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आयुर्वेद में भी रहा है इंजेक्शन का प्रचलन

आयुर्वेद में भी रहा है इंजेक्शन का प्रचलन

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

नयी दिल्ली। समाज में मान्यता है कि आयुर्वेद में आशुकारी (Rapidly Acting) औषधि नहीं है लेकिन कुछ दशक पहले तक इमरजेंसी केस में आयुर्वेदिक सिद्धांतों के आधार पर निर्मित शीघ्र प्रभावी इंजेक्शन निर्मित होते थे। यह बात तो सैद्धान्तिक है कि आयुर्वेद का चिकित्सा क्रम केदारी कुल्या न्याय से सिद्ध होता है पर आयुर्वेद में ऐसी-ऐसी रसौषधियों का वर्णन है जो इन्जेक्शन की भाँति कार्यकारी है। कहा भी गया है-
“अल्प मात्रापयोगित्वादरुचेरप्रंसगतः।
क्षिप्र आरोग्य दायित्वात् ओषधेभ्योधिको रसः।।”
अर्थात् अल्पमात्रा में उपयोगी, रुचिपूर्वक सेवन योग्य, दीर्घकाल तक गुणयुक्त तथा शीघ्र आरोग्य प्रद रसौषधियाँ हैं। क्षिप्र आरोग्य दायित्वात् के लिए आवश्यक है कि औषधि शीघ्रातिशीघ्र रोग के अधिष्ठान तक पहुँच कर रोग को नष्ट कर दे।
मुख द्वारा औषधि लेने से पाचन संस्थान में शोषित होकर फिर रक्त में मिलने में समय लगता है अतः औषधि सीधे और शीघ्र रक्त में पहुँचे इसके उपाय खोजे गये। इसके लिये प्राचीन समान में सिर में शस्त्र द्वारा कौओ के पंजे के आकार का घाव बनाकर वहां औषधि भर दी जानी थी जिससे वह सीधे रक्त में फैलकर अपना प्रभाव शीघ्र प्रदार्शित करती थी। इन्जेक्शन क्रिया आयुर्वेद की देन है। आचार्य शार्ङ्गधर ने लघु सूचिका भरण रस (मध्य खण्ड अ. 12) के प्रयोग में लिखा है- “रक्तभेषजं सम्पर्कता मूर्च्छितोऽपि हि जीवति” अर्थात् रक्त का सम्पर्क होते ही मूर्च्छित उठ बैठता है, आयुर्वेद के इसी सिद्धान्त पर इन्जेक्शन विधि का जन्म हुआ है। रस रत्न समुच्चय में मूर्च्छा, सन्यास, सर्पविष, सन्निपात की आपातकालीन अवस्थाओं में सूचीवेध क्रिया (Injection) द्वारा औषधि को शरीर में पहुँचाने का निर्देश दिया गया है –
दापयेत्सूचिकाभ्रेण सर्वेषां सन्निपातकम्।
सूच्यग्रेण दातव्यं पयः पेटी जलेन च।।
उपर्युक्त कथन में औषधि को पयपेटी (सिरिंज) में भरकर सुई की नोक से शिरा में पहुँचाने का स्पष्ट विधान बताया गया हैं। तो फिर प्रश्न उठता है कि यह भ्रान्ति कैसे पैदा हुयी कि इन्जेक्शन क्रिया एलोपैथ की देने है। ये आयुर्वेदिक इंजेक्शन पहले मार्केट में बिकते थे फिर अचानक षड्यंत्र के तरह ये मार्केट से गायब हो गए जबकि इनका ट्रायल भी किया हुआ था। ऐसे ही इंजेक्शन की सूची इस प्रकार है।
