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यह युवा टीम 7 वर्षों से कर रही है स्वस्थ भारत के लिए संघर्ष

यह जानना जरूरी है कि किस तरह से स्वस्थ भारत अभियान ने स्वास्थ्य की तस्वीर बदल दी

130 करोड़ की आबादी वाले भारत में गर आपसे पूछा जाए कि इस देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? स्वभाविक रूप से इस प्रश्न का कोई एक जवाब ढूंढ़ पाना आपके लिए आसान नहीं होगा। गरीबी, भूखमरी, बीमारी, बेरोजगारी तमाम विषय आपके ज़हन में आएंगे।

सच भी है इस सवाल का कोई एक उत्तर हो भी नहीं सकता है। बावजूद इसके गर गौर किया जाए तो स्वास्थ्य एक ऐसा मसला है जिसका संबंध गरीबी, भूखमरी, बीमारी व बेरोजगारी जैसे सभी मुद्दो से है। 
जरा सोचिए गर आप स्वस्थ नहीं है तो क्या आप अपने श्रम का सही इस्तेमाल कर सकते हैं?गर आप स्वस्थ नहीं हैं तो रोजगार प्राप्त कर सकते हैं? गर आप स्वस्थ नहीं है तो गरीबी से लड़ सकते हैं? स्वभाविक है इन सभी सवालों का जवाब ना में ही होगा। ऐसे में यह तो स्पष्ट होता है कि वर्तमान में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती भारत के नागरिकों की स्वास्थ्य की सुरक्षा ही है।

2012 में शुरू हुआ स्वस्थ भारत अभियान

जरूर देखें…यह कहानी आशुतोष कुमार सिंह की जुबानी

इसी स्वास्थ्य सुरक्षा के मसले को मजबूति प्रदान करने के लिए भारत के कुछ नौजवानों ने स्वस्थ भारत अभियान की शुरूआत की है। सन् 2012 से शुरू यह अभियान आज देश के हर कोने तक पहुंच चुका है। स्वस्थ भारत की आवाज बन चुका है। पत्रकार आशुतोष कुमार सिंह कि व्यथा आज देश के हर नौजवान की व्यथा बन चुकी है। देश को महंगी दवाइयों से आज़ादी दिलाने के लिए उठा यह मशाल, देश के कोने-कोने में जाकर गरीबों को, मजदूरों को स्वास्थ्य-सुरक्षा की जानकारी मुहैया करा रहा है। विगत 7 वर्षों में स्वस्थ भारत अभियान के अंतर्गत दर्जनों राष्ट्रव्यापी कैंपेनों के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य के प्रति सचेत व जागरूक करने का काम स्वस्थ भारत की टीम ने किया है।

महंगी दवाइयो से आजादी के के लिए उठी थी पहली आवाज

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस देश में महंगी दवाइयों के कारण प्रत्येक वर्ष तकरीबन 4 फीसद लोग गरीबी रेखा से ऊबर नहीं पा रहे हैं अथवा यूं कहें कि गरीबी रेखा में ढकेल दिए जा रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दवाइयों के नाम पर अपने देश में किस तरह की लूट मची है। इसी लूट के खिलाफ 22 जून 2012 को सबसे पहले कंट्रोल मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस कैंपेन की शुरूआत हुई। देखते ही देखते महंगी दवाइयों के इस खेल ने देश के लोगों में एक आंदोलन को जन्म दिया। और उस आंदोलन ने आज जनआंदोलन का रूप अख्तियार कर लिया है।

स्वस्थ भारत के लिए कई कैंपेनों की हुई शुरूआत

स्वस्थ भारत अभियान के साथियों का मुख्य मकसद था, लोगों को सस्ती दवा एवं सस्ता ईलाज मुहैया कराना और इस राह में आने-वाले हर कुड़े को साफ करना। इस उद्देश्य को देश की जनमानस ने हाथो-हाथ लिया। एक तरफ मंहगी दवाइयों की कीमते कम होनी शुरू हुई तो दूसरी तरफ अभियान के साथियों ने जेनरिक मेडिसिन लाइए, पैसा बचाइए कैंपेन की शुरूआत कर दी। अब सरकार पर दो तरफा दबाव था। एक तरफ महंगी दवाइयों की कीमत कम करना तो दूसरी तरफ गुणवत्तायुक्त जेनरिक दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित कराना।

स्वस्थ भारत का मुख्य मकसद

2012 में जो चिंगारी निकली थी, वह नो योर मेडिसिन, नो योर डॉक्टर, नो योर फार्मासिस्ट, हेल्थी गर्ल चाइल्ड हेल्दी सोसाइटी के साथ-साथ स्वस्थ भारत के तीन आयामः जनऔषधि, पोषण एवं आयुष्मान जैसे कैंपेनों के माध्यम से स्वास्थ्य विषयक सही एवं सार्थक जानकारी को आग की तरह देश में फैलाने का काम कर रही है।

यूनिक बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्वस्थ भारत

स्वस्थ भारत अभियान के साथी स्वास्थ्य का संदेश एवरेस्ट की उच्ची चोटी से देते हैं तो कभी समुद्र के नीचे साइकिल चलाकर। स्वस्थ भारत की टीम ने दो बार देश-भर की यात्रा कर के तकरीबन 3 लाख लोगों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित किया है। अपने साहसिक एवं इनोविटिव कृत्यों के कारण ही स्वस्थ भारत का नाम यूनिक बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है। 2015 के 28 अप्रैल को स्वस्थ भारत अभियान के साथियों ने एक संस्था बनाई जिसका नाम रखा ‘स्वस्थ भारत’। तब से यह संस्था इस अभियान को तीव्रता प्रदान करने में लगी है।

आपने तो सुना ही होगा….

कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों…

सच में स्वस्थ भारत की टीम स्वास्थ्य रूपी पत्थर को तबीयत से उछालने में लगी है और इस टीम का हर सदस्य यहीं गुनगुना रहा है कि ….कर हर मैदार फ़तह रे बंदिया….

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