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मन की बात / Mind Matter

सफेद कोट और उसके भीतर का इंसान

सफेद कोट और उसके भीतर का इंसान

एक डॉक्टर की व्यथा—कथा

डॉ. रामेश्वर कुमार

मैं डॉक्टर हूँ। पर आज, मैं सिर्फ एक इंसान की तरह आपसे कुछ बातें साझा करना चाहता हूँ…

पहली कहानी: वो शाम जब मैं ‘गिद्ध’ बन गया। हवा में खुशबू थी, दावत का माहौल था। हम एक रिटायर्ड इनकम टैक्स ऑफिसर के घर डिनर पर थे। बातों-बातों में मैंने पूछ लिया-“अंकल, टैक्स बचाने के कुछ तरीके बताइए ना?”
वो एक मासूम सवाल था, पर उसने सब कुछ बदल दिया।
उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आई। उन्होंने कहा, “तुम डॉक्टर लोग! तुम्हारा तो पेशा ही टैक्स चोरी करना है! तुम सब गिद्ध हो!”
वो शब्द… ‘गिद्ध’… मेरे दिल में छुरे की तरह घुस गया। उस रात का खाना मेरे गले से नहीं उतरा। मैं एक इंसान से सिर्फ एक ‘स्टीरियोटाइप’ बन गया था।
दूसरी कहानी: ट्रेन का सफर जहाँ मैंने खुद को बदनाम होते सुना। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए, मैं अनजान बना बैठा था। मेरे आसपास के लोग डॉक्टरों के बारे में बात कर रहे थे।
“डॉक्टर तो आजकल डाकू बन गए हैं!”
“इनका कोई ईमान नहीं रहा!”
“सब पैसे के पीछे भागते हैं!”
एक भी आवाज़ ऐसी नहीं जो हमारे उन रातों का जिक्र करती, जब हम मरीजों के बिस्तर के पास खड़े-खड़े सोते हैं। एक शब्द भी हमारी उस खुशी के बारे में नहीं, जब कोई मरीज ठीक होकर घर जाता है।
जब उन्हें पता चला कि मैं डॉक्टर हूँ, तो अचानक सब चुप हो गए। फिर बोले-“आप तो अलग हैं!”
सवाल यह है-क्या सच में मैं अलग हूँ? या सिर्फ अब मैं उनके सामने एक चेहरा हूँ, एक लेबल नहीं?
तीसरी कहानी: वो रात जब हम ‘हत्यारे’ बना दिए गए…
ऑपरेशन थिएटर की चमकती रोशनी…एक युवा शिक्षक का ऑपरेशन था। हमने एनेस्थीसिया दिया…और अभी चीरा तक नहीं लगाया था कि…उसका दिल रुक गया। मरीज के मरने का मुझे बहुत कष्ट हुआ जो मेरा कुछ भी नहीं था सिवाय मेरे मरीज के।
हमने हर संभव कोशिश की, पर वो चला गया। और फिर शुरू हुआ वो नर्क…
“डॉक्टरों ने जान ले ली!”
“ये तो कातिल हैं!”
“पैसे के लिए मार डाला!”
वो रात…वो आरोप…वो नज़रें…हम एक त्रासदी के शिकार थे, पर समाज की नज़रों में हम ‘अपराधी’ बन गए। बार-बार यह आवाज आ रही थी जान के बदले जान।

एक सच्चाई जो आप तक पहुँचाना चाहता हूँ

  • हम ‘भगवान’ नहीं हैं।
  • हम इंसान हैं-थकते हैं, टूटते हैं, रोते हैं, पर फिर भी आपके लिए लड़ते हैं।
  • हमारा पेशा एक कानूनी व्यवसाय है:
  • हम टैक्स देते हैं
  • हम कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के अंतर्गत आते हैं
  • हमारी फीस हमारी सेवाओं का मेहनताना है

एक विडंबना यह भी है

जो शिकायतें अक्सर आती है, वो पढ़े-लिखे वर्ग से आती है। जबकि गरीब और आम लोग हमें सबसे ज्यादा सम्मान और प्यार देते हैं। शायद इसलिए क्योंकि वो हमें ‘भगवान’ नहीं, एक ‘सहायक’ के रूप में देखते हैं।

मेरी विनती

  • हमें भगवान का दर्जा देकर अवास्तविक अपेक्षाओं के जाल में मत फंसाइए। हमें बस एक इंसान समझिए-जो अपना पेशा ईमानदारी से निभा रहा है।
  • हमारा कोट सफेद है, दिल नहीं।
  • हम आपके लिए लड़ते हैं, आपके साथ खड़े होते हैं।
  • बस हम पर विश्वास कीजिए।
  • अब आपकी बारी है:
    अगर आपको लगता है कि डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास और इंसानियत का रिश्ता जरूरी है, तो एक दूसरे को समझने की एक कोशिश और करें।

(लेखक सिवान, बिहार के जानेमाने आर्थो सर्जन और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

#white coat#doctor

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