अशोक सूचीवेध-गर्भाशय टॉनिक और शामक तो है ही, इसका प्रभाव गर्भाशय भित्ति की सूक्ष्म रक्तवाही कोशिकाओं पर संकोचक होने के कारण रक्त प्रदर, रजःस्रावाधिक्य तथा प्रसवोत्तर रक्तस्राव रोधक रूप में पड़ता है। इससे तन्तु विघटन रुकता है, जिससे गर्भाशयिक शूल में कमी आती है। इसके अतिरिक्त इसे श्वेत प्रदर, सोमरोग, गर्भाशयशोथ एवं गर्भस्राव में लगाया जाता है। श्वेतप्रदर में उत्तम लाभ मिलता है। समस्त गर्भाशय रोग, योनि के सभी रोग, समस्त प्रदर रोग एवं प्रसवोत्तर रक्तस्राव आदि ठीक होते हैं।
अर्जुन/अर्जुना सूचीवेध-हृदय टॉनिक, यह रक्त में मिलकर नियन्त्रक नाड़ियों पर प्रभाव डालता है। इससे हृदय की क्रिया नियमित होती है, साथ ही हृदय की वसा दर को कम करती है। इससे रक्तातिसार, क्षय तथा कास में बहुत उपयोगी है।
गिलोय इंजेक्शन सूचीवेध-जीर्ण ज्वर, पुनरावर्तक ज्वर, मलेरिया, दाह, गर्मी, मूत्र रोग, प्रमेह सम्बन्धी विकार, श्वास, कामला, यक्ष्मीय रक्तस्राव आदि में उपयोगी। इसके सेवन से पाचन शक्ति बढ़ती है तथा रस, रक्त धातु एवं बल की वृद्धि होती है।
कुर्ची सूचीवेध-सभी प्रकार के एवं जीर्ण अतिसार, ग्रहणी, संग्रहणी, मन्दाग्नि, रक्तपित्त तथा कुष्ठ में उपयोगी। यह औषधि आधुनिक औषधि ‘इमेटिन हाइड्रोक्लोराइड’ के समकक्ष है।
कुर्चीना सूचीवेध-सभी प्रकार के अतिसार, अमीबिक डिसेण्ट्री, यकृत शोथ, (Hepatitis), बेसिलरी डिसेण्ट्री, खूनी पेचिश, आँव, बड़ी आंत में शोथ आदि में अति उपयोगी।
कुष्ठार सूचीवेध-सफेद दाग, पामा (Bezema), कण्डू तथा त्वचा के अनेक रोगों में उपयोगी। यदि इसके साथ में ‘पामार’ इंजेक्शन एक दिन छोड़कर दिया जाय तो कण्डू तथा पामा में विशेष लाभ मिलता है।
गिरपार सूचीवेध-तीव्र नाड़ीशूल (Neuralgia), सभी प्रकार की आमवातिक तथा वायु से उत्पन्न पीड़ा, गुल्म, उदरशूल, गृध्रसी (Sciatica), वमन, हिचकी, स्वप्न प्रमेह, बच्चों का बिस्तर पर पेशाब करना, यक्ष्मीय रात्रि स्वेद, कफयुक्त कास, बिच्छू विष की पीड़ा, वृक्क शूल, एपेण्डिसाइटिस, छाती का तीव्र वातिक शूल, हृदयशूल (Angina Pectoris), श्वास, निमोनिया, स्तनों में दूध की अधिकता, मुख से अत्यधिक लार का आना, अत्यधिक स्वेद आदि विकारों में परम उपयोगी। यह किसी भी प्रकार के तीव्र शूल को तत्काल शान्त करता है।
काँचनार सूचीवेध-आमातिसार, गलगण्ड, गण्डमाला, ग्रन्थि शोथ, गाँठ, मुंह के भारी छाले, मूत्र के साथ रक्तस्त्राव, व्रण, विद्रधि, मूढगर्भ, रक्तप्रदर, उदर रोग, कुष्ठ, गुदभ्रंश आदि विकारों में परम उपयोगी।
कटसरैया सूचीवेध-मसूरिका, स्वेदोवरोध, ज्वराधिक्य, कफोरोध, बन्ध्यत्व, सर्वांगशोथ, प्रसूति तथा सम्बन्धी रोगों में लाभकारी।
