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UNICEF: गर्मी की मार भारतीय मासूम बच्चों पर

UNICEF: गर्मी की मार भारतीय मासूम बच्चों पर

नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (UNICEF) की चिल्ड्रन्स क्लाइमेट रिस्क रिपोर्ट 2026 के अनुसार भारत में 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे अत्यधिक गर्मी और सूखे से उत्पन्न खतरों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील और असुरक्षित हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में लगभग 55 फीसद बच्चे जलवायु संबंधी आठ खतरों में से कम से कम तीन के प्रति संवेदनशील हैं-नदी में बाढ़, तटीय बाढ़, कृषि और मौसम संबंधी सूखा, उष्णकटिबंधीय तूफान, लू, अत्यधिक गर्मी, रेत और धूल भरी आंधी। विश्व में लगभग 24 लाख बच्चों में से लगभग 2 अरब (या 83.3 फीसद) बच्चे कम से कम दो (आठ में से) खतरों के संपर्क में हैं, जबकि 11 अरब या 46 फीसद बच्चे कम से कम तीन खतरों के संपर्क में हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के आंकड़ों का उपयोग करते हुए, रिपोर्ट जलवायु-संवेदनशील कारकों जैसे कि वेक्टर जनित रोगों (मलेरिया) और वायु प्रदूषण के संपर्क में आने पर भी जोर देती है।

यूनिसेफ: गर्मी में भारत टॉप पर

​इस रिपोर्ट में सबसे तेज गर्मी के मामले में भारत को 10 में से 10 अंक मिले हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया भर में भारत के बच्चे भीषण और तेज़ गर्मी का सबसे बड़ा शिकार हैं। गर्मी के अलावा, भारत के बच्चे गरीबों की मार भी झेल रहे हैं। कृषि और मौसम से जुड़े मामले में भारत का 8.84 रह रहा है, जो बहुत ज्यादा है। हालाँकि नाइजीरिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान, वियतनाम और कैमरून जैसे देशों में ग़रीबों का प्रभाव भारत से कुछ मामलों में ज़्यादा है, लेकिन भारत की स्थिति भी बहुत दिलचस्प बनी हुई है। भारत में दो-तिहाई बच्चे मलेरिया के खतरे में हैं, जबकि लगभग 99 फीसद बच्चे वायु प्रदूषण के खतरे में हैं।

यूनिसेफ: भारत 5वें स्थान पर

सीज़न के कई संकेतों को एक साथ झेलने के मामले में (मल्टी-हैज़र्ड एक्सपोज़र स्कोर) भारत पूरी दुनिया में 5 वें स्थान पर है। भारत से आगे सिर्फ म्यांमार, पाकिस्तान, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश हैं। ​यूनिसेफ की रिपोर्ट में सिर्फ गर्मी या बच्चों की ही बात नहीं कही गई है, बल्कि यह भी बताया गया है कि इस बदलते मौसम के कारण बच्चों में बीमारी तेजी से फैल रही है। जैसे मलेरिया। मौसम में नमी से उत्पन्न मच्छरों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है जो बच्चों को आसानी से अपनी चपेट में ले लेते हैं। इसी तरह जहरीली हवा। बच्चों के शरीर पर प्रभाव डालते हैं, जो उनके फेफड़ों और दिमाग के विकास को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। ये सब बच्चों के लिए इसलिए ज्यादा खतरनाक हैं कि अधिक गर्मी के कारण बच्चों के शरीर में पानी की कमी (निर्जलीकरण) बहुत जल्दी हो जाती है। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और वे वायु प्रदूषण और मलेरिया जैसे तत्वों का शिकार बन जाते हैं।

यूनिसेफ: बच्चों की संवेदनशीलता

बच्चों को जलवायु संबंधी खतरों से निपटने के लिए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि ‘उनके लिए महत्वपूर्ण सामाजिक प्रणालियों और सेवाओं की स्थिति का आकलन करना’ किसी क्षेत्र या राष्ट्र की क्षमता का अच्छा संकेतक है। विश्वभर में लू की चपेट में आने वाले बच्चों की स्कूली शिक्षा डेढ़ साल तक बर्बाद हो सकती है। भारत में बच्चों की असुरक्षा का स्कोर (0 से 10 के बीच) अपेक्षाकृत कम 3.44 है, जो जलवायु संबंधी बढ़ते खतरों का सामना करने की देश की मजबूत क्षमता को दर्शाता है। हालांकि भारत का स्कोर औसत स्कोर 2.5 से अधिक है। अफ्रीका के नाइजर, चाड, दक्षिण सूडान आदि देशों में बच्चों की असुरक्षा का स्तर कहीं अधिक होने का अनुमान है और इसके अतिरिक्त अमेरिका में बच्चों का असुरक्षा स्कोर 5.31 है।

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