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YOGA: डायबिटीज में भी लाभकारी

YOGA: डायबिटीज में भी लाभकारी

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) में अब चंद दिन ही रह गए हैं। इस मौके पर प्रस्तुत है खास आलेखों की कड़ी।

कुमार कृष्णन

योग (YOGA) एक विज्ञान है, एक बेहतरीन जीवनशैली है जिसे हमारे मनीषियों ने इस प्रकार तैयार किया है कि उसके द्वारा तनाव से उत्‍पन्‍न विकारों और जीवनशैली से उत्‍पन्‍न होने वाले मधुमेह जैसे विकारों को प्रभावशाली तरीके से दुरूस्‍त किया जा सकता है। आधुनिक अनुसंधानों से पता लगा है कि योग द्वारा मनोवैज्ञानिक और शारीरिक लाभ प्राप्‍त होते है। योग केवल शारीरिक कसरत नहीं है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार, “योग केवल कसरत या शारीरिक व्यायाम नहीं है, यह संपूर्ण जीवन का विज्ञान है, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर व्यक्ति को रुपांतरित करता है।’
योग आधारित जीवनशैली को आत्मसात करने पर, थोड़े ही दिनों बदलाव और तनाव कम करने के प्रयासों के जरिये हृदय रोग तथा मधुमेह के जोखिमों को कम किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के चिकित्सकीय अनुसंधान से पता चला है कि योग द्वारा वजन, रक्‍तचाप, शर्करा के स्‍तर और बढ़े हुये कोलेस्‍ट्रॉल को कम किया जा सकता है। विभिन्न अध्ययनों से यह साबित हो गया है कि मधुमेह के कारण शरीर की केन्‍द्रीय स्‍नायु तंत्र प्रणाली प्रभावित होती है। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार, मधुमेह मुख्य रूप से अनियमित जीवनशैली और तनाव का परिणाम है। योग मधुमेह प्रबंधन में एक प्रभावी पूरक चिकित्सा के रूप में काम करती है। यह न केवल शरीर में रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती है, बल्कि तनाव कम करके अग्न्याशय की कार्यक्षमता में भी सुधार करती है।
पूरी दुनिया में मधुमेह का खतरा लगातार बढ़ रहा है एक अनुमान के मधुमेह के रोगियों की संख्या 2045 तक बढ़कर 62.9 करोड़ हो सकती है। अव्यवस्थित जीवनशैली और अस्वास्थ्यकर आहार मधुमेह सहित विभिन्न जीवनशैली विकारों के विकास के प्रमुख जोखिम कारक हैं। मनोवैज्ञानिक तनाव मधुमेह के जोखिम और गंभीरता को बढ़ाता है। शारीरिक गतिविधि की कमी से मधुमेह का जोखिम तीन गुना और कोरोनरी धमनी रोग का जोखिम 2.4 गुना बढ़ जाता है।
सिडनी में चिकित्सक रहे डॉ. कर्मानंद सरस्वती, 1974 में भारत मुंगेर स्थित बिहार योग विद्यालय आए और योग चिकित्सा क्षेत्र में काफी समय तक अनुसंधान किया। उनके अनुसार-मधुमेह आमतौर पर वृद्धावस्था की बीमारी मानी जाती थी, जो लगभग 50 या 60 वर्ष की आयु के लोगों में सबसे पहले दिखाई देती थी, जो अपने आहार में अत्यधिक चीनी और स्टार्च का सेवन करते थे, जिनका वजन अधिक होता था और जो व्यायाम नहीं करते थे। अग्न्याशय की इस कमजोरी को योग चिकित्सा और आहार संबंधी नियमों द्वारा नियंत्रित और ठीक किया जा सकता है। ये उपाय शरीर के ऊतकों को अपने ही इंसुलिन के प्रति संवेदनशील बनाते हैं, कमजोर अग्न्याशय और पाचन ग्रंथियों को पुनर्जीवित करते हैं और शरीर के सही वजन को बहाल करते हैं।
