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पार्किंसंस की दवा चार साल बाद बाजार में

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। पार्किंसंस (Parkinson) के उपचार की दिषा में वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। चूहों पर इसके सफल परीक्षण के बाद अमेरिका में मनुष्यों पर इसके ट्रायल्स शुरू हो गए हैं। कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति रसायन विज्ञान के प्रोफेसर दीवान सिंह रावत की इस खोज में महत्वपूर्ण भूमिका है। 12 वर्षों के परिश्रम के बाद उन्होंने उस अणु की खोज की है जो इसके इलाज में कारगर है। अमेरिका के प्रसिद्ध वॉल स्ट्रीट जर्नल, ब्लूमबर्ग ने प्रो. रावत की इस उपलब्धि को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। प्रोफेसर रावत और प्रोफेसर किम की ओर से विकसित इस अणु (ATM 399A) का क्लिनिकल ट्रायल हो रहा है। प्रो. रावत के मुताबिक डेढ़ वर्ष बाद इसका परीक्षण पार्किंसन्स के गंभीर रोगियों पर किया जाएगा। उन पर सफल होने पर चार साल बाद इसकी दवा मार्केट में उपलब्ध हो जाएगी। अमेरिका की प्रसिद्ध फार्मा कंपनी दवा को विकसित करेगी।

चिकनगुनिया की पहली वैक्सीन को मंजूरी

चिकनगुनिया से बचाव के लिए दुनिया के पहली वैक्सीन को अमेरिका ने मंजूरी दे दी है। फ्रांसीसी बायोटेक कंपनी वेलनेवा द्वारा निर्मित वैक्सीन को इक्सचिक (IXCHIQ) नाम दिया गया है। इसकी एक खुराक इंजेक्शन के जरिए मांसपेशियों में दी जायेगी। अमेरिका के खाद्य और औषधि प्रशासन (FDA) ने कहा कि वैक्सीन 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को दी जा सकती है। यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित मच्छर के काटने से इंसान में फैलता है। पिछले 15 वर्षों में 50 लाख मरीजों में चिकनगुनिया की पुष्टि होने के बाद यह बीमारी आज वैश्विक स्वास्थ्य खतरा बन गई है।

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