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उज्ज्वल भविष्य के लिए जरूरी है नई कार्य-संस्कृति अपनाना

कोरोना-काल को एक अवसर के रूप में देखते हुए नई कार्य-संस्कृति को अपनाने पर जोर दे रहे हैं वरिष्ठ स्तंभकार एवं पूर्व सांसद आर. के. सिन्हा

नई दिल्ली/एसबीएम विशेष

चुनौती को अवसर बनाएं

जब कभी भी किसी के जीवन में किसी भी प्रकार की चुनौती सामने आती है तो चुनौती के दो पहलू होते हैं। एक तो खतरा होता है और दूसरा अवसर होता है। उदाहरण के स्वरूप मान लीजिए कि आपका मोबाईल फोन है। इस अनुसंधान में एक अवसर उत्पन्न किया है कि आप कहीं से और किसी से भी बात कर सकते हैं। वीडियो कॉल कर सकते हैं। फोटो भेज सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक खतरा भी जुड़ा हुआ है। इस मोबाईल फोन का कोई दुरूपयोग भी कर सकता है। आपके बैंक खाते में कोई हेरफेर भी तो कर सकता है। आपके नाम से गलत सन्देश भी दुनिया भर में भेजा जा सकता है। इसीलिये किसी भी ऐसे चुनौती को हमें स्वीकार जरूर करना चाहिए और उसके द्वारा उपलब्ध कराये अवसरों का पूरा उपयोग भी जरूर करना चाहिए। किन्तु खतरों से जरूर सावधान रहना चाहिए। आज कोरोना ने एक बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न किया है समाज के लिए। लेकिन, जरा सोचिए-कितना बड़ा अवसर भी तो प्रदान किया है कोरोना ने। आज लॉकडाउन में हम सभी घर पर हैं। आप भी घर पर हैं। मैं भी घर पर ही हूँ। क्योंकि कोरोना से निबटने का एक ही तो उपाय है, सोशल डिस्टेंसिंग।

अब जाकर अपनों से मिल पाने का समय मिला है

9 अप्रैल,2020 तक मैं सांसद था। 2014 अप्रैल से अभी तक जब मैं संसद जाता था, तो सुबह उठने के साथ संसद के कागजातों में उलझा रहता था। किसी तरह नहा-धोकर अपने नॉएडा आवास से तैयार होकर रास्ते में गाड़ी ही में जलपान करता हुआ संसद किस तरह समय से पहुंचू इसकी जल्दी में लगा रहता था। फिर दिन में संसद और अपने सरकारी आवास का दिन भर चक्कर लगा ही रहता था। रात में आठ बजे, कभी 10 बजे तथा कभी-कभी 12 बजे जब अपने नोएडा निवास स्थान पर लौटकर आता था तो सिवाय श्रीमती जी से मिलने के और किसी से भेंट  भी नहीं होती थी। बेटा, बहू, पोता, मेरी पोतियां इनके तो दर्शन कभी होते नहीं थे। कभी-कभी स्कूल जाने के पहले यदि मैं संसद के लिए निकल नहीं गया होता था तो हमारे पास बच्चे आकर सिर्फ एक मिनट के लिए गुड मार्निंग करने आते थे।

