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आयुर्वेद में सियाटिका और उसके उपचार

डॉ. दिनेश्वर प्रसाद

 

पटना। आयुर्वेद में 80 प्रकार के वातरोग बताये गये है, जिसमें गृधसी (सियाटिका) भी एक प्रमुख रोग हैं और आजकल यह काफी लोगों को आक्रांत कर रहा है। सियाटिका कमर से निचले भाग से लेकर दोनों पैर के एड़ी, अंगूठे तक जाने वाला एक नाड़ी है जो बहुतेरे कारणों से कमजोर (पारालाइज) हो जाता हैं या दबने लगता हैं या उसमें एक तरह का खिंचाव होने लगता है जिसके कारण उस नाड़ी में दर्द होने लगता हैं। कभी-कभी असहनीय पीड़ा होने लगती हैं।
यह रोग कभी-कभी पीठ पर चोट लगने से, ऊंचे-नीचे पर एकाएक पैर लड़खड़ाने या उस पर दबाव पड़ने, कुछ एक व्याधियों के उपद्रव के कारण हो जाया करता हैं। मधुमेह (चीनी रोग) गठिया (आमवात) रुमेटवायड अर्थराइटिस या वातरक्त (गाउट) लम्बे से कब्ज होने के कारण भी होता हैं। इसका दर्द प्रायः कमर से प्रारंभ होकर पूरे साइटिका नाड़ी तक जाता हैं। प्रायः शुरू में एक पैर से ही प्रारंभ होता हैं पर बाद में दोनों पैर को आक्रांत करता है। सोने, बैठने या आराम करने पर कम एवं ज्यादा देर तक खड़ा रहने पर या चलने पर इसका दर्द बढ़ जाया करता हैं।
इसमें वात के साथ कफ का भी समावेश होता हैं। इसलिए कमर के निचले या बगल के भाग से जंघा और पैर में दर्द के साथ उसमें एक तरह का खिंचाव होता हैं। सामान्यतः यह किसी जांच, एक्सरे से भी पकड़ में नहीं आता है। MRI कराने पर डॉक्टर समझ पाता हैं। कभी-कभी इसके प्रभाव से पूरा शरीर क्रियाहीन हो जाता हैं। इसके कारण शरीर के निचले भाग में चेष्ठा का नाश, पीड़ा, शोक स्तम्भ, हाथ-पैर की अंगुलियों में खिंचवा, सुई चुभने जैसा दर्द, पैर, कमर में टेढापन, रोग बढ़ने पर मुंह से लार आने की शिकायत, मानसिक तनाव, भूख की कमी या भूख रहने पर भी खाने की इच्छा का ना होना इत्यादि लक्षण देखने को मिलते हैं।
आयुर्वेद एवं एलोपैथ, दोनों के अनुसार यह दो प्रकार का होता है जिसमे भेद करना बड़ा कठिन होता हैं। कभी-कभी महिलाओं में प्रसव, विशेष रूप से सिजेरियन ऑपरेशन के बाद या उस समय बेहोश करने के लिए सूई देने वाले स्थान से भी होता है। इससे बचाव के लिए मालिश, सेक, अण्डी तेल या अणडी का हलवा से जुलाव यानी विरेचन कराने पर अथवा निर्गुंडी, अण्डी, हरश्रृंगार के काढा को लगातार पीने या पंचकर्म चिकित्सा से ज्यादा लाभ होते देखा गया है। पंचकर्म में विशेष रूप से स्नेहन, स्वेदन, स्नेह विरेचन, शिरोविरेचन, रक्त मोक्षण, अग्नकर्म, शिराभेद, मर्म इत्यादि क्रियायो के साथ वातनाशक, या वातकफज होने पर वातकफ नाशक औषधियों एवं बल देने वाली औषधियों का प्रयोग करने एवं योगासन तथा एक्सरसाइज के नियमित प्रयोग से यह पूर्णतः ठीक हो सकता हैं।
इसमें वातवर्धक आहार-विहार से बचाव भी किया जाना चाहिए।

(लेखक जाने-माने आयुर्वेद डॉक्टर हैं। ये कई वर्षों तक पटना एवं दरभंगा आयुर्वेद कॉलेज के प्राचार्य रहे हैं। अमृत आयुर्वेद के फाउंडर भी हैं।)

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