बदलते समय के साथ -साथ मधुमेह का स्वरूप भी बदल रहा है। चिकित्सा वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों में मधुमेह बढ़ रहा है। उन्होंने अपने शोध में भी यही पाया है। आधुनिक सभ्य जीवनशैली में पनप रहे असंतुलन के कारण बच्चों में मधुमेह तेजी से बढ़ रहा है। बाद की उम्र में धीरे-धीरे उभरने वाले मधुमेह को आहार और योगिक अभ्यासों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन मधुमेह का यह नया रूप वृद्धावस्था में होने वाले मधुमेह से कहीं अधिक गंभीर है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, किशोर मधुमेह के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन आवश्यक होते हैं और बच्चों को दिन में दो या तीन बार स्वयं इंजेक्शन लगाना सिखाया जाता है। कभी-कभी वे 50 या 75 यूनिट तक इंजेक्शन लगाते हैं। दुर्भाग्य से, इसके कुछ दुष्प्रभाव भी हैं। इंसुलिन जानवरों के अग्न्याशय से निकाला जाता है और ये पशु प्रोटीन एक बाहरी उत्तेजना के रूप में कार्य करते हैं, जिस पर शरीर की रक्षा प्रणाली प्रतिक्रिया करती है। रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने के लिए अन्य दवाओं का भी उपयोग किया जाता है, लेकिन उनमें से कुछ हृदय को नुकसान पहुंचा सकती हैं। योग से स्‍नायु तंत्र में और मधुमेह के मरीजों के बायो-कैमिकल प्रोफाइल में सुधार होता है। नियमित योगाभ्यास मधुमेह के रखरखाव और उसकी रोकथाम में सहायक होती है तथा उच्‍च रक्‍तचाप और डिसलिपिडेमिया जैसी परिस्थितियों से बचाव होता है। लंबे समय तक योगाभ्‍यास करने से इन्‍सुलिन के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है और शरीर के वजन या कमर के घेरे तथा इन्‍सुलिन संवेदनशीलता के बीच का नकारात्‍मक संबंध घट जाता है।
बिहार योग पद्धति या सत्यानंद योग में मधुमेह (डायबिटीज) को नियंत्रित करने के लिए पारंपरिक हठ योग, राज योग और विशेष रूप से ‘योग निद्रा’ के वैज्ञानिक अभ्यास को बेहद प्रभावी माना गया है।
योग का कोई साइफ इफेक्ट नहीं है। इसके कई संपार्श्विक लाभ हैं। यह इतना सुरक्षित और आसान है कि इसे बीमार, बुजुर्ग और दिव्यांग भी कर सकते हैं। सुरक्षित, साधारण और आर्थिक रूप से किफायती थेरेपी होने के चलते इसे मधुमेह रोगियों के लिए काफी सहायक माना गया है।
विश्व योग आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने मधुमेह को प्रबंधित करने के लिए प्राचीन योग आसनों और ध्यान का एक चिकित्सीय मॉड्यूल विकसित किया था। इसके अंतर्गत अंगों और ग्रंथियों को सक्रिय करने के लिए हल्के जोड़ों के व्यायाम यानी पवनमुक्तासन श्रृंखला।मंडूकासन और वज्रासन में दोनों आसन पेट के अंगों पर दबाव डालकर इंसुलिन स्राव को उत्तेजित करते हैं। इसके साथ नाड़ी शोधन प्राणायाम और भ्रामरी प्राणायाम। नाड़ी शोधन और भ्रामरी प्राणायाम वैज्ञानिक और चिकित्सकीय अध्ययनों में अत्यंत प्रभावी पाए गए हैं। नैदानिक परीक्षणों से पुष्टि होती है कि ये अभ्यास तंत्रिका तंत्र को शांत करते हैं, हृदय गति परिवर्तनशीलता में सुधार करते हैं और रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। चिकित्सा विज्ञान यह मानता है कि योग से कई जोखिम सूचकों में लाभदायक है और उसमें बदलाव पाए गए हैं जैसे ग्लूकोस सहिष्णुता, इंसुलिन संवेदनशीलता, लिपिड प्रोफाइल, एन्थ्रोपोमेट्रिक विशेषताओं, रक्तचाप, ऑक्सीडेटिव तनाव, कोग्यूलेशन प्रोफाइल, सिम्पेथेटिक एक्टिवेशन और पलमोनरी फंक्शन में इसे काफी फायदेमंद पाया गया।
टाइप 2 मधुमेह एक दीर्घकालिक स्थिति है जिसमें शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या इंसुलिन का सही उपयोग नहीं कर पाता है। इसके परिणामस्वरूप खून में शुगर (ग्लूकोज) का स्तर बढ़ जाता है, जिससे थकान, बार-बार पेशाब आना और अत्यधिक प्यास लगना जैसी समस्याएं होती हैं। योग टाइप 2 मधुमेह के साथ जोखिम कर करता है। इसके अलावा हृदय संबंधी जटिलताओं की रोकथाम और प्रबंधन के लिए भी यह काफी फायदेमंद है।