इस आनंद की अनुभूति को क्या नाम दूं

अब, देखिए कैसा परिवर्तन आया है। मैं आपको बताता हूँ मेरी शादी के 45 वर्ष हो गये। आज तक मैंने अपनी श्रीमती जी के साथ पूरा एक महीना कभी भी नहीं बिताया है। बच्चों के साथ तो कोई सवाल ही नही हैं। अब मेरे इस आनन्द की अनुभूति कीजिए। लॉकडाउन के शुरू होने के बाद शुरू के दो-चार रोज तो ऐसा लगा कि काम कैसे होगा। फिर मैंने अपने जीवन का ढांचा बदला या दिनचर्या खुद बदल गई। सुबह पहले की तरह से नहा-धोकर तैयार होता हूँ। पूजा-पाठ करके, जलपान करके अपने घर में ही मेरा जो कार्यालय का कमरा है उसमें आकर बैठ जाता हूँ। फिर इंटरनेट खोलकर मेल चेक करके, ई-मेल करके पूरे पत्राचार, फोन कॉल वीडियो कॉल से बातें करता रहता हूँ। प्रतिदिन एक लेख लिखता हूँ। लॉकडाउन है, अतः उनको डिक्टेशन भी रिकॉर्ड करके भेजता हूँ और जब वे ड्राफ्ट मेल करते हैं तो उसमें संशोधन कर लेख समाचार पत्रों को भेजा जाता है, जिसे आप दूसरे  दिन सुबह उठते ही पढ़ लेते हैं। पूरा एक महीना कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। काम में कोई अवरोध हुआ ही नहीं। स्वास्थ्य भी कहें तो पहले से बेहतर ही है। सारा खान-पान भी शुद्ध रूप से घर का ही है। समय से मिल जाता है उसका आनन्द अलग है। बच्चों के साथ समय बिताने का आनन्द और उसकी अनुभूति का कहना ही क्या ?

प्राकृतिक हुई है दुनिया

अब दुनिया का हाल देखिए। सड़कों पर गाड़ियां नहीं चल रही है। प्रदूषण का स्तर नीचे जा रहा है। नदियां भी साफ हो रही हैं। नीलगाय और हिरण सड़कों पर स्वछन्द घूम रहे हैं। सुबह-शाम पक्षियों की चहचकाहट कानों में गूंजती रहती है। नीला आसमान देखने को मिलता है। सूर्योदय और सूर्यास्त देखने का अलग ही आनन्द है। पहले कभी-कभी सूर्योदय तो देख भी लेता था, सूर्यास्त तो संसद में ही बीत जाता था। लेकिन, अब अपनी बालकॉनी में खड़ा होकर उसका आनन्द लेता रहता हूँ। कभी–कभी श्रीमती जी और बच्चे भी प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने चले आते हैं। आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि जो आंकड़े अस्पतालों से प्राप्त हो रहे हैं उसके हिसाब से सांसों से सम्बंधित और हृदयघात की बीमारियों के जो केस अस्पतालों में आते थे या भर्ती होते थे, उनमें 40 प्रतिशत कमी हो गयी है। यह मैं नहीं कह रहा हूँ। ये एम्स के डाक्टर कह रहे हैं। जब गाड़ियां सड़क पर नहीं चल रही है तो लगभग देश में प्रति मिनट जो एक व्यक्ति की मौत होती थी दुर्घटना से, वह लगभग बंद हो गयी है। बच्चे बहुत आराम से और समय से घर पर ही ऑनलाइन क्लासेज कर रहे हैं। उनकों इसमें आनन्द भी आ रहा है। मम्मियां भी साथ क्लास कर लेती हैं तो होमवर्क पूरा करवाने में आसानी हो रही है।

संयुक्त परिवार का मर्म समझ में आया है

बच्चों ने इसके पहले कभी दादा-दादी का प्यार समझा ही नहीं था। अब वे उधम भी मचा रहे हैं, कहानियां भी सुना रहे हैं और सुन भी रहे हैं। शायद धरती माता ऐसा ही परिवर्तन का इंतजार कर रही थी। यह ठीक है कि बहुत से होटलों में, रेस्तरां के कामों में कमी आयी है। मानता हूँ कि चाट-पकौड़ों के ठेले नहीं है। वह अब घर में ही बनता है। मेरी दोनों पोतियों में स्पर्धा इसी बात की रहती है कि कौन बेहतर व्यंजन बनाकर दादा-दादी को खिलाये। लेकिन, जो दफ्तरों में जाने की भागदौड़ मची रहती थी और जगह-जगह जाम लगा रहता था दफ्तर जाने के वक्त या दफ्तर छूटने के वक्त, वह तो समाप्त हो गया हैं। लगभग सभी दफ्तरों में जो कुल हजारों लाखों टन क्षमता वाले एयर कंडीशनर लगी हुई थी और उससे जो वातावरण में गर्म हवा निकल कर जा रही थी और उससे जो प्रदूषण फैल रहा था, उसमें तो कमी आ ही गयी है। इन सारे परिवर्तनों को भी देखने की जरूरत है।

