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फार्मासिस्टों के निबंधन में भारी फर्जीवाड़ा

फार्मासिस्टों के निबंधन में भारी फर्जीवाड़ा

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। देश में दवा की दुकानों के लाइसेंस फार्मासिस्ट को ही दिए जाते हैं। या फिर ऐसे विक्रेता जिनकी दुकान पर फार्मासिस्ट नियमित बैठता हो। यहीं स्पष्ट है कि गुण्वत्ता का ध्यान रखने के लिए सिस्टम ने कैसी अच्ठी व्यवस्था बनाकर रखी है। इनका लाइसेंस राज्यों में स्थापित फार्मेसी काउंसिल बनाती है। दुर्भाग्य यह कि सब जगह फर्जीवाड़ा का बोलबाला है। कोई एक्शन लेने वाला भी नहीं है।

फामासिस्ट : कई राज्यों में अनियमितता

जानकारी के मुताबिक बिहार से अलग होकर बने झारखंड में 6000 पंजीकृत फार्मासिस्ट हैं जबकि इससे दोगुने मेडिकल स्टोर हैं। झारखंड का मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंचा था जहाँ राज्य सरकार नियमविरुद्ध रजिस्ट्रेशन ट्रिब्यूनल चला रही थी जबकि फार्मेसी एक्ट 1948 के अनुसार नया राज्य बनने के तीन वर्ष के भीतर फार्मेसी काउंसिल का गठन करना अनिवार्य होता है। इसी तरह मध्यप्रदेश फार्मेसी काउंसिल में 2012 से कोई चुनाव ही नहीं हुआ है। नतीजतन कौंसिल में सरकार ने एक व्यक्ति को लगातार अध्यक्ष नियुक्त करके रखा है। रजिस्ट्रार उधारी का है जो ऑफिस आते ही नहीं जिसके कारण कार्यालय को मिले 12000 आवेदनों में केवल 1200 का पंजीयन हो पाया है। छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल में भी रजिस्ट्रार की नियुक्ति नियम विरुद्ध की गई है। जानकार बताते हैं कि कौंसिल की राशि की हेराफेरी की जा रही है। सैकड़ों फर्जी पंजीयन पर पूर्व रजिस्ट्रार ने मुकदमा भी करवाया था। 12 लोगो को जेल भी भेजा गया है। 4000 हज़ार पंजीयन अनुभव आधारित है जिसके दस्तावेज काउंसिल के पास उपलब्ध नहीं हैं। 6000 पंजीयन लाइफ टाइम कर दिया गया है जिसमें कितने जीवित हैं, कितने नहीं, कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। साथ ही कौंसिल को हर साल 18 लाख रुपये का नुकसान भी हो रहा है।

फार्मासिस्ट : बिहार में तो गजब का खेला

बिहार का किस्सा तो और गजब का है। बिहार फार्मेसी काउंसिल में फॉर्मासिस्टों के निबंधन और रिन्युअल में भी फर्जीवाड़ा हुआ है। यहां सौ वर्ष से अधिक उम्र के सैकड़ों फार्मासिस्ट भी हर साल अपना सर्टिफिकेट रिन्युअल करा रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले फार्मासिस्टों का निबंधन और रिन्यूअल 1952 से अब तक बिना पर्याप्त जांच के हो रहा है। इस दौरान हजारों फर्जी प्रमाणपत्र धारकों को न सिर्फ रजिस्टर्ड किया गया, बल्कि हर साल उनके लाइसेंस का नवीनीकरण भी हो रहा है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और पटना हाईकोर्ट के आदेश पर काउंसिल ने कई को हटाने का निर्णय लिया है। हालांकि वास्तविक कार्रवाई कभी नहीं की गई। जबकि फार्मेसी एक्ट की धारा 45 (5) के अनुसार फर्जी निबंधनों की जांच के लिए आयोग गठित कर जांच कराई जाए। हालात यह है कि निबंधित 31,709 फार्मासिस्टों में से केवल 6,000 ने ही नियमित रिन्युअल कराया है। बाकी 25,709 फार्मासिस्ट में 10 हजार से अधिक संदिग्ध हैं। जो या तो फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर पंजीकृत है या वर्षों से निष्क्रिय हो चुके हैं।

फार्मासिस्ट : उम्रदराज भी सूची में

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार करीब 800 ऐसे फार्मासिस्ट हैं, जिनकी उम्र 100 साल से भी अधिक हो चुकी है, लेकिन उनके लाइसेंस हर साल रिन्युअल हो रहा है। उदाहरण के तौर पर तजमुल हसन (निबंधन संख्या 1487, जन्म वर्ष 1896) का लाइसेंस अब भी नवीनीकृत हो रहा है। इसी तरह 1901 से 1904 के बीच जन्में सैकड़ों मृत फार्मासिस्ट कागजों पर अब भी ‘सक्रिय’ है। सबूत मिटाने की साजिश के तहत पुराने निबंधनों से जुड़े सीरीज रजिस्टर गायब कर दिए गए हैं। कई निबंधन सिर्फ अनुभव पर तो कई चिकित्सकों के प्रमाणपत्र के आधार पर हुए हैं। बंगाल फार्मेसी काउंसिल से ट्रांसफर कराए गए हजारों रजिस्ट्रेशन में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गयी है। कम से कम 5,000 फार्मासिस्ट ऐसे हैं, जिनकी डिग्रियां को विभाग भी फर्जी मानता है।

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