पुरानी बीमारियों को रोकने और उसे नियंत्रित करने में भी योग काफी मददगार साबित हो सकता है। जनसमूह के स्वास्थ्य में सुधार के लिए योग एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। योग में बीमारी को बढ़ने से रोकने की क्षमता है और यदि इसे जल्द शुरू किया जाए तो ये इलाज को भी प्रभावित करता है।
मधुमेह की रोकथाम और इसे नियंत्रित करने में योग एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग का महत्त्व उन लोगों के लिए और महत्त्वपूर्ण हैं जो द्वितीय प्रकार या गैर इंसुलिन मधुमेह से पीड़ित है। यह ऐसे लोगो को अधिक प्रभावी ढंग से उपचार करने में मदद करता है। योग को अगर नियमित रुप से दिनचर्या में शामिल किया जाए तो इससे बीमारियों पर रोकथाम के साथ-साथ वजन कम करने में मदद मिलती है। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा स्थापित बिहार योग विद्यालय ने 1978 में ओडिशा के बुरला मेडिकल कॉलेज के सहयोग से मधुमेह के ऐसे मरीजों पर अनुसंधान किया था, जो चालीस वर्षों से इंसुलिन ले रहे थे। इन मरीजों को चालीस दिनों तक लगातार योगाभ्यास कराया गया और अंतिम दिन उनके खून की जांच करवाई गई तो ज्ञात हुआ कि योग से उन्हें काफी लाभ हुआ।
मधुमेह में खानपान पर नियंत्रण के साथ—साथ नियमित रुप से कार्बोहाइड्रेट के साथ हल्का भोजन लेना चाहिए। रिफाइंड से बने खाद्य पदार्थों और जंक फूड से बचना चाहिए और हरी सब्जी सलाद, करेला और नीम का सेवन करना चाहिए। साथ ही पानी की भरपूर मात्रा में लेना चाहिए। नियमित सूर्य नमस्कार करने से शर्करा का स्तर कम हो जाता है और इससे वजन को कम करने में भी मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त त्रिकोण आसन, अर्ध कटि चक्रासन, वक्रासन, अर्ध मत्सयेंद्र, शशांक आसन, उत्कट आसन, जानुसिराआसन, पश्चिमोत्तन आसन, धनुराआसन, भुजंग आसन, शलभ आसन, नौका आसन,सर्वांग आसन, सर्वांग आसन, कर्णपीठ आसन और हल आसन का अभ्यास शारीरिक स्थिति के अनुसार योग्य प्रशिक्षण की देखरेख में देख देख में किया जाना चाहिए। सत्यानंद योग पद्धति अर्थात बिहार योग पद्धति में बताया गया है कि पवनमुक्तासन श्रृंखला साथ—साथ प्राणयाम और मंत्र जाप से स्थिति में काफी परिवर्तन होता हैै। इन आसनों का अभ्यास चरणबद्ध तरीके से धीरे-धीरे शारीरिक अवस्था की अनुकूलता के लिहाज से किया जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के लिए आयुष मंत्रालय और मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान का मुख्य विषय “स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” है। सामान्य योग प्रोटोकॉल का समय 45 मिनट का निर्धारित है। इस प्रोटोकॉल में शामिल योगाभ्यास ताड़ासन, वृक्षासन, पादहस्तासन, अर्ध चक्रासन, त्रिकोणासन,भद्रासन, वज्रासन, अर्ध उष्ट्रासन, शशांकासन, उत्तान मंडूकासन, वक्रासन,मकरासन, भुजंगासन, शलभासन, सेतुबंधासन, उत्तानपादासन, अर्ध हलासन, पवनमुक्तासन को दिनचर्या का अभिन्न अंग बनाते हैं तो योग के शारीरिक पक्ष का लाभ उठा सकते हैं। साथ ही मधुमेह यानी डायबिटीज को नियंत्रित करने में मददगार है। वहीं प्राणायाम में नाड़ीशोधन, भ्रामरी और शीतली प्राणायाम का खास महत्व है।
सकारात्मक सोच के साथ करें योग, निश्चित रूप से होगा लाभ।

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