कार्य संस्कृति में बदलाव अच्छा है

मैं एक मीडिया संस्थान का अध्यक्ष भी हूँ। मेरी न्यूज़ एजेंसी हजारों समाचार पत्रों में समाचार भेजने के अतिरिक्त देश भर के आकाशवाणी केन्द्रों और दूरदर्शन केन्द्रों की बुलेटिन के लिए भी समय से समाचार पहुँचाने का काम करती है। जब यह लॉकडाउन हुआ तो हमने सोचा कि किस प्रकार से हम अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा कर पायेंगे ? क्योंकि, प्रत्येक भाषा में कम से कम 100 समाचार प्रतिदिन होने ही चाहिए और सुबह से देर रात तक हर बुलेटिन के लिये खबरें चाहियें। खैर हमलोगों ने लॉकडाउन के बाद आपस में वीडियो कांफ्रेंसिंग की। विमर्श किया और योजना बनाई। आपको बताते हुए हर्ष होता है कि लॉकडाउन की अवधि में हमारे सारे पत्रकार सहकर्मी पहले से बढ़िया काम कर रहे हैं और समाचारों की संख्या का टारगेट अच्छी तरह प्रतिदिन पूरा भी कर रहे हैं। समाचारों की गुणवत्ता भी बढ़ी है। इसका अर्थ यह है कि आप यदि सतर्क हैं, सजग हैं, समझदार हैं और जानकार हैं, तो घर से काम करने में कोई दिक्कत है ही नहीं।

हां, काम समझदारी से करना होगा और बेडरूम में सोकर नहीं करना होगा। अलग कमरा न हो तो किसी कमरे में एक अलग डेस्क तो होना ही चाहिए जहां से यह काम औपचारिक रूप से हो सके। जब व्यक्ति डेस्क पर बैठ जाये तो उसे और उसके परिवार के सभी सदस्यों को महसूस होना चाहिए कि अब ऑफिस का काम हो रहा है। इतना ही तो करना है ।

अब मैं बात करता हूँ कोरोना से उत्पन्न इस महान अवसर की। जो कार्य-संस्कृति के बदलाव के रूप में दिखने लगा है। एक नयी कार्य संस्कृति ने जन्म ले लिया है इस कोरोना काल में। मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि पिछले सप्ताह हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी सोशल मीडिया साईट लींकडेन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए यह कहा था कि कोरोना काल को एक अवसर मानकर नयी कार्य संस्कृति अपनाने में कोई हठ नहीं होना चाहिये। प्रधानमंत्री ने इस नई कार्य संस्कृति को एक नई परिभाषा भी दी है। उन्होंने कहा है “एईआईओयू” के रूप में इसका नामकरण भी किया है। “ए” से एडाप्टीबिलिटी यानि अनुकूलता। “ई” एफिसिएन्सी यानि कार्यदक्षता। “आई” से इन्क्लूसिविटी यानि कि समावेशीकरण। “ओ” से ओपेरच्यूनिटी यानि कि अवसर और “यू” से यूनीवर्सिलिज्म  जिसको सार्वभौमिकता कह सकते हैं।

पूरी दुनिया एक परिवार है

भारतीय संस्कृति में पूरा विश्व ही एक वृहद् परिवार है। देखिए कितनी अच्छी बात है। आप घर से काम करें और इस नये अवसर को अपनायें या ग्रहण करें। अपने को इस नई कार्य संस्कृति के अनुकूल बनायें और दक्षतापूर्वक तथा सफलतापूर्वक काम करें। काम करने में बेइमानी बिलकुल नहीं करना है। आठ घंटे जिस प्रकार आप दफ्तर में बैठकर काम करते हैं उसी प्रकार कम से कम आठ घंटे अपने घर में बैठ कर काम करें और समावेशी काम करें। आप इस बात को पूरा ध्यान में रखें कि आपके कार्य करने से सबको फायदा हो रहा है कि नहीं। सिर्फ अपने फायदा के लिए मत सोचें। अवसर का पूरा उपयोग करें। सार्वभौमिकता को ध्यान में रखकर काम करें। आपको यह बता दें कि आज तक जितनी लड़ाईयां लड़ी गयी हैं उसमें एक देश ने दूसरे देश के विरूद्ध ही लड़ाईं लड़ी है या कुछ देशों ने मिलकर कुछ अन्य देशों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी है।

