नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। रूमेटोलॉजिस्ट यानी गठिया रोग विशेषज्ञ डॉ. उमा कुमार के साथ बातचीत की पहली कड़ी में आपने जाना कि गठिया रोग बहुत सारी बीमारियों का लक्षण है। इस दूसरी कड़ी में नए दौर के बच्चों और बुजुर्गों की सेहत के बारे में डॉ. साहिबा ने विस्तृत जानकारी दी है। डॉ. उमा कुमार दिल्ली एम्स में इस विभाग की अध्यक्ष हैं। उनसे The thermometer के तीसरे एपिसोड में बातचीत हुई थी।
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आशुतोष: पेरेंट्स आज के नए दौर के बच्चों से कैसे डील करें?
डॉ. उमा: आजकल ज्यादातर घरों में मदर—फादर वर्किंग है। बच्चे को देखने वाला कोई नहीं है। हम लोग जब बड़े हुए तो हमारे ग्रैंड पेरेंट्स होते थे जिनसे हम मिलते—जुलते रहते थे। उनसे इंटरेक्शन बना रहता था। अब अचानक बच्चा 14—16 साल का हो गया और आप रोक—टोक करें तो मानेगा नहीं। यह बचपन से हो। पेरेंट्स को बहुत पेशेंस रखना है और रोल मॉडल बनने की कोशिश करनी है जो आसान नहीं है। आपको बहुत सारे सैक्रिफाइस करने पड़ते हैं। बच्चे जब बहुत छोटे हैं तभी से उनको अच्छा—बुरा प्यार से समझाना है। गलतियां तो सबसे होती हैं। जहां सख्त होना है वहां सख्त होइए। एक उदाहरण मैं दूंगी। मैं बहुत छोटी थी। 7वें—8वें की बात है। पढ़ने में अच्छी थी और एटीट्यूड भी था। गुस्सा भी बहुत आता था। अब मेरे क्लास फ्रेंड्स ने घर में शिकायत कर दी। पापा ने डांटा पर दादी ने बुलाया। वह हमारे साथ रहती थी। उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि जिसमें गुण होते हैं, जहां फल लगे होते हैं उसी पर लोग पत्थर चलाते हैं। तो तुम्हें कोई कुछ बोल रहा है तो इसीलिए कि उसे लगता है कि आप उससे सुपीरियर हो। अब तुम्हारी मर्जी है। तुम सुपीरियर रहना चाहती हो या उनकी बराबरी में, चॉइस तुम्हारी। अगर सुपीरियर रहोगे तो ये सब रहेगा। तो वो बात ऐसी दिमाग में बैठी कि पूरा बिहेवियर चेंज हो गया। अगर अक्सर पापा डांट देते और उस पर ही रह जाती तो समझ नहीं पाती। परिवार के साथ बैठें, परिवार के बड़े लोग समझें।
आशुतोष: गठिया ज्यादातर बुजुर्गों में देखा जाता है। तो बुजुर्गियत की तरफ जो लोग बढ़ रहे हैं यानी 40—50 प्लस हो गए, उनको किन बातों का ख्याल रखना चाहिए?
डॉ. उमा: गठिया बुजुर्गों में ही सिर्फ होती है, यह गलत है। हर उम्र के हिसाब से अलग-अलग प्रकार की गठिया होती है। हां, बुजुर्गों में जोड़ों की समस्याएं ज्यादा होती हैं। उनको जिस प्रकार का गठिया होता है, उसे हम अर्थराइटिस कह देते हैं। हर आदमी बुजुर्ग की कैटेगरी में आएगा तो उसकी तैयारी शुरू से करनी है। अपने जोड़ों का इस्तेमाल करना है। उनको अब्यूज नहीं करना है वरना बाद में वो आपको रुलाएंगे। इसका मतलब यह कि आपके काम करने या उठने—बैठने का तरीका ठीक होना चाहिए। मोटापे को कंट्रोल करना है। खानपान ठीक हो। नींद ठीक होनी चाहिए। कोई एडिक्शन जैसे स्मोकिंग, अल्कोहल आदि न हो। अगर अर्थराइटिस हो भी जाए तो रिप्लेसमेंट का ऑप्शंस है। ज्यादातर नी और हिप में प्रॉब्लम होती है। एंकल में भी हो जाती है। अगर गठिया हो गई हो तो अपनी मांसपेशियों को मजबूत रखें। व्यायाम करें। नी दर्द होता है, उठने पर लगता है कि जैसे घुटना चटक गया। लगता है कि गिर जाएंगे। ऐसा इसलिए कि कमजोरी से वहां की मांसपेशियां वजन झेल नहीं पाती। कई लोग कहते हैं कि हम दिन भर काम करते हैं घर में। मैं उनको हमेशा बोलती हूं कि जो आप काम कर रहे हैं या खड़े होकर रोटी बना ली तो घुटनों की कौन सी एक्सरसाइज हो रही है? जोड़ के आसपास जो मसल्स हैं, उनको मजबूत करने की जरूरत है और इसके लिए व्यायाम सीखें। पैर पर तकिया रख कर उठाने की कोशिश कीजिए। पैर के बीच में तकिया रख के उसको दबाएं तो मसल्स मजबूत होंगे। जिम जाकर एग्रेसिव एक्सरसाइज नहीं करनी है। बहुत जेंटली करनी है। आप नींद पर्याप्त नहीं लेंगे, मन में नेगेटिविटी ना रखें। खानपान ठीक रखें। वजन पर काबू रखें। परिवार जन समय से खिलाने पर ध्यान दें।
आशुतोष: परिवार के लोगों को क्या कहना चाहेंगे क्योंकि वो केयर टेकर हैं।
डॉ. कुमार: केयर टेकर और बुजुर्ग ध्यान दें। कई बार केयर टेकर बहुत अच्छी केयर कर रहा होता है। लेकिन बुजुर्ग सुन ही नहीं रहे होते। बुजुर्गों को भी यह सोचना होगा कि मेरे पास 10 लोग मेरा ध्यान रखने वाले हो सकते हैं लेकिन मुझे इंडिपेंडेंट रहने की कोशिश करनी है क्योंकि उनकी लाइफ में भी बहुत प्रॉब्लम्स हैं। घर में ऐसा सिस्टम बनाएं कि जहां पर वो अगर मूव कर रहे हैं तो टकराने की चीज न हो और चोट लगने की संभावना कम हो। वाशरूम्स में वैसा सपोर्ट हो कि वो आराम से बैठ सकें और फिर खड़े हो सकें। तीसरी चीज कि उनको ऐसे न्यूट्रिशियस और हेल्दी फूड दें। हर किसी की बॉडी की जरूरत अलग होती है। कैलोरीज इंटेक अलग होता है। तो ये नहीं कि घी, तेल, चिकनाई और इस तरह की चीजें खा रहे हैं। दूध, दही, नट्स, लोकल मौसमी फल आदि लें। सब्जियां लें। जहां बैठे हुए हैं, वहीं एक्सरसाइज करें। हाथ का मूवमेंट कर सकते हैं। नी जॉइंट की एक्सरसाइज कर सकते हैं। जो वॉक के लिए जा सकते हैं वो जजाएं। जरूर जाएं। सीढ़ियां चढ़ना—उतरना थोड़ा कम कर दे। डिप्रेशन में जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि फिर वो हार्ट अटैक का भी कारण बनता है। सबसे बड़ी बात—बदलते समय के साथ एडजस्ट करें।
(जारी)
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