नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। भारत के प्रमुख सार्वजनिक चिकित्सा संस्थानों में फैकल्टी की भारी कमी है। 2025-26 तक 21 एम्स में स्वीकृत शिक्षकों के 40 प्रतिशत से ज़्यादा पद रिक्त रहेंगे, जो पिछले चार वर्षों में सबसे ज़्यादा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने पिछले दिनों संसद में जो जवाब दिया था वह साबित करता है कि राष्ट्रीय महत्व के इन संस्थानों में मानव संसाधन संकट पर है।
एम्स : 40 फीसद पद रिक्त
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इस साल 6,376 स्वीकृत फैकल्टी के पदों में से 2,561 पद रिक्त हैं, यानी रिक्तियों की दर 40.2 प्रतिशत है, जो पिछले साल के बराबर है। यह 2022-23 के बाद से रिक्तियों की सबसे बड़ी संख्या है, जब 2,099 पद रिक्त थे। दिल्ली एम्स सहित छह संस्थानों में पिछले चार सालों में 2025-26 तक शिक्षकों के सबसे ज़्यादा पद रिक्त हैं। एम्स दिल्ली में 462 फैकल्टी पद रिक्त हैं। ज़्यादा रिक्तियों वाले अन्य संस्थाओं में जोधपुर (186), ऋषिकेश (147), भुवनेश्वर (103), मंगलागिरी (158) और गोरखपुर (98) शामिल हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक आंकड़े नए एम्स परिसरों के हैं, जहां स्टाफ की संख्या कम है। जम्मू-कश्मीर के अवंतीपोरा स्थित एम्स में 2023-24 तक 94 फैकल्टी पद स्वीकृत थे और ये सभी रिक्त थे। एम्स मदुरै में 183 स्वीकृत फैकल्टी पदों में से 49 पद भरे हुए हैं। एम्स राजकोट में 183 में से 76 फैकल्टी पद कार्यरत हैं और बिलासपुर में 217 स्वीकृत पदों में से 126 पद भरे हुए हैं।
एम्स: 2022 के बाद से हालत बिगड़ी
इन आंकड़ों से पता चला है कि 2022-23 के बाद से फैकल्टी की कमी और भी बदतर हो गई है। उस साल 5,410 में से 2,099 पद (38.8 प्रतिशत) रिक्त थे। इसके अगले साल 5,836 में से 2,346 पद रिक्त थे (40.2 प्रतिशत) हालांकि 2024-25 में यह संख्या थोड़ी घटकर 37.6 प्रतिशत रह गई, लेकिन 2025-26 में इसमें फिर से वृद्धि देखी गई। सरकारी आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 10 एम्स दिल्ली, भुवनेश्वर, जोधपुर, ऋषिकेश, मंगलागिरी, नागपुर, कल्याणी, गोरखपुर, बिलासपुर और देवघर में 2022-23 और 2025-26 के बीच फैकल्टी रिक्तियों में वृद्धि हुई है। एम्स भोपाल, रायपुर, मदुरै, पटना, बठिंडा, गुवाहाटी, बीबीनगर, रायबरेली, राजकोट और जम्मू में सुधार देखा गया।
एम्स: निजी अस्तालों का आकर्षण भी
कई लोगों का मानना है कि यह कमी खराब वेतनमान और निजी क्षेत्र में बेहतर संभावनाओं के कारण है। पर्याप्त शिक्षण स्टाफ की कमी से चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। चिकित्सा संबंधी अवधारणाओं का व्यावहारिक ज्ञान प्रभावित होता है, जिसका असर डॉक्टरों के प्रशिक्षण पर पड़ता है। सच यह है कि डॉक्टर कॉरपोरेट अस्पतालों की तुलना में कम वेतन के कारण सरकारी अस्पतालों में काम करने से बचते हैं। डॉक्टरों को कॉरपोरेट अस्पतालों में अधिक आकर्षक भविष्य मिलता है।
एम्स: चयन समिति से बहाली
संसद में मंत्री जाधव ने कहा था कि फैकल्टी की भर्ती एक ‘सतत प्रक्रिया’ है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक एम्स में नियुक्तियों में तेज़ी लाने के लिए एक स्थायी चयन समिति है और अन्य शीर्ष सरकारी संस्थानों के सेवानिवृत्त फैकल्टी सदस्यों को 70 वर्ष की आयु तक अनुबंध पर नियुक्त किया जा सकता है। भारतीय और विदेशी संस्थानों के वरिष्ठ शिक्षकों को नए एम्स में पढ़ाने की अनुमति देने के लिए एक विजिटिंग फैकल्टी योजना शुरू की गई है। मंत्री के अनुसार घोषित 23 एम्स में से 19 पूरी तरह से कार्यरत हैं। मदुरै एम्स आंशिक रूप से कार्यरत है, जबकि अवंतीपोरा, दरभंगा (बिहार) और रेवाड़ी (हरियाणा) के एम्स अभी भी निर्माणाधीन हैं। इनमें से तीन को छोड़कर सभी संस्थानों को 2022-23 से स्वीकृत फैकल्टी पद जारी कर दिए गए हैं। दरभंगा और रेवाड़ी एम्स में अभी भी कोई स्वीकृत फैकल्टी पद नहीं है।
