नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। बजुर्गों की सेहत का ख्याल रखना या बिस्तर पर गिर जाने के बाद देखभाल करना भी परिवार के लिए एक महती जिम्मेववारी है। पहले लोग परिवार के बीच ही उनको संभालते थे पर शहरी जीवन की व्यस्तताओं के कारण उनकी दिक्कतों को दूर करने के लिए केयर होम खुलने लगे हैं। कार्यक्रम में वैसे ही चिकित्सक से बात की गई जिनका हरियाणा के गुरुग्राम में ‘वटवृक्ष’ नाम से केयर होम है। ये हैं डॉक्टर रमेश गोयल जिनका सफर बाल रोग विशेषज्ञ से जिरियाटिक केयर यानी बुजुर्गों तक का उपचार और ख्याल रखने वाले तक आ पहुंचा। The Thermometer के लिए उनसे हमारे समूह संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने बात की है। प्रस्तुत है बातचीत की पहली कड़ी…
आशुतोष: बाल रोग विशेषज्ञ से लेकर बुजुर्गों की चिकित्सा तक आप कैसे पहुंचे?
डॉ.गोयल: पीरियडिक्स में लगभग 35 साल हो गए। जब मेरे बाल सफेद होने लगे तो मुझे लगा कि बुढ़ापे में विदेश जाकर रहना होगा क्योंकि हम पांच भाई—बहनों के बच्चे अमेरिका में हैं। मेरे बच्चे भी वहीं हैं। लेकिन मुझे तो यहीं रहना है फिर हमारी केयर कौन करेगा? तो मैंने इस पर काफी शोध किया। मैंने देखा कि इसमें सबसे अच्छा काम अमेरिका में हो रहा है। फिर मैं 2018-19 में दो बार वहां गया। मैंने वहां ट्रेनिंग की कई सुविधाएं देखी कि वे कैसे अपने बुजुर्गों की केयर करते हैं। वहां की लगभग 12 फीसद आबादी एल्डरली केयर होम्स में रहती है। वहां एक नियम है कि एक उम्र के बाद एल्डरली केयर में शिफ्ट किया जाए। वहां से लौटकर मैंने यहां एक ऐसा सेंटर बना लिया। बीच में कोरोना आ गया जिससे जीवन की अनिश्चतता हो गई। तो उसे मैंने बेच दिया। अभी मैंने अपनी क्लीनिक को तोड़ कर बड़ा सेंटर बनाया है। इसमें उच्चस्तरीय और अंतरराष्ट्रीय खासियत के हिसाब से 16 कमरे बनाए हैं। मैंने डेवलपमेंटल न्यूरोलॉजी में डिप्लोमा भी पहले किया हुआ था। वह भी इसमें काम आ रहा है। हमने महसूसा कि आज समाज की एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि बच्चे हमारे साथ नहीं हैं। किसी—न—किसी कारण से ज्यादातर दूसरे शहरों या विदेश में रहते हैं। हमारे शहर में रहते हुए भी उनके पास इतना वक्त नहीं हो पाता। प्रोफेशनल कारणों से उनको वक्त नहीं बचता कि पेरेंट्स की केयर कर सकें। जिस तरह बाल चिकित्सा में बच्चों की एक स्पेसिफिक जरूरत होती है, वैसे ही उम्र बढ़ने पर उनकी आवश्यकताएं भी बदलती जाती हैं। सरकार भी एल्डरली केयर्स की सुविधाएं बढ़ा रही है। जब देश आजाद हुआ था तो हमारी लाइफ एक्सपेक्टेंसी 37 साल थी। आज यह 72 से 76 साल तो ऑफिशियली है। वैसे काफी बुजुर्ग 80—90 साल जी रहे हैं। तो उससे उनकी जरूरतें बदलती जा रही है।
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आशुतोष: लेकिन भारत की परंपरा में बुजुगौं की देखभाल घर में होती रही है। अब क्या हुआ कि ऐसा कांसेप्ट लाने की जरूरत पड़ी?
