नयी दिल्ली (स्वस्थ भारत मीडिया)। बलूचिस्तान के क्वेटा में तीन ऐसे सगे भाई हैं जिनकी जिंदगी सूर्य की रोशनी पर निर्भर है। मेडिकल साइंस के लिए अचंभित करने वाली बात यह भी है कि सूर्यास्त के बाद ये लकवाग्रस्त हो जाते हैं। अब लोग इन्हें सोलर किड्स (Solar kids) कहने लगे हैं। ये तीनों भाई दिन में तो आम लोगों की तरह अपनी ज़िंदगी जीते थे, लेकिन सूरज डूबते ही उनकी ज़िंदगी मानो ठहर सी जाती थी और शाम से अगले दिन सूरज निकलने तक वे बेबस पड़े रहते थे।
सोलर किड्स: बाहर भी हुए टेस्ट
BBC की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ही नहीं, विदेशों में भी उनके टेस्ट कराए गए और पता चला कि तीनों भाई दुनिया में अब तक पाई गई अपनी तरह की पहली बीमारी से पीड़ित हैं। ऐसी हालत करीब 10 साल से बनी हुई है। इनको तमाम टेस्ट के बाद एक दवा दी गई, जिससे अब वे रात में भी कुछ हद तक सामान्य ज़िंदगी जीने के क़ाबिल हो गए हैं। दवा मिलने से पहले ये नहीं जानते थे कि रात कैसी होती है, वह कब आती है और उस दौरान उनकी ज़िंदगी कैसी होती है क्योंकि उन्हें होश अगले दिन सूरज निकलने के बाद ही आता था। 2016 से इन बच्चों की बीमारी की जांच और इलाज से जुड़े पाकिस्तान के डॉक्टर प्रोफ़ेसर जावेद अकरम कहते हैं कि इस बीमारी के बारे में न सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर टेस्ट्स हुए, बल्कि ये अब भी जारी हैं। बलूचिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री बख़्त मोहम्मद काकड़ का कहना है कि राज्य सरकार इन बच्चों के इलाज के लिए हर संभव सुविधाएं मुहैया कराएगी।
सोलर किड्स्: पढ़ाई भी बाधित
ये क्वेटा के पास के इलाक़े मियां ग़ंडी के रहने वाले मोहम्मद हाशिम के बच्चे हैं। उनके नौ बच्चों में से पाँच इसी अजीब बीमारी से पीड़ित थे। दो बच्चे तो इसी बीमारी की वजह से चल बसे लेकिन बाक़ी तीन में से दो अब जवान हो चुके हैं जबकि एक अभी छोटा है। सोलर किड्स में सबसे बड़े भाई 19 साल के शोएब अहमद, 17 साल के रशीद अहमद हैं तो तीसरे भाई मोहम्मद इलियास की उम्र कम है। शोएब और रशीद को बचपन में एक मदरसे में दाख़िल कराया गया था लेकिन वह अपनी बीमारी की वजह से पढ़ाई नहीं कर सके। मदरसे के कर्ता-धर्ता उनको संभाल नहीं पाते थे।
सोलर किड्स्: रात की ज़िंदगी गोलियों पर निर्भर
शोएब अहमद कहते हैं कि डॉक्टरों ने जांच के बाद एक ही टैबलेट दिया जिसे वह और उनके भाई पिछले नौ साल से ज़्यादा वक़्त से खा रहे हैं। गोली की भी एक टाइमिंग है और जब इसका असर ख़त्म हो जाता है तो पूरा बदन रात को फिर वैसे ही हिलना-डुलना बंद कर देता है जैसे इलाज से पहले होता था। सही इलाज न होने की वजह से ये किसी काम-धंधे के क़ाबिल नहीं हैं और आर्थिक रूप से हम अब भी माता-पिता पर ही निर्भर हैं। वे चाहते हैं कि हमारा स्थायी इलाज हो ताकि हम तीनों भाई भी सामान्य ज़िंदगी जीने के क़ाबिल हो जाएं और आर्थिक व सामाजिक रूप से अपने पैरों पर खड़े हो जाएं। स्थायी इलाज न होने से माता-पिता भी अलग परेशान हैं। तीनों बच्चे जो गोली इस्तेमाल कर रहे हैं वह भी महंगी है और ख़रीदना भी मुश्किल हो जाता है। वे सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं।
सोलर किड्स: दवा से थोड़ा सुधार
इनकी जांच और इलाज से जुड़े प्रोफ़ेसर डॉक्टर जावेद अकरम इस तरह के मामले वाला अभी तक पूरी दुनिया में एक ही परिवार है। शायद दुनिया में यह अपनी तरह की अनोखी बीमारी है। उनका कहना था कि इससे मिलती-जुलती बीमारी जापान में कुछ परिवारों को है जिसे हम सेगावा सिंड्रोम कहते हैं, लेकिन उसमें और इन बच्चों की बीमारी के लक्षणों में फ़र्क़ है। वे कहते हैं कि पौने दो साल की खोजबीन के बाद पता चला कि ये बच्चे सूरज की रोशनी ख़त्म होते ही लकवाग्रस्त क्यों हो जाते हैं। पूरी दुनिया में इन बच्चों के टेस्ट किए गए। उनके सैंपल्स ब्रिटेन, यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड और दुनिया के दूसरे विश्वसनीय संस्थानों को भेजे गए और फिर इस्लामाबाद ले जाकर मर्ज़ की डायग्नोसिस की कोशिशें की गईं। डॉक्टर जावेद अकरम ने कहा कि पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ में हमने उन्हें एक थैरेप्यूटिक ट्रायल दिया। इससे पहले वे बच्चे उस रात भी पहले की तरह बिल्कुल लकवाग्रस्त थे। जब उन्हें डोपामाइन की एक-एक गोली दी गई तो वे उठ खड़े हुए। गोली खाने के बाद वह इतने ख़ुश हो गए थे कि अस्पताल के गलियारों में दौड़ते फिर रहे थे। इनकी सेंगर सीक्वेंसिंग, नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग और तमाम टेस्ट् से यही पता चला कि रात को उनके दिमाग़ में डोपामाइन की कमी हो जाती है। इसकी वजह से वे लकवाग्रस्त हो जाते हैं। यह उनकी नर्व को ख़त्म कर देती है। इस बीमारी का एक ख़ास नाम है जो आईवीडी जीन कहलाता है और यह आईवीडी जीन में एब्नॉर्मलिटी है।
