाना चाहिए जो नंबर को रोकती हैं। ऐसा नहीं है कि इससे चश्मा हट जाएगा। इससे नंबर स्थिर रह सकता है। ऐसा नहीं है कि वह चश्मे का विकल्प है। दूसरा, आजकल बच्चे जंक फूड बहुत लेते हैं। उसे भी कम करना होगा क्योंकि उससे कहीं ना कहीं न्यूट्रिशनल वैल्यू कम हो रही है। उसका भी कहीं ना कहीं प्रभाव पड़ता है।
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आशुतोष: लेकिन नौकरीपेशा होने के कारण घर में भोजन बनाने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। खाना बाहर से मंगाया जाता है। ऐसी स्थिति में कैसे प्रिवेंट किया जाएगा?
डॉ. नीतू: घर का खाना ही अनिवार्य है। बाहर के देश में लोग हफ्ते खाना फ्रीज करके रख लेते हैं। लेकिन बच्चों में उस तरह का संस्कार दें कि वो घर का भोजन करें। दूसरा उनका टाइम फिक्स करना कि इतने बजे उठेंगे तो ये हरी सब्जी खानी है। ये फल खाना है। डाइट चार्ट बनेगा तो बच्चे को शुरू से अगर आदत होगी और वो फॉलो करेगा। यह उसके लिए भी बहुत अच्छा रहेगा।
आशुतोष: पहले बुजुर्ग लोग कहते थे कि नंगे पांव चलो। इससे आंख में नंबर आएंगे ही नहीं। ये कितना सही है और इससे कितना फायदा होता है?
डॉ. नीतू: इसका मतलब है कि आप अपने प्रकृति से जुड़े रहें। नंगे पांव अगर चल सकते हैं तो चलिए।
आशुतोष: आंखों में नंबर आने की कोई उम्र होती है क्या?
डॉ. नीतू: 40 की उम्र के बाद लेंस की इलास्टिसिटी कम हो जाती है। उस कारण से नजदीक का नंबर आता है। वो उम्र के साथ ही आता है। उसमें आप डाइट अच्छी कर सकते हो। एंटीऑक्सीडेंट रिच डाइट कर सकते हो। हरी पत्तेदार सब्जियां, फ्लैक्स सीड्स और अगर जो नॉन वेजिटेरियन हैं वो फिश ले सकते हैं। अगर डाइट अच्छी रहती है तो वो थोड़ा लेट होता है। 40 से 45 हो जाएगा, 50 हो जाएगा। लेकिन कहीं ना कहीं पास का नंबर तो आएगा ही।
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आशुतोष: पास का नंबर या दूर का नंबर…इसे दर्शकों को समझाएं।
डॉ. नीतू: जब नजदीक का दिखना कम हो जाए तो वो पास का नंबर है। इसको प्रेस बायोपिया भी बोलते हैं। जब दूर का दिखना कम होता है उसको हम हाइपरमेट्रोपिया बोलते हैं। आजकल के युग में बच्चों में मायोपिया बहुत ज्यादा कॉमन है। अभी ऐसे लेंस भी आते हैं जो नंबर को कंट्रोल करते हैं और वो खासकर बच्चों के लिए हैं। मायोपिया कंट्रोल ग्लास। एक आई ड्रॉप्स भी है जो एट्रोपिन लो डोज आती हैं जो रात में एक बार डालनी होती है। उससे भी नंबर कंट्रोल होता है बच्चों का।
आशुतोष: आंखों की देखभाल के लिए कोई गाइडलाइन भी है क्या?
डॉ. नीतू: हां। सबसे पहला काम तो यह जरूरी है जब आप उठें तो मोबाइल नहीं देखें। पानी पीते रहें। हाइड्रेशन मेंटेन करें। दूसरा, अब आंखों को धोना है तो पीने वाले पानी से करें टैप वाटर में कई बार प्रिजर्वेटिव और क्लोरीन ज्यादा होता है। इससे आंखें लाल हो सकती हैं। अगर स्क्रीन टाइम ज्यादा है तो ओवर द काउंटर्स लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स आती हैं जो आप रेगुलर डाल सकते हो दिन में दो से तीन बार।
आशुतोष: एक उम्र के बाद आंखों के बचाव के लिए हमें क्या करना चाहिए? किस तरह का ड्रॉप्स लेना चाहिए? अच्छे या बुरे ड्रॉप्स को वो कैसे समझेंगे?
डॉ. नीतू: आई स्पेशलिस्ट से बात करने के बाद ही कोई ड्रॉप्स लें। कम से कम एक ओपीडी तो कर लें। पूछ लें कि ये समस्या है तो इसमें क्या लेना है।
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आशुतोष: आपने कहा ओवर द काउंटर से आप ले सकते हैं। लेकिन यह कितना नुकसान नुकसानदेह है?
डॉ. नीतू: बिना दिखाए सिर्फ आप लुब्रिकेटिंग ड्रॉप्स ले सकते हो। उसके अलावा कोई भी ड्रॉप अगर आपको डालने की आवश्यकता है तो बिना दिखाए नहीं डालें क्योंकि बहुत सारी ड्रॉप्स ऐसी है जो आंखों की नसों पे इफेक्ट करती हैं और एक बार ऑप्टिक नर्व यानी आंख की नस सूख गई तो उसका कोई इलाज नहीं है।
आशुतोष: लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स में किस तरह के साल्ट होते हैं?
डॉ. नीतू: इसमें कई साल्ट होते हैं। कार्बोक्सी मिथाइल सेलुलोस होता है, हाइड्रोक्सी मिथाइल सेलुलोस होता है, पॉलीप्रोपाइलन होता है। ये सारे नॉर्मल सूदिंग इफेक्ट देते हैं। आंखों के ऊपर जो एक लेयर है कंजवा और कॉर्निया, इसके ऊपर एक टियर फिल्म की सतह होती है। जब हम लगातार स्क्रीन देख रहे हैं तो हमारा ब्लिंक रेट बहुत कम हो जाता है। उसके कारण ड्राईनेस आती है। तो वो उस चीज का रिप्लेसमेंट है।
आशुतोष: मैंने देखा है कि कुछ लोग गुलाब जल आंखों में डालते हैं।
डॉ. नीतू: गुलाब जल नहीं डालना चाहिए क्योंकि यह किस स्थिति में बना है, कैसे बनाया गया है, कोई नहीं जानता। कई बार उससे इनफेक्शन का चांस भी होता हैं। बेहतर यही है कि आप डॉक्टर से दिखाए बिना नहीं डालें।
(जारी)
प्रस्तुति—अजय वर्मा