डॉ. गोयल: हमारे देश में पारंपरिक रूप से कंबाइंड फैमिली थी जिसमें सभी भाई बहन, बुआ, चाचा, ताऊ साथ रहते थे। जब परिवार में अनेक लोग होते थे तो बुजुगौं की केयर भी हो जाती थी। बुजुर्ग भी अपने बच्चों की केयर करते थे। एक पारिवारिक सामंजस्य था। पहले 90 फीसद लोग गांवों में तो 10 फीसद शहरों में रहते थे। शहरीकरण से आज 30 से 40 फीसद लोग शहरों में आ गए। शहरी बुजुर्गों की लाइफ बढ़ी तो उनकी संख्या भी बढ़ी। 2011 के बाद से एक साल में करीब एक करोड़ लोग बढ़ रहे हैं। हमें इस संख्या की समस्याओं को देखना है। इसे अगर हम आज नहीं देखेंगे तो विकराल रूप होने के बाद इसका निवारण भी कठिन हो जाएगा।
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आशुतोष: आपने ‘वट वृक्ष’ नाम से ये पूरा सेंटर बनाया है। एक सवाल है कि आम लोग ये कहते हैं कि बेटों ने तो अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में डाल दिया। इस धारणा को आप कैसे देखते हैं?
डॉ. गोयल: पहले वृद्धाश्रम चैरिटी से चलते थे। मां-बाप की सेवा नहीं पाने वाले लोग उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ देते थे। यह सामाजिक व्यवस्था थी कि चैरिटेबल संस्थाओं से बुजुर्गों की देखभाल करें। धीरे-धीरे जैसे-जैसे सांस्कृतिक—आर्थिक बदलाव हुआ तो लाइफ एक्सपेक्टेंसी भी बढ़ी। हमारे अपर क्लास, मध्यम वर्ग और अफोर्डेबल लोग ओल्ड एज होम में अपने पेरेंट्स को डालना चाहते हैं। उसके दो—तीन कारण रहे। एक तो घर पर प्रोफेशनली सेवाएं नहीं दी जाती। हर बुजुर्ग की आवश्यकता अलग-अलग होती है। हमारे पास जो भी बुजुर्ग आते हैं, उनकी हम पहले समस्याएं देखते हैं। हम आकलन करते हैं कि उनको क्या-क्या चाहिए। फिर उसके अनुसार उनकी दिनचर्या या उनकी थेरेपी या एक्टिविटी शुरू करते हैं। दूसरा, यहां कम्युनिटी सेटिंग मिलती है जो घर पर अकेलेपन में नहीं मिलती। बच्चे काम पर चले जाते हैं। पेरेंट्स अकेले रह रहे हैं। उनको बात करने के लिए कोई मिल नहीं पाता। बच्चे चाहते हैं कि अपने पेरेंट्स का ध्यान रखें। लेकिन उनके खुद के बच्चे हो जाते हैं। उनकी स्कूलिंग देखनी है। अपनी नौकरी देखनी है। अपना घर देखना है और आर्थिक व्यवस्थाएं करनी है। इस वजह से वो कर नहीं पाते। हम बुजुर्गों को तीन कैटेगरी में बांटते हैं। अर्ली स्टेज, मिड एंड लेट एल्डर्ली। अर्ली में 59—60 से 59—69 साल, मिड में 70 से 79 साल और लेट स्टेज में 80 से आगे। हर स्टेज में आवश्यकताएं बदलती जाती है। बुजुर्गों में अकेलापन सबसे बड़ा नुकसानदेह है। उनसे बात करने, एक्टिविटी के लिए कोई नहीं है। उनकी शारीरिक क्षमताएं कम हो जाती है। यहां हम वो सब कुछ देखते हैंं।
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आशुतोष: आपके ‘वट वृक्ष’ और वृद्धाश्रम में क्या अंतर है? सामान्य बोलचाल की भाषा में लोग इसे भी वृद्धाश्रम मानेंगे?
डॉ. गोयल: देखिए, वृद्धाश्रम में आमतौर पर लोग स्वत: नहीं जाते। वहां वो लोग जाते हैं जिनके पास आर्थिक अभाव है। लेकिन हमारे जैसी संस्थाओं में वो लोग आ रहे हैं जिनमें अफोर्डेबिलिटी है पर अपनी लाइफ को बेहतर बनाना चाहते हैं जो घर पर रखकर नहीं बना पाते। या तो अकेलेपन या बीमारी खासकर डिमेंशिया की वजह से या वो बैड रिडन हों। उनके बच्चों को काम पर जाना है और केयर करने वाला घर पर कोई नहीं है। इसके अलावा डे केयर भी एक हमारी कैटेगरी है जिसमें आप सुबह पेरेंट्स को छोड़ दीजिए। जैसे हम बच्चों को स्कूल क्रंच में छोड़ते हैं। शाम को आप बच्चों के साथ पेरेंट्स को भी अपने साथ ले जाएं ताकि दिन भर उनकी दिनचर्या अपने जैसे लोगों में रहे, एक्टिव रहें और खुद को स्वस्थ महसूस करें।
(जारी)
प्रस्तुति: अजय वर्मा