यह पहली लड़ाई है जिसे दुनिया ‘बसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा के साथ लड़ रही है

प्राचीन ऐतिहासिक काल से लेकर आप महाभारत से ले लें। शक, हूण, कुशान, मुगल, अंग्रेज और प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध तक चले जायें। सबों में एक दूसरे के विरुद्ध लड़ाई दिखती है। लेकिन, यह पहली लड़ाई है जिसमें पूरा विश्व लड़ाई लड़ रहा है और सभी साथ मिलकर लड़ रहे हैं। सबका दुश्मन एक ही  है कोरोना। सब एक दूसरे की मदद से अवसर का उपयोग भी कर रहे हैं। कार्य दक्षता भी बढ़ा रहे हैं और कोरोना को हराने के लिए हर संभव उपाय कर रहे हैं। क्या हम इस नये प्रौद्योगिकी के युग में एक नई कार्य संस्कृति का जन्म नहीं दे सकते। हमारे नौजवान वैज्ञानिकों को इस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए।

कार्य-संस्कृति में बदलाव प्रकृति के पक्ष में है

मैं यह नहीं कहता हूँ कि सातों दिन आप घर से ही काम करें। लेकिन, यदि देश के सभी कार्यालय सोमवार से लेकर रविवार तक किसी नियम के तहत यह बांट लें कि किसका कार्यालय सोमवार को खुलेगा, किसका बुधवार को या किसका रविवार को। वे उसी दिन कार्यालय जायें सिर्फ हफ्ते भर का रिपोर्ट देने के लिए और अगले हफ्ते भर का काम समझने के लिए। यदि ऐसा होगा तो कार्यालय भी छोटा ही रखने की जरूरत पड़ेगी। एक बड़ा कांफ्रेंस रूम, एक या दो छोटे मीटिंग रूम। यही कार्यालयों का स्वरूप हो जायेगा। क्या जरूरत है 100 से 200 डेस्क और  कम्प्यूटरों को रखने की। दो सौ एयर कंडिशनर की भी कोई जरूरत नहीं होगी। सारे कार्यालय सात दिन यदि बांटकर कर काम करेंगे तो यातायात का बोझ भी 14 प्रतिशत ही रह जायेगा। सड़के साफ-सुथरी भी रहेगीं। प्रदूषण भी कम फैलेगा। दुर्घटनाएं भी बहुत ही कम होगी। फैक्ट्रियों में भी हम जहां एक शिफ्ट में काम कर रहे हैं अगर उसी को तीनों शिफ्टों में बांटकर काम करें तो क्या हमारा कार्यभार कम नहीं होगा? क्या इससे उत्पादन नहीं बढ़ेगा। कार्यदक्षता नहीं आयेगी। ऐसा अवश्य होगा। हमें बस आवश्यकता एक ही चीज कि है कि इस प्रौद्योगिकी के बदलाव का असर गरीबों के जिंदगी पर न पड़ने दें। यह जरूर देंखे कि उनका जीवन यापन भी सही ढंग से चलता रहे। आज चाहे अमीर हो या गरीब सभी मोबाईल का इस्तेमाल कर रहे हैं। सभी यू-टयूव देख रहे हैं। वाट्सअप कर रहे हैं। थोड़ा सा और उन्हें प्रशिक्षित कर दीजिए तो वे भी प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल आसानी से सीख ही जायेंगे।

एक नया अवसर आया है कोरोना के रूप में। इस अवसर को मजबूती से पकड़ लीजिये, यह ध्यान रहे कि कोरोना आपको न पकड़े और एक नये युग की ओर एक नयी दिशा में मजबूती के साथ नई ऊर्जा और उमंगों के साथ आगे बढ़िये। भारत का भविष्य उज्ज्वल है।

 

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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1 comment

Priyanka April 24, 2020 at 3:53 pm

🙏🙏🙏🙏 pranam sir

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