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बरसात में पेट की समस्या का आयुर्वेद में सुरक्षित निदान

वैद्य (प्रो) दिनेश्वर प्रसाद

बरसात में पेट की समस्या का आयुर्वेद में सुरक्षित निदान

पटना। वर्षा ऋतु, आयुर्वेद के अनुसार आदान काल के पश्चात आने वाली ऋतु है जिसमें सूर्य की ऊर्जा और तेज कमजोर होता है तथा वातावरण में आर्द्रता और नमी अधिक होती है। इस ऋतु में पाचन की अग्नि मंद पड़ जाती है और वात दोष प्रबल हो जाता है। जलवायु में अस्थिरता, भारी आहार, दूषित जल, नमी एवं स्वच्छता की कमी से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। वर्षा ऋतु में मुख्य रूप से निम्न प्रकार के रोग होते है, जिनका कारण एवं आयुर्वेदिक दृष्टिकोण इस प्रकार का होता है।

अजीर्ण (अपच या अनपच) को कहा जाता है। वर्षा ऋतु में अग्नि मंद हो जाती है, जिससे पाचन क्षमता घट जाती है। प्रायः भारी, चिकनाईयुक्त, बासी या दूषित भोजन करने से अजीर्ण उत्पन्न होता है। पेट में भारीपन, भूख न लगना, डकारों का न आना, कब्ज या दस्त की स्थिति बनती है।इस रोग में उपचार के लिए: त्रिकटु चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, हिंगवाष्टक चूर्ण आदि डॉक्टर के परामर्श से दिया जा सकता है। साथ साथ भोजन में हल्का सुपाच्य भोजन (जैसे मूंग की खिचड़ी) एवं अदरक-नींबू को सेवन लाभकारी है।
ज्वर (बुखार) वर्षा ऋतु में वात व कफ के साथ आम का संयोग होने से विषमज्वर (मलेरिया टाइफाइड जैसे लक्षण) से युक्त वातज या कफज ज्वर उत्पन्न होते हैं। बुखार के साथ शरीर में थकान, कंपकंपी, सिरदर्द व पसीना हो सकता है। इस तरह के बुखार होने पर उपचार के रुप में संजीवनी वटी, अमृता (गिलोय) क्वाथ, सुदर्शन चूर्ण, त्रिभुवन कीर्ति रस का प्रयोग किसी योग्य वैद्य की देखरेख में करना चाहिए।
अतिसार (दस्त/डायरिया डिसेन्टरी) यानि पेचिस दूषित जल और गलत भोजन के कारण होता है। बार-बार पतला मल आना, पेट में मरोड़, कमजोरी इसके सामान्य लक्षण हैं। समान्यतः वात या कफ दोष के कारण यह विकृति उत्पन्न होती है। इस तरह की समस्या होने पर उपचार के रूप में बेलगिरी का चूर्ण, नागकेशर चूर्ण, मुस्ता चूर्ण, वत्सकादि क्वाथ के साथ पानी के स्थान पर बेल पानी, नारियल पानी व सादा छाछ उपयोगी होता है।
संधिवात/आमवात/गठीया सायटिका इत्यादि (वात रोग) वर्षा ऋतु में वातवर्धन के कारण होता है। जोड़ों में दर्द, अकड़न, सूजन, चलने-फिरने में कठिनाई जैसे लक्षण प्रकट होते हैं। यह रोग प्रायः उन व्यक्तियों में होता है जो वर्षा या आलस्य के कारण घूमने—फिरने कोताही करते हैं। इस तरह के रोग या लक्षण होने पर डाक्टर के परामर्श से शुठि चूर्ण, त्रिकटु चूर्ण, पंचकोल चूर्ण, योगराज गुग्गुल ईत्यादि दिया जा सकता है।
त्वचा विकार (फंगल इन्फेक्शन खुजली दाद इत्यादि) की तरह के कुछ एक रोग बारिश के कारण शरीर पर नमी बने रहने से त्वचा पर फंगल संक्रमण के कारण होता है। पैरों, जांघों और शरीर के गुप्त स्थानों में लालिमा, खुजली, दाद आदि उत्पन्न हो जाते हैं। इस तरह के रोगों के उपचार के लिए नीम पत्र का उबटन, पंचनिम्बादि क्वाथ, गंधक रसायन, आरोग्यवर्धिनी वटी के उपयोग के साथ साथ शरीर को सूखा व स्वच्छ रखें। सरसो तेल में कर्पूर डालकर पूरे बदन की मालिश और उसके बाद स्नान करना हितकारी है।
प्रतिश्याय, साइनस, नजला (सर्दी-खांसी-जुकाम) वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी और ठंडी हवा के कारण श्वसन तंत्र पर प्रभाव पड़ता है। गले में खराश, नाक बहना, सिर भारीपन रहना जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं। इस तरह के रोगों के उपचार के लिए तालीसादी चूर्ण, सितोपलादि चूर्ण, त्रिकटु, तुलसी-अदरक, गोलकी का काढ़ा। नस्य क्रिया (नाक में तेल डालना) जैसे अणुतेल, पड़विन्दु तेल या शुद्ध तिल तेल अथवा सरसो का तेल नाक में प्रतिदिन सुबह सुबह डालना लाभदायक होता है।

सावधानियां भी बरतें

वर्षा ऋतु में कुछ सुझावों का पालन करना तथा आयुर्वेदिक दिनचर्या एवं सावधानियों पर भी ध्यान देना चाहिए। भोजन हल्का, सुपाच्य, गर्म एवं सात्म्य यानि पचने लायक लें। खिचड़ी, सूप, छाछ, अदरक-नींबू का सेवन करें। बासी, भारी, तला हुआ पैकेट फुड, जंक फुड, फास्ट फुड, कोल्डड्रिंक, आईस या फ्रीज में रखा हुआ भोज्य पदार्थ तथा अत्यधिक मांसाहार से बचें। जल सेवन में भी केवल उबला हुआ या औषध युक्त जल पियें (जैसे सौंफ, जीरा, त्रिफला मिला कर) स्वच्छता का ध्यान रखें, गीले कपड़े तुरंत बदलें। नमी से त्वचा को सुरक्षित रखें। पैरों को धोकर सुखाएं साथ साथ नियमित रूप से योग-प्राणायाम के अन्तर्गत पवनमुक्तासन, वज्रासन, अनुलोम-विलोम जैसे योगासन एवं प्राणायाम भी पाचन सुधारते हैं तथा वात संतुलन में सहायक हैं। पंचकम यदि शरीर में विषाक्तता या वातजन्य जटिल लक्षण हों तो चिकित्सक की देखरेख में बस्ति, स्वेदन व वमन आदि पंचकर्म कराना श्रेष्ठ होता है।

निष्कर्ष

वर्षा ऋतु प्राकृतिक सौंदर्य से भरी होती है, परन्तु शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता इस ऋतु में कमजोर पड़ जाती है। अतः आयुर्वेद की शरण में रहकर, उचित आहार-विहार, औषधि व पंचकर्म के माध्यम से इन रोगों से पूर्णतः बचाव संभव है।

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