कांस्य भस्म सूचीवेध-विषम ज्वर (Malaria), यकृत् प्लीहा वृद्धि, कफविकार, पित्तविकार, मूत्रविकार, रक्तविकार में लाभकारी।
कासान्तक सूचीवेध-हर प्रकार की नई पुरानी खाँसी में उपयोगी। यह जमे हए कफ को पतला कर बाहर निकालता है।
कुचला सूचीवेध-पक्षाघात, निमोनिया, वातविकार, अर्श (Piles), अतिसार, ध्वजभंग, अंग शाल, गठिया, आमवात, पागल कुत्ते के काटने आदि में उपयोगी। इससे पाचन क्रिया में लाभ होता है। वातव्याधियों में विशेष लाभ।
गन्धक सूचीवेध-अजीर्ण, अग्निमांद्य, आमदोष, रक्तविकार तथा पाकयुक्त चर्म विकारों में अतिशय उपयोगी। जिन व्यक्तियों को प्रातः होने से पूर्व ही शौच के लिए जाना पड़ता है, उनमें यह अधिक लाभकारी है।
गन्धकर्पूर सूचीवेध-विशुचिका (Cholera) की प्रत्येक अवस्था में परम उपयोगी। अतिशय दुर्बलता के साथ बेहोशी की अवस्था में इसका प्रयोग करना चाहिये। हृदय दौर्बल्य, स्नायुशूल (Neuritis) तथा गृध्रंसी (Sciatica) में भी लाभदायक है। विशूचिका की भयंकर स्थिति पर भी काबू पाया जा सकता है।
कुकुरभाँगरा सूचीवेध-मूर्छा या टिटनेस में परम उपयोगी। इसके अतिरिक्त ज्वर, मुँह की सूजन आदि में भी यह दिया जाता है।
कार्डिमा सूचीवेध-यह हृदय तथा श्वास की गति को उत्तेजित करता है। जब हृदय और नाड़ी की गति मन्द पड़ गयी हो और श्वास भी मन्द गति से चल रहा हो तो इसके प्रयोग से उत्तम लाभ मिलता है। अफीम तथा अन्य बेहोशी लाने वाली औषधियों के सेवन करने से जो उपद्रव होते हैं, जैसे शरीर का ठण्डा पड़ जाना, नाड़ी तथा श्वास की गति का मन्द पड़ जाना आदि में इसके प्रयोग से लाभ होता है।
कुटजा सूचीवेध-पेचिश, मरोड़, खूनी दस्त, अमीबिक डिसेण्ट्री, संग्रहणी आदि में परम उपयोगी। उदर तथा मलाशयद्वार की वेदना में इससे अधिक लाभ मिलता है। खूनी बावासीर में भी उत्तम लाभ होते देखा गया है। (यह आधुनिक औषधि ‘इमेटिन’ से अधिक उपयोगी है)।
अर्शोन सूचीवेध—रक्तस्राव एवं दोनों प्रकार (आद्र व शुष्क) के बावासीर में अति उपयोगी। नाक, मुँह, योनि एवं फुफ्फुसों से आने वाले रक्तस्राव में उत्तम लाभ पहुंचाता है।
अगारको सूचीवेध-सिर शूल, बच्चों के दौरे, योषापस्मार, हिस्टीरिया, अपस्मार (मृगी), मस्तिष्क तथा सम्बन्धी विकारों में लाभकारी।
अजवायन सूचीवेध-अकड़न एवं वेदनानाशक है। साथ ही इससे शान्तिप्रिय निद्रा आती है। सन्निपातिक जकड़न कम होती है। इसके अतिरिक्त प्रसवजन्य प्रलाप, शूल, अजीर्ण, हैजा, मलावरोध, उदर विकार, उन्माद, आनाह, गुल्म, वायुगोला, दस्त, निद्रानाश, अपचन, प्लीहा तथा कृमि आदि विकारों में लगाया जाता है। इसको दमा, प्रमेह, स्वप्नदोष, खाँसी-जुकाम, पावशूल तथा मूच्छा आदि रोगों में भी सफलता के साथ दिया जा सकता है। अनिद्रा वाले रोगी को शाम के समय सूचीवेध देने से रात्रि के समय अच्छी नींद आती है।
