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कोरोना: चुनौती नहीं अवसर है

कोरोना-काल में भारत में निवेशकों को बुलाने का समय है। इस समय को आर्थिक-अवसर के रूप में रेखांकित कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सांसद आर.के. सिन्हा

नई दिल्ली/ एसबीएम विशेष
वैश्विक महामारी कोरोना के कारण सारी दुनिया के हाथ-पैर फूल गए हैं। धरती पर भय और त्रात्रि-त्राहि के हालात बन चुके हैंI तब भारत के लिए एक अवसर बन रहा है। अवसर यह है कि भारत दुनिया का मैन्यूफैक्चरिंग हब बन सकता है। भारत चाहे तो चीन के खिलाफ दुनिया की नफरत का इस्तेमाल अपने लिए एक बड़े आर्थिक अवसर के रूप में कर सकता है। इस बेहतरीन मौके को किसी भी सूरत में भारत को छोड़ना नहीं चाहिए। यह ऐसा  वक्त है जब देश के नीति निर्धारकों को बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आकर्षित करने के उपाय तलाशने होंगे।
पर क्या ये संभव है? असंभव तो दुनिया में कुछ भी नहीं है। पर  इसके लिए भारत के सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार और लालफीताशाही पर हल्ला बोलना होगा। सरकारों को इस दिशा में कठोर कदम उठाने होंगे। काहिल और निकम्मे सरकारी अफसरों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई करनी होगी। निवेश संबंधी नियमों को सरल और लचीला बनाना होगा। विदेशी निवेशकों का यथोचित सम्मान करना होगा जो हमारे यहां निवेश करने के इरादे से पूंजी लेकर आते हैं। उन्हें सारी सुविधायें मुहैया करवानी पड़ेगी। उन बाबुओं को प्रोत्साहित भी करना होगा जो श्रेष्ठ कार्य करते हैं।

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चीन-जापान से कैसे आए बड़ा निवेश
कोविड-19 के बढ़ते असर के बीच खबरें आ रही हैं कि जापान ने चीन से अपने कारोबार को समेटने की घोषणा भी कर दी है। यही अमेरिका से सैकड़ों कंपनियों ने किया है जो चीन में अभी उद्योग चला रहे हैं। भारत के जापान के साथ बहुत ही मधुर संबंध हैं। जापान भारत में तगड़ा निवेश भी करता है। जापान भारत को भगवान बुद्ध की धरती होने के चलते भी बेहद आदर से देखता है। जापान भारत में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को शुरू करवा रहा है। इस परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिए जापान ने भारत के साथ जो समझौता किया है वह भी सिद्ध करता है कि जापान भारत को अपना घनिष्ठ मित्र मानता है। जापान दूसरे देशों को जिस दर पर ऋण देता है उससे काफी कम दर पर भारत को मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए ऋण दे रहा है। यह निश्चय ही सामान्य बात नहीं है। नई वैश्विक परिस्थितियों में यह जरूरी है कि भारत अपने को तैयार कर ताकि जापान जिस निवेश को चीन से बाहर लेकर जा रहा है, उसे भारत में शिफ्ट कर दे। कम से कम एक बड़े हिस्से को तो  भारत में ले ही आए।

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पर बात फिर वहीं पर आ जाती है कि जापान, वियतनाम, ताईवान और दक्षिण कोरिया जैसे धनी देश जो बुद्ध के अनुयायी हैं, भारत में बड़े निवेश के लिए तैयार हो सकते हैं अगर हम भी अपने को थोड़ा सुधार लें। हमें इन देशों को यहां बेहतर माहौल देना होगा। क्या हम उन्हें उत्तम माहौल दे सकेंगे? बुरा मत मानिए, इस मोर्चे पर अभी तक तो हम कमजोर साबित हो रहे हैं।
क्यों चीन से जा रहे हैं कोरियाई निवेशक
कोविड-19 के हमले से पहले ही दक्षिण कोरिया की सैकड़ों कंपनियों ने चीन से बोरिया –बिस्तरा बांधना शुरू कर दिया था। वे आसियान देश वियतनाम की ओर का रुख करने लगी थीं। ये भारत में मोटा-मोटी इसलिए ही नहीं आ रही हैं, क्योंकि हमारे यहाँ तो विदेशी निवेशकों को चूसने-नोचने की कोशिश होती रहती है। भ्रष्ट बाबू और जटिल प्रक्रियाएं निवेशकों को भारत की बजाय वियतनाम लेकर जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस समय दक्षिण कोरिया से 7000 से अधिक कंपनियां वियतनाम में निवेश कर चुकी हैं। जरा सोचिए कि अगर इतनी कोरियाई कंपनियों ने भारत में निवेश किया होता तो भारत की किस्मत अबतक चमक गई होती। यहां के करोड़ों नौजवानों को रोजगार मिल गया होता। पर हमने यह बेहतरीन अवसर को गंवा दिया। हां, यह सच है कि भारत में लगभग 700 दक्षिण कोरिया की कंपनियां निवेश कर चुकी हैं। पर 7 हजार और सात सौ में बड़ा अंतर होता है। भारत में कोरियाई कंपनियों के निवेश पर नजर रखने वाले कई जानकारों ने मुझे बातचीत में कहा कि पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान भारत का प्रशासन तंत्र चीन में काम करने वाली जापानी और कोरियाई कंपनियों को भारत में निवेश करने की बाबत बुलाने में असमर्थ ही रहा। कोरियाई कंपनियां दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में निवेश करने को इच्छुक थीं।