अपराजिता सूचीवेध-इसका प्रभाव विशेष रूप से लसिका ग्रन्थिओं (Lymphatic glands) पर पड़ता है। इसके प्रयोग से शोथ तथा दाह का निवारण होता है। इसके अतिरिक्त यह गलगण्ड, घेघा, दिल की जलन (Heart burn), हिचकी, कामला, शीतपित्त, वातरक्त, रक्तविकार, व्रण, हृत्पीड़ा, डिफ्थीरिया, कुष्ठ, मूत्र रोग, फाइलेरिएसिस आदि विकारों में भी लाभकारी है।
कपूर-कस्तूरी सूचीवेध—इसे निमोनिया, टायफाइड, सन्निपात, हृदयक्षीणता, हृदय तथा श्वास की अनियमित गति, पार्श्वशूल, (पसली का दर्द) तथा विशूचिका आदि संक्रामक रोगों में हृदय की उत्तेजना के लिये देते हैं।
कपूर-कस्तूरी-ईथर सूचीवेध-शरीर ठण्डा होना, हृदयावसाद, हृदयावरोध, हच्छ्ल, हृदय दुर्बलता, स्तब्धता आदि। यह शरीर के अति शीतल होने, एकाएक पसीना अधिक आने, अवसाद, नाड़ी क्षीणता तथा हृदयगति रुकने की स्थिति में अधिक लाभकारी है।
कस्तूरी सूचीवेध- वातव्याधि, स्त्रीरोग, हदयदौर्बल्य, निमोनिया, शीतांगता, प्रलाप, शक्तिहीनता, सब रोगों की अन्तिम मरणासन्न अवस्था, डबल निमोनिया, अवसाद, सदमा, सन्निपात, फ्लू, विशूचिका, वातव्याधियों आदि में परम उपयोगी। रोग की अन्तिम अवस्था में इसे नस में लगायें।
कल्याणसुन्दर सूचीवेध—जी मिचलाना, हतकम्प, हदयावसाद, दिल की धड़कन, अरुचि, श्वास, खाँसी, निमोनिया, प्रमेह, नपुंसकता आदि रोगों में परम उपयोगी।
कस्तूरीभैरव सूचीवेध-वातरोग, सन्निपात, प्रलाप, हृदयदौर्बल्य, शक्तिहीनता, ज्वर, नाड़ी क्षीणता आदि में उपयोगी।
गंगाधररस सूचीवेध-प्रवाहिका, अतिसार, संग्रहणी तथा मन्दाग्नि में अति उपयोगी।
गोखरु सूचीवेध-मूत्रकृच्छ, पथरी, दाह, उष्णता, निर्बलता, पूयमेह, रक्तविकार, चर्मरोग, वस्तिशोथ, वृक्करोग, सूजाक एवं वस्तिशोथ, बन्ध्यत्व (Sterility), श्वास, कास, अर्श, वीर्यक्षीणता, स्वप्नदोष, अनैच्छिक वीर्यस्राव, हृदय एवं वायु रोग में उपयोगी। इसे शिलाजीत इंजेक्शन के साथ लगाने से यह परम वाजीकरण प्रभाव दिखलाता है।
घृतकुमारी सूचीवेध-इसका प्रभाव गर्भाशयिक अंगों, यकृत तथा स्वेद ग्रंथियों पर पड़ता है। उदररोग, मासिकधर्म विकार, दुष्टरज, यकृत वृद्धि, अंडवृद्धि, आमदोष तथा गुल्म में उपयोगी। विषम ज्वर (Intermittant fever), प्रसूति ज्वर (Puerperal fever), आमवात (Rheumatism), वातरक्त, गर्भाशयशोथ, मासिकस्त्राव में अविलम्ब कार्यशील।

साभार

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