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भारत में दक्षिण कोरियाई दूतावास के राजनीतिक मामलों के मंत्री यू चंग-हो कहते हैं कि कोरिया की कंपनियों को मुख्य रूप से दो कारणों के चलते चीन को छोड़ना पड़ा। पहला, चीनी कंपनियां कोरिया की कंपनियों की टेक्नालाजी की नकल कर  लेती है। दूसरा, चीन में अब कोरियाई कंपनियों की श्रमिक लागत बढ़ती ही चली जा रही थी।
पर यह बात भी नहीं है कि भारत के हाथ से सारे अवसर निकल गए हैं। यदि ठोस कोशिश हो तो हम एक बार फिर से जापान और दक्षिण कोरिया से अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के बड़े निवेशकों को अपनी तरफ खींच सकते हैं। भारत विगत तीन दशकों में आईटी और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्रों में एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा है। अगर बात मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की करें तो महाराष्ट्र में चाकण,  कर्नाटक में होस्पेट, हरियाणा में मानेसर, उत्तर प्रदेश में ग्रेटर नोएडा,हिमाचल में बद्दी जैसे शहर मैन्यूफैक्चरिंग गतिविधियों के हब बन चुके हैं। अगर ये मैन्यूफैक्चरिंग हब बन रहे हैं तो इसके मूल में बड़ी वजह इन राज्यों का अपने यहां पर उद्योगों को तमाम सुविधाएं देने की कोशिश ही तो है। इनमें टैक्स छूट से लेकर सड़क-रेल यातायात की उत्तम व्यवस्था का होना है।
ग्रेटर नोएडा में इलेक्ट्रानिक सामान और आटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े उत्पादों का उत्पादन हो रहा है। इधर दक्षिण कोरिया की एलजी इलेक्ट्रानिक्स, मोजर बेयर, यमाहा, न्यू हालैंड ट्रेक्ट्रर्स, वीडियोकॉन इंटरनेशनल, श्रीराम होंडा पॉवर इक्विमेंट तथा होंडा सिएल कारों का उत्पादन हो रहा है। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों की चोटी की कंपनियां हैं। अब अगर बात हरियाणा के प्रमुख औद्योगिक शहर मानेसर की करें तो मानेसर में आटो और आटो पार्ट्स की अनेक इकाइयां खड़ी हो चुकी हैं। इनमें मारुति सुजुकी, होंडा मोटर साइकिल एंड स्कूटर इंडिया लिमिटेड शामिल हैं। इनमें भी देश के हजारों लोग काम करते हैं। मानेसर को आप उत्तर भारत का श्रीपेरम्बदूर मान सकते हैं। तमिलनाडू के श्रीपेरम्बदूर में भी आटो सेक्टर की कम से 12 बड़ी कंपनियां उत्पादन कर रही हैं।
अंत में उदाहरण लेते हैं महाराष्ट्र के चाकण का। चाकण मुंबई से 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पर बजाज आटो तथा टाटा मोटर्स की इकाइयां है। आप समझ सकते हैं कि इन दोनों बड़ी कंपनियों की इकाइयों के आ जाने के बाद चाकण अपने आप में एक खास मैन्यूफैक्चरिंग हब का रूप ले चुका है। महिन्द्रा समूह  भी चाकण में अपनी इकाई स्थापित करने जा रहा है। वाल्कसवैगन भी इधर आ चुकी है। ये भी आटो सेक्टर की विशाल कंपनी है।
दरअसल इन उदाहरणों को देने के पीछे मकसद यह है कि किसी भी देश या राज्य में निवेशक तभी आता है जब उसे विभिन्न प्रकार की सुविधाएं मिलती हैं। उपर्युक्त हब में देसी-विदेशी निवेश इसलिए आ रहा है, क्योंकि इन राज्यों ने निवेशकों के हक में माहौल बनाया है।
क्या कोविड-19 से पैदा हुए हालातों के आलोक में भारत विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए यत्न करेगा?  बेशक करना ही तो चाहिए। हो भी रहा होगा। याद रख लें कि बिना विदेशी निवेशकों के कोई भी देश तेजी से प्रगति के पथ पर नहीं चल सकता है।
 
(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